सिनेमा जगत के दिग्गज कवि-गीतकार जावेद अख्तर ने कहा कि बांग्लादेश का इतिहास बताता है कि लोग अपनी मातृभाषा बांग्ला के लिए खड़े हुए। मुस्लिम होने के बावजूद उन्होंने उर्दू को अपनाना जरूरी नहीं समझा, क्योंकि भाषा आस्था से नहीं, पहचान से जुड़ी होती है। हिंदी और उर्दू की व्याकरण एक ही है और यह बहुत कम देखने को मिलता है। ये दोनों एक ही मां ‘खड़ी बोली’ की बेटियां हैं। अख्तर ने कहा कि किसी भाषा को किसी धर्म से जोड़ना सही नहीं है। भाषा का संबंध धर्म से नहीं, बल्कि क्षेत्र और समाज से होता है। यूरोप इसका बड़ा उदाहरण है, जहां एक ही धर्म के बावजूद अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं। गुलाबी शहर जयपुर में सांस्कृतिक रंगों से सजा ‘जनवरी ऑफ जयपुर’ उत्सव जयमहल पैलेस में भव्य अंदाज में आयोजित हुआ, जहां साहित्य और सिनेमा जगत के दिग्गज कवि-गीतकार जावेद अख्तर और सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना और पं. बिरजू महाराज जी की पौत्री शिंजिनी कुलकर्णी के बीच रोचक संवाद ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस दौरान जावेद अख्तर ने अपनी मशहूर नज़्म ‘मैं भूल जाऊं’ सुनाकर सभागार में तालियों की गूंज भर दी। उर्दू का एक भी वाक्य ऐसा नहीं है, जिसमें हिंदी शामिल न हो जावेद अख्तर ने कहा कि उर्दू का एक भी वाक्य ऐसा नहीं है, जिसमें हिंदी शामिल न हो। जो इंसान उर्दू ज्यादा नहीं जानता, न पढ़ता है, न समझता है और उसे उर्दू या उर्दू शायरी की शुरुआत करनी है, तो पहले क्लासिकल शायरों के बजाय कंटेम्परेरी शायरों को पढ़िए। कार्यक्रम में राजस्थान के बीकानेर के जाने-माने मांड लोक गायक और लोक संगीतकार पद्मश्री से सम्मानित अली-गनी मोहम्मद की जोड़ी की प्रस्तुति ने दर्शकों का मनमोह लिया। कार्यक्रम की मेजबानी संदीप भूतोड़िया, मंजरी भूतोड़िया, सौरभ कक्कड़ और विन्नी कक्कड़ ने की। राजस्थानी मांड गायकी ने लोक संगीत की गहराइयों से कराया रूबरू अली और गनी मोहम्मद बंधु की राजस्थानी मांड गायकी ने दर्शकों को लोक संगीत की गहराइयों से रूबरू कराया। उन्होंने मंच पर मांड गायन करते हुए भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा को जीवंत किया। विशेष तौर पर शास्त्रीय अंदाज में ‘केसरिया बालम’ प्रस्तुति को श्रोताओं ने खूब सराहा। कार्यक्रम के दौरान ‘पधारो’ के कई रूप सुनने को मिले, जिसने प्रस्तुति को और भी खास बना दिया। इसके अलावा उन्होंने ‘मूमल’ और ‘बड़िला ढोला’ जैसे लोकगीतों को भी अपने सुरों से सजाया। इस दौरान जब उन्होंने गजल ‘कभी आंसू, कभी खुशबू, कभी नगमा’ प्रस्तुत की, तो सभी श्रोता भाव विभोर हो गए। कार्यक्रम में जयपुर सहित देश के विभिन्न हिस्सों से कला और संस्कृति प्रेमी एकत्रित हुए। इसमें बाहर से आए विशिष्ट अतिथियों में लेखिका नीलिमा डालमिया आधार, सांसद प्रियंका चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अनंत विजय शामिल थे। जनवरी की सर्द शाम को चाय और स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ उठाते हुए मेहमानों ने आपस में संवाद किया और कार्यक्रम का आनंद लिया। उल्लेखनीय है कि कार्यक्रम ‘जनवरी ऑफ जयपुर’ की कल्पना और शुरुआत वर्ष 2018 में समर्पित संस्कृतिविद् संदीप भूतोड़िया ने की थी। तब से यह कार्यक्रम कला, संगीत और लोक संस्कृति के माध्यम से जयपुर की पहचान को अधिक मजबूती प्रदान करता आ रहा है। इसका उद्देश्य जनवरी के खूबसूरत मौसम में जयपुर की विविध और समृद्ध संस्कृति को प्रदर्शित करना है। जावेद अख्तर की सुनाई नज्म मैं भूल जाऊं तुम्हें अब यही मुनासिब है मगर भुलाना भी चाहूं तो किस तरह भूलूं कि तुम तो फिर भी हकीकत वो कोई ख्वाब नहीं यहां तो दिल का ये आलम है क्या कहूं कम-बख्त ! भुला न पाया वो सिलसिला जो था ही नहीं वो इक ख़याल जो आवाज तक गया ही नहीं वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुम से वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं
सिनेमा जगत के दिग्गज कवि-गीतकार जावेद अख्तर ने कहा कि बांग्लादेश का इतिहास बताता है कि लोग अपनी मातृभाषा बांग्ला के लिए खड़े हुए। मुस्लिम होने के बावजूद उन्होंने उर्दू को अपनाना जरूरी नहीं समझा, क्योंकि भाषा आस्था से नहीं, पहचान से जुड़ी होती है। हिंदी और उर्दू की व्याकरण एक ही है और यह बहुत कम देखने को मिलता है। ये दोनों एक ही मां ‘खड़ी बोली’ की बेटियां हैं। अख्तर ने कहा कि किसी भाषा को किसी धर्म से जोड़ना सही नहीं है। भाषा का संबंध धर्म से नहीं, बल्कि क्षेत्र और समाज से होता है। यूरोप इसका बड़ा उदाहरण है, जहां एक ही धर्म के बावजूद अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं। गुलाबी शहर जयपुर में सांस्कृतिक रंगों से सजा ‘जनवरी ऑफ जयपुर’ उत्सव जयमहल पैलेस में भव्य अंदाज में आयोजित हुआ, जहां साहित्य और सिनेमा जगत के दिग्गज कवि-गीतकार जावेद अख्तर और सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना और पं. बिरजू महाराज जी की पौत्री शिंजिनी कुलकर्णी के बीच रोचक संवाद ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस दौरान जावेद अख्तर ने अपनी मशहूर नज़्म ‘मैं भूल जाऊं’ सुनाकर सभागार में तालियों की गूंज भर दी। उर्दू का एक भी वाक्य ऐसा नहीं है, जिसमें हिंदी शामिल न हो जावेद अख्तर ने कहा कि उर्दू का एक भी वाक्य ऐसा नहीं है, जिसमें हिंदी शामिल न हो। जो इंसान उर्दू ज्यादा नहीं जानता, न पढ़ता है, न समझता है और उसे उर्दू या उर्दू शायरी की शुरुआत करनी है, तो पहले क्लासिकल शायरों के बजाय कंटेम्परेरी शायरों को पढ़िए। कार्यक्रम में राजस्थान के बीकानेर के जाने-माने मांड लोक गायक और लोक संगीतकार पद्मश्री से सम्मानित अली-गनी मोहम्मद की जोड़ी की प्रस्तुति ने दर्शकों का मनमोह लिया। कार्यक्रम की मेजबानी संदीप भूतोड़िया, मंजरी भूतोड़िया, सौरभ कक्कड़ और विन्नी कक्कड़ ने की। राजस्थानी मांड गायकी ने लोक संगीत की गहराइयों से कराया रूबरू अली और गनी मोहम्मद बंधु की राजस्थानी मांड गायकी ने दर्शकों को लोक संगीत की गहराइयों से रूबरू कराया। उन्होंने मंच पर मांड गायन करते हुए भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध परंपरा को जीवंत किया। विशेष तौर पर शास्त्रीय अंदाज में ‘केसरिया बालम’ प्रस्तुति को श्रोताओं ने खूब सराहा। कार्यक्रम के दौरान ‘पधारो’ के कई रूप सुनने को मिले, जिसने प्रस्तुति को और भी खास बना दिया। इसके अलावा उन्होंने ‘मूमल’ और ‘बड़िला ढोला’ जैसे लोकगीतों को भी अपने सुरों से सजाया। इस दौरान जब उन्होंने गजल ‘कभी आंसू, कभी खुशबू, कभी नगमा’ प्रस्तुत की, तो सभी श्रोता भाव विभोर हो गए। कार्यक्रम में जयपुर सहित देश के विभिन्न हिस्सों से कला और संस्कृति प्रेमी एकत्रित हुए। इसमें बाहर से आए विशिष्ट अतिथियों में लेखिका नीलिमा डालमिया आधार, सांसद प्रियंका चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक अनंत विजय शामिल थे। जनवरी की सर्द शाम को चाय और स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ उठाते हुए मेहमानों ने आपस में संवाद किया और कार्यक्रम का आनंद लिया। उल्लेखनीय है कि कार्यक्रम ‘जनवरी ऑफ जयपुर’ की कल्पना और शुरुआत वर्ष 2018 में समर्पित संस्कृतिविद् संदीप भूतोड़िया ने की थी। तब से यह कार्यक्रम कला, संगीत और लोक संस्कृति के माध्यम से जयपुर की पहचान को अधिक मजबूती प्रदान करता आ रहा है। इसका उद्देश्य जनवरी के खूबसूरत मौसम में जयपुर की विविध और समृद्ध संस्कृति को प्रदर्शित करना है। जावेद अख्तर की सुनाई नज्म मैं भूल जाऊं तुम्हें अब यही मुनासिब है मगर भुलाना भी चाहूं तो किस तरह भूलूं कि तुम तो फिर भी हकीकत वो कोई ख्वाब नहीं यहां तो दिल का ये आलम है क्या कहूं कम-बख्त ! भुला न पाया वो सिलसिला जो था ही नहीं वो इक ख़याल जो आवाज तक गया ही नहीं वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुम से वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं