दरभंगा राज परिवार की महारानी कामसुंदरी देवी का सोमवार को निधन हो गया। वे कुछ दिनों से बीमार चल रही थीं। 96 साल की उम्र में राज परिवार के कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली। युवराज कपिलेश्वर सिंह ने कहा, ‘महारानी का जाना हमारे परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है। कड़ी सुरक्षा के बीच महारानी का अंतिम संस्कार दरभंगा राज परिसर में पारंपरिक विधि-विधान से किया गया। बता दे कि कामेश्वर नगर स्थित मधेश्वरनाथ परिसर में राज परिवार के सभी महाराज-महारानी का अंतिम संस्कार होता आ रहा है। पूरे में परिसर में जितने भी महाराजाओं की चिता है सभी पर कोई ना कोई मंदिर बना है। पूरे परिसर में 9 मंदिर बनाए गए हैं। महारानी कामसुंदरी देवी महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। 1940 के दशक में उनका विवाह दरभंगा रियासत के अंतिम शासक कामेश्वर सिंह से हुआ था। महाराजा कामेश्वर सिंह का निधन वर्ष 1962 में हो गया था। उनकी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी देवी का निधन 1976 में और दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन 1940 में ही हो चुका था। महाराजा कामेश्वर सिंह को 3 शादियों के बाद भी कोई संतान नहीं थी। उनकी तीसरी पत्नी कामसुंदरी देवी ने अपनी बड़ी बेटी के बेटे कुमार कपिलेश्वर को दरभंगा राज का ट्रस्टी बनाया था। आगे जानिए 1962 के भारत-चीन युद्ध में 600 किलो सोना देकर मदद करने वाले दरभंगा राज की कहानी… दरभंगा राज से महात्मा गांधी ने मांगी थी मदद दरभंगा राज के उत्तराधिकारी कुमार कपिलेश्वर बताते हैं, दरभंगा राज दान को लेकर कभी पीछे नहीं हटा। जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो उनके सामने मूवमेंट में काफी संकट आ गया था। काफी परेशान होकर गांधी जी ने दरभंगा राज के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह को पत्र लिखकर मदद मांगी थी। गांधी जी को आर्थिक संकट के साथ पब्लिसिटी को लेकर समस्या थी। पत्र मिलते ही महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने सारा मीडिया का प्रभार संभाल लिया और गांधी जी को आर्थिक संकट से बाहर निकाला। दरभंगा राज गांधी जी का पहला मददगार रहा है। गांधी जी के हाथों लिखा पत्र आज भी मौजूद है। 1962 के युद्ध में 600 किलो सोना का दान साल 1962 में भारत-चाइना वार हुआ तो सरकार ने मदद की गुहार लगाई थी। इसके बाद दरभंगा राज सबसे पहले मदद के लिए आगे आया था। दरभंगा के इंद्रभवन मैदान में 15 मन यानी 600 किलो सोना तौला गया और उसे लड़ाई में मदद के लिए राज परिवार की तरफ से दान में दिया गया था। दरभंगा राज ने अपना तीन-तीन एयरक्रॉफ्ट भी लड़ाई के लिए दान कर दिया। अपना खुद का 90 एकड़ का एयरपोर्ट भी दान कर दिया था। आज इसी जमीन पर दरभंगा एयरपोर्ट बना है। भारत पर आए संकट पर दरभंगा से मदद कुमार कपिलेश्वर बताते हैं, भारत पर जब-जब विपत्ति आई तो दरभंगा राज परिवार ने मदद की। महाराजा कामेश्वर सिंह जी दान में कभी पीछे नहीं रहे। इनके पूर्व के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने इंडियन नेशनल कांग्रेस के फाउंडर रहे एओ ह्यूम को मदद की, जिससे मूवमेंट चलता रहा। फ्रीडम मूवमेंट इंडियन नेशनल कांग्रेस को बचाने के लिए दरभंगा राज ने बड़ा काम किया है। साल 1880 में दरभंगा राज परिवार से ह्यूम को 10 हजार रुपए दिया जाता था। आज भी उनका वह पत्र मौजूदा है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि 5 हजार मिला है, अगर 5 हजार और नहीं मिला तो हमारी इंडियन नेशनल कांग्रेस मूवमेंट थम जाएगा। देश को पहली यूनिवर्सिटी देने वाला परिवार इतिहास से गायब बिहार के मिथिला क्षेत्र में लगभग 8380 किलोमीटर के दायरे में फैला दरभंगा राज ने देश को पहली यूनिवर्सिटी दी। दरभंगा राज के अंतिम शासक महाराज बहादुर कामेश्वर सिंह के पोते युवराज कपिलेश्वर सिंह बताते हैं, हमारे परिवार को सरस्वती जी की असीम कृपा रही है। हमारा जो भी राज पाठ है, वह मां सरस्वती की वजह से ही है।’ हम लोगों ने अपना सब कुछ सरस्वती मां को ही अर्पित कर दिया है। महाराज महेश ठाकुर, जिन्हें यह राजपाठ मिला उन्होंने देश का पहला विश्वविद्यालय कोलकाता में बनाया। इसके लिए 230 एकड़ जमीन दान दे दी थी। उनकी इच्छा थी, हिंदू विश्वविद्यालय खोला जाए लेकिन वहां पॉलिटिक्स हो गई थी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के लिए 5 लाख दान कुमार कपिलेश्वर बताते हैं, महाराजा महेश ठाकुर के बेटे रामेश्वर सिंह ने अपने पिता के हिंदू विश्वविद्यालय खोलने के सपने को साकार करने में जुट गए। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सबसे पहला दान 5 लाख रुपए का दान किया था। मदन मोहन मालवीय जी के साथ घूम-घूमकर राजाओं के घर जाकर दाना लिया। मिथिला के राजा होने के साथ ब्राह्मण थे, इसलिए कोई भी खाली नहीं लौटाता था। वह 5 लाख खुद पहले दे दिए थे, इसलिए जहां भी गए इससे अधिक दान मिला और इससे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। वह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एसोसिएट फाउंडर भी रहे। शिक्षा के लिए दान कर दी जन्म स्थली शिक्षा के क्षेत्र में राज दरबार की तरफ से समाज के लिए बड़ा योगदान रहा है। पटना में दरभंगा हाउस को महाराजा कामेश्वर सिंह ने पटना यूनिवर्सिटी के लिए डोनेट कर दिया था। इलाहाबाद विश्विवद्यालय को दान दिया। दरभंगा में दो-दो यूनिवर्सिटी की स्थापना कराई। खुद संस्कृति के बहुत बड़े ज्ञानी रहे, इसलिए संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की। कुमार कपिलेश्वर कहते हैं, दरभंगा महाराज का जहां जन्म हुआ, वह स्थान भी शिक्षा के लिए डोनेट कर दिया। इससे समझा जा सकता है कि दरभंगा राज समाज के लिए कितना कुछ किया है, लेकिन सरकार उन्हें भुला रही है। अब तो इतिहास से भी उन्हें हटा दिया गया है। देश को कई विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज देने वाले दरभंगा राज के महाराजा को अब इतिहास में जगह नहीं दी जा रही है। इसे देश के लिए बड़ा दुर्भाग्य बताते हुए कुमार कपिलेश्वर कहते हैं, हम लोग पब्लिसिटी के लिए कभी कोई काम नहीं किए, लेकिन अब खामियाजा भुगत रहे हैं। दरभंगा एयरपोर्ट को ही लीजिए, 90 एकड़ जमीन देने के बाद भी महाराजा का नाम तक नहीं है। इंडो चाइना वार में अपना एयरपोर्ट दान करने के बाद भी नाम नहीं मिलना दुर्भाग्य की बात है। टूरिज्म के लिए ब्रांडिंग नहीं कर पाई सरकार राज परिवार मानता है, सरकार टूरिज्म के लिए भी दरभंगा राज की ब्रांडिंग नहीं कर पाई। राजस्थान में लोग इसीलिए जाते हैं, क्योंकि वहां राजवाड़ों की ऐसी ब्रांडिंग की गई है। हवेली महल और अपने ठिकानों को वैसा बनाया है। वहां सरकार भी मदद करती है, इसलिए ऐसा हो सका है। यहां भी ब्रांडिंग सरकार को करनी पड़ेगी। जब नाम देगी तो लाेग इसे देखने के लिए आएंगे। युवा पीढ़ी अतीत जानना चाहती है, सरकार अतीत से दरभंगा राज को गायब कर रही है। जब भी ठाट बाट की बात होती है, आज भी लोग दरभंगा महाराज की उपमा देते हैं। इसके बाद भी सरकार गंभीर नहीं है। बात देश को संकट से बचाने या सुविधा का हो तो दरभंगा राज का कोई तोड़ नहीं रहा। ट्रेन लाने में पूरा योगदान रहा। साल 1874 में तिरहुत रेलवे की नींव भी महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने रखी थी। रेलवे को दरभंगा राज की तरफ से बहुत सारी जमीन दान दी गई। इसके बाद भी महाराजा के नाम से रेल में भी कुछ नहीं है। पटना मेडिकल कॉलेज और पटना यूनिवर्सिटी की नींव रखने वाले आज इतिहास से बाहर हैं। 16 वीं शताब्दी का है दरभंगा राज का इतिहास दरभंगा राज पर शोध करने वाले इतिहासकार डॉ. संतोष कुमार बताते हैं, राज दरभंगा की स्थापना मैथिल ब्राहमण शासकों ने 16वीं शताब्दी के आरंभ में किया था। ब्रिटिश राज के दौरान तत्कालीन बंगाल के 18 सर्किल के 4 हजार 495 गांव दरभंगा नरेश के शासन में थे। दरभंगा राज की स्थापना मूल रूप से संस्कृत के महाज्ञाता महा महोपाध्याय महेश ठाकुर ने किया था। महाराजा राघव सिंह और महाराजा नरेंद्र सिंह राज दरभंगा में अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने अलीवर्दी खान जैसे क्रूर शासक को परास्त कर दिया था। दरभंगा राज के शासन और प्रशासन को देखने के लिए लगभग 7500 अधिकारी नियुक्त किए गए थे। भारत के रजवाड़ों और प्राचीन संस्कृति में दरभंगा राज का अलग ही स्थान था। इतिहासकार डॉ. संतोष बताते हैं, दरभंगा राज के शासक भारत में सबसे बड़े राजाओं में से एक थे। इसलिए पहले राजा फिर महाराजा और फिर महाराजाधिराज कहलाए। दरभंगा के राजा को राजवंश के रूप में मान्यता मिली थी। एशिया के पहले विश्वविद्यालय के लिए 6 लाख का दान दिया था। गांधी से लेकर नेशनल कांग्रेस मूवमेंट तक को मदद करने में दरभंगा राज सबसे आगे रहा है। दरभंगा में कई देश के कई शहरों में महल का निर्माण दरभंगा राज्य के शासन काल में हुआ। दरभंगा राज के दरबारी रहे बिस्मिल्लाह खान इतिहासकार डॉ. संतोष बताते हैं, दरभंगा राज के राजा संगीत कला और संस्कृति के महान संरक्षक रहे हैं। दरभंगा राज से कई प्रसिद्ध संगीतकार जुड़े। पद्मश्री बिस्मिल्ला खान एवं पद्म श्री राम चतुर मलिक तो कई सालों तक दरभंगा राज के दरबारी संगीतकार रहे। देश के प्रख्यात गायक के एल सहगल, गौहर जान, पंडित रामेश्वर पाठक और पंडित सियाराम तिवारी दरभंगा राज से जुड़े थे। दरभंगा राज ध्रुपद के प्रमुख संरक्षक रहे। ध्रुपद शैली में आज भी दरभंगा घराना एक महत्वपूर्ण नाम से जाना जाता है। यूपी सरकार ने अयोध्या के लिए भेजा था विशेष बुलावा दरभंगा महाराज की ख्याति और वैभव के कारण उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अयोध्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर दरभंगा महाराज के उत्तराधिकारी कुमार कपिलेश्वर को विशेष बुलावा पत्र भेजा था। इस अवसर पर यूपी सरकार ने उन्हें राज्य अतिथि बनाया था। कुमार कपिलेश्वर बताते हैं, अयोध्या में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर उन्हें और उनकी पत्नी कविता और बेटे अरिहंत को आमंत्रित किया गया था। प्रसाद के साथ अशोक सिंहल फाउंडेशन की तरफ से स्मृति चिन्ह भी दिया गया था। दरभंगा राज में रेलवे और हवाई जहाज की सुविधा दरभंगा महाराज पूरी तरह से मॉडर्न सोच वाले रहे। रेलवे और हवाई जहाज तक की सुविधा दरभंगा राज में मौजूद थी। दरभंगा महाराज शिक्षा जगत के साथ-साथ रोजगार सृजन के भी मास्टर रहे। उन्होंने अपनी राजधानी के बीचोंबीच 250 एकड़ जमीन पर अस्पताल बनवा दिया। उस समय रेलवे, बिजली जैसी चीजें दिल्ली के साथ दरभंगा में भी आई थीं। दरभंगा राज के महल में उस समय शानदार सजावट हुई थी। आज भी दीवारों पर लंदन की टाइल्स मौजूद हैं। दरभंगा महाराज ने हिंदी में आर्य भारत, इंग्लिश में इंडियन नेशन और मैथिली में मिथिला मिहिर नाम से अखबार चलाया था। महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने शिक्षा और देश की स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष योगदान दिया है। दरभंगा राज ने की थी फुटबाल महासंघ की स्थापना दरभंगा राज के राजा विश्वेश्वर सिंह ने अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ की स्थापना दरभंगा से की थी। आज इसकी पहचान देश में फुटबाल के बड़े संघ के रूप में है। फुटबाल के लिए होने वाली संतोष ट्रॉफी के पहले अध्यक्ष भी राजा विश्वेश्वर सिंह रहे हैं। इनकी याद में ही दरभंगा कप का आयोजन हर साल होता है। राज दरबार के राजाओं की कहानी दरभंगा राज के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ गौ रक्षणी सभा की स्थापना की थी। तिरहुत रेलवे के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया। गौ हत्या रोकने के लिए कड़े नियम बनाए थे। दरभंगा के राजा रामेश्वर सिंह को महाराजाधिराज की उपाधि मिली थी। राजा रामेश्वर सिंह का कार्यकाल सनातान धर्म के लिए प्रख्यात रहा। रामेश्वर सिंह एक कट्टर हिंदू राजा के रूप में विख्यात थे और तंत्र विद्या के बहुत बड़े साधक रहे। राजा रामेश्वर सिंह ने देश और विदेश में 100 से अधिक मंदिरों का निर्माण कराया था। राजा कामेश्वर को अंग्रेजों ने सर की उपाधि दी थी। वह महाराजा कामेश्वर सिंह के बड़े बेटे थे। वह 1929 में राज सिंहासन पर बैठे थे। उन्होंने बिहार यूनाइटेड पार्टी की स्थापना की थी। यह पार्टी कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखी जाती थी। संविधान सभा के सदस्य होने के साथ-साथ आजीवन राज्य सभा के सदस्य रहे। बिहार में जब विनाशकारी भूकंप आया तो राजा कामेश्वर ने जनता के लिए अपना पूरा खजाना खोल दिया था। महाराजा सर कामेश्वर सिंह दरभंगा राज के आखिरी महाराजा रहे। राज कुमार सुभेश्वर सिंह राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र थे। इनकी ख्याति शिक्षा के विकास में सबसे अधिक रही। कई यूनिवर्सिटी के साथ कॉलेजों की स्थापना और प्रसार में अहम भूमिका निभाई। दरभंगा राज के मौजूदा उत्तराधिकारी कुमार कपिलेश्वर दो भाई हैं। बड़े राजकुमार अमेरिका में रहते हैं, जबकि छोटे कुमार कपिलेश्वर दरभंगा में रहकर राज पाठ की देखरेख करते हैं। कुमार कपिलेश्वर भी अपने पूर्वजों की तरह ही मिथिलांचल में विख्यात हैं। खेल स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ मिथिलांचल के विभिन्न धार्मिक व सामाजिक संगठनों के लिए काम कर रहे हैं। इसके साथ राजनगर रिलीजियस ट्रस्ट के अधीन आने वाले 11 मंदिरों के ट्रस्टी भी हैं। इतिहासकार डॉ. संतोष बताते हैं, दरभंगा राज मैथिल ब्राह्मण हैं, लेकिन श्वेत ब्राह्मण टाइटल सिंह लगाते हैं।
दरभंगा राज परिवार की महारानी कामसुंदरी देवी का सोमवार को निधन हो गया। वे कुछ दिनों से बीमार चल रही थीं। 96 साल की उम्र में राज परिवार के कल्याणी निवास में अंतिम सांस ली। युवराज कपिलेश्वर सिंह ने कहा, ‘महारानी का जाना हमारे परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है। कड़ी सुरक्षा के बीच महारानी का अंतिम संस्कार दरभंगा राज परिसर में पारंपरिक विधि-विधान से किया गया। बता दे कि कामेश्वर नगर स्थित मधेश्वरनाथ परिसर में राज परिवार के सभी महाराज-महारानी का अंतिम संस्कार होता आ रहा है। पूरे में परिसर में जितने भी महाराजाओं की चिता है सभी पर कोई ना कोई मंदिर बना है। पूरे परिसर में 9 मंदिर बनाए गए हैं। महारानी कामसुंदरी देवी महाराजा कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। 1940 के दशक में उनका विवाह दरभंगा रियासत के अंतिम शासक कामेश्वर सिंह से हुआ था। महाराजा कामेश्वर सिंह का निधन वर्ष 1962 में हो गया था। उनकी पहली पत्नी महारानी राजलक्ष्मी देवी का निधन 1976 में और दूसरी पत्नी महारानी कामेश्वरी प्रिया का निधन 1940 में ही हो चुका था। महाराजा कामेश्वर सिंह को 3 शादियों के बाद भी कोई संतान नहीं थी। उनकी तीसरी पत्नी कामसुंदरी देवी ने अपनी बड़ी बेटी के बेटे कुमार कपिलेश्वर को दरभंगा राज का ट्रस्टी बनाया था। आगे जानिए 1962 के भारत-चीन युद्ध में 600 किलो सोना देकर मदद करने वाले दरभंगा राज की कहानी… दरभंगा राज से महात्मा गांधी ने मांगी थी मदद दरभंगा राज के उत्तराधिकारी कुमार कपिलेश्वर बताते हैं, दरभंगा राज दान को लेकर कभी पीछे नहीं हटा। जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से लौटे तो उनके सामने मूवमेंट में काफी संकट आ गया था। काफी परेशान होकर गांधी जी ने दरभंगा राज के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह को पत्र लिखकर मदद मांगी थी। गांधी जी को आर्थिक संकट के साथ पब्लिसिटी को लेकर समस्या थी। पत्र मिलते ही महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने सारा मीडिया का प्रभार संभाल लिया और गांधी जी को आर्थिक संकट से बाहर निकाला। दरभंगा राज गांधी जी का पहला मददगार रहा है। गांधी जी के हाथों लिखा पत्र आज भी मौजूद है। 1962 के युद्ध में 600 किलो सोना का दान साल 1962 में भारत-चाइना वार हुआ तो सरकार ने मदद की गुहार लगाई थी। इसके बाद दरभंगा राज सबसे पहले मदद के लिए आगे आया था। दरभंगा के इंद्रभवन मैदान में 15 मन यानी 600 किलो सोना तौला गया और उसे लड़ाई में मदद के लिए राज परिवार की तरफ से दान में दिया गया था। दरभंगा राज ने अपना तीन-तीन एयरक्रॉफ्ट भी लड़ाई के लिए दान कर दिया। अपना खुद का 90 एकड़ का एयरपोर्ट भी दान कर दिया था। आज इसी जमीन पर दरभंगा एयरपोर्ट बना है। भारत पर आए संकट पर दरभंगा से मदद कुमार कपिलेश्वर बताते हैं, भारत पर जब-जब विपत्ति आई तो दरभंगा राज परिवार ने मदद की। महाराजा कामेश्वर सिंह जी दान में कभी पीछे नहीं रहे। इनके पूर्व के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने इंडियन नेशनल कांग्रेस के फाउंडर रहे एओ ह्यूम को मदद की, जिससे मूवमेंट चलता रहा। फ्रीडम मूवमेंट इंडियन नेशनल कांग्रेस को बचाने के लिए दरभंगा राज ने बड़ा काम किया है। साल 1880 में दरभंगा राज परिवार से ह्यूम को 10 हजार रुपए दिया जाता था। आज भी उनका वह पत्र मौजूदा है, जिसमें उन्होंने लिखा है कि 5 हजार मिला है, अगर 5 हजार और नहीं मिला तो हमारी इंडियन नेशनल कांग्रेस मूवमेंट थम जाएगा। देश को पहली यूनिवर्सिटी देने वाला परिवार इतिहास से गायब बिहार के मिथिला क्षेत्र में लगभग 8380 किलोमीटर के दायरे में फैला दरभंगा राज ने देश को पहली यूनिवर्सिटी दी। दरभंगा राज के अंतिम शासक महाराज बहादुर कामेश्वर सिंह के पोते युवराज कपिलेश्वर सिंह बताते हैं, हमारे परिवार को सरस्वती जी की असीम कृपा रही है। हमारा जो भी राज पाठ है, वह मां सरस्वती की वजह से ही है।’ हम लोगों ने अपना सब कुछ सरस्वती मां को ही अर्पित कर दिया है। महाराज महेश ठाकुर, जिन्हें यह राजपाठ मिला उन्होंने देश का पहला विश्वविद्यालय कोलकाता में बनाया। इसके लिए 230 एकड़ जमीन दान दे दी थी। उनकी इच्छा थी, हिंदू विश्वविद्यालय खोला जाए लेकिन वहां पॉलिटिक्स हो गई थी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के लिए 5 लाख दान कुमार कपिलेश्वर बताते हैं, महाराजा महेश ठाकुर के बेटे रामेश्वर सिंह ने अपने पिता के हिंदू विश्वविद्यालय खोलने के सपने को साकार करने में जुट गए। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में सबसे पहला दान 5 लाख रुपए का दान किया था। मदन मोहन मालवीय जी के साथ घूम-घूमकर राजाओं के घर जाकर दाना लिया। मिथिला के राजा होने के साथ ब्राह्मण थे, इसलिए कोई भी खाली नहीं लौटाता था। वह 5 लाख खुद पहले दे दिए थे, इसलिए जहां भी गए इससे अधिक दान मिला और इससे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। वह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एसोसिएट फाउंडर भी रहे। शिक्षा के लिए दान कर दी जन्म स्थली शिक्षा के क्षेत्र में राज दरबार की तरफ से समाज के लिए बड़ा योगदान रहा है। पटना में दरभंगा हाउस को महाराजा कामेश्वर सिंह ने पटना यूनिवर्सिटी के लिए डोनेट कर दिया था। इलाहाबाद विश्विवद्यालय को दान दिया। दरभंगा में दो-दो यूनिवर्सिटी की स्थापना कराई। खुद संस्कृति के बहुत बड़े ज्ञानी रहे, इसलिए संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना की। कुमार कपिलेश्वर कहते हैं, दरभंगा महाराज का जहां जन्म हुआ, वह स्थान भी शिक्षा के लिए डोनेट कर दिया। इससे समझा जा सकता है कि दरभंगा राज समाज के लिए कितना कुछ किया है, लेकिन सरकार उन्हें भुला रही है। अब तो इतिहास से भी उन्हें हटा दिया गया है। देश को कई विश्वविद्यालय और मेडिकल कॉलेज देने वाले दरभंगा राज के महाराजा को अब इतिहास में जगह नहीं दी जा रही है। इसे देश के लिए बड़ा दुर्भाग्य बताते हुए कुमार कपिलेश्वर कहते हैं, हम लोग पब्लिसिटी के लिए कभी कोई काम नहीं किए, लेकिन अब खामियाजा भुगत रहे हैं। दरभंगा एयरपोर्ट को ही लीजिए, 90 एकड़ जमीन देने के बाद भी महाराजा का नाम तक नहीं है। इंडो चाइना वार में अपना एयरपोर्ट दान करने के बाद भी नाम नहीं मिलना दुर्भाग्य की बात है। टूरिज्म के लिए ब्रांडिंग नहीं कर पाई सरकार राज परिवार मानता है, सरकार टूरिज्म के लिए भी दरभंगा राज की ब्रांडिंग नहीं कर पाई। राजस्थान में लोग इसीलिए जाते हैं, क्योंकि वहां राजवाड़ों की ऐसी ब्रांडिंग की गई है। हवेली महल और अपने ठिकानों को वैसा बनाया है। वहां सरकार भी मदद करती है, इसलिए ऐसा हो सका है। यहां भी ब्रांडिंग सरकार को करनी पड़ेगी। जब नाम देगी तो लाेग इसे देखने के लिए आएंगे। युवा पीढ़ी अतीत जानना चाहती है, सरकार अतीत से दरभंगा राज को गायब कर रही है। जब भी ठाट बाट की बात होती है, आज भी लोग दरभंगा महाराज की उपमा देते हैं। इसके बाद भी सरकार गंभीर नहीं है। बात देश को संकट से बचाने या सुविधा का हो तो दरभंगा राज का कोई तोड़ नहीं रहा। ट्रेन लाने में पूरा योगदान रहा। साल 1874 में तिरहुत रेलवे की नींव भी महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने रखी थी। रेलवे को दरभंगा राज की तरफ से बहुत सारी जमीन दान दी गई। इसके बाद भी महाराजा के नाम से रेल में भी कुछ नहीं है। पटना मेडिकल कॉलेज और पटना यूनिवर्सिटी की नींव रखने वाले आज इतिहास से बाहर हैं। 16 वीं शताब्दी का है दरभंगा राज का इतिहास दरभंगा राज पर शोध करने वाले इतिहासकार डॉ. संतोष कुमार बताते हैं, राज दरभंगा की स्थापना मैथिल ब्राहमण शासकों ने 16वीं शताब्दी के आरंभ में किया था। ब्रिटिश राज के दौरान तत्कालीन बंगाल के 18 सर्किल के 4 हजार 495 गांव दरभंगा नरेश के शासन में थे। दरभंगा राज की स्थापना मूल रूप से संस्कृत के महाज्ञाता महा महोपाध्याय महेश ठाकुर ने किया था। महाराजा राघव सिंह और महाराजा नरेंद्र सिंह राज दरभंगा में अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने अलीवर्दी खान जैसे क्रूर शासक को परास्त कर दिया था। दरभंगा राज के शासन और प्रशासन को देखने के लिए लगभग 7500 अधिकारी नियुक्त किए गए थे। भारत के रजवाड़ों और प्राचीन संस्कृति में दरभंगा राज का अलग ही स्थान था। इतिहासकार डॉ. संतोष बताते हैं, दरभंगा राज के शासक भारत में सबसे बड़े राजाओं में से एक थे। इसलिए पहले राजा फिर महाराजा और फिर महाराजाधिराज कहलाए। दरभंगा के राजा को राजवंश के रूप में मान्यता मिली थी। एशिया के पहले विश्वविद्यालय के लिए 6 लाख का दान दिया था। गांधी से लेकर नेशनल कांग्रेस मूवमेंट तक को मदद करने में दरभंगा राज सबसे आगे रहा है। दरभंगा में कई देश के कई शहरों में महल का निर्माण दरभंगा राज्य के शासन काल में हुआ। दरभंगा राज के दरबारी रहे बिस्मिल्लाह खान इतिहासकार डॉ. संतोष बताते हैं, दरभंगा राज के राजा संगीत कला और संस्कृति के महान संरक्षक रहे हैं। दरभंगा राज से कई प्रसिद्ध संगीतकार जुड़े। पद्मश्री बिस्मिल्ला खान एवं पद्म श्री राम चतुर मलिक तो कई सालों तक दरभंगा राज के दरबारी संगीतकार रहे। देश के प्रख्यात गायक के एल सहगल, गौहर जान, पंडित रामेश्वर पाठक और पंडित सियाराम तिवारी दरभंगा राज से जुड़े थे। दरभंगा राज ध्रुपद के प्रमुख संरक्षक रहे। ध्रुपद शैली में आज भी दरभंगा घराना एक महत्वपूर्ण नाम से जाना जाता है। यूपी सरकार ने अयोध्या के लिए भेजा था विशेष बुलावा दरभंगा महाराज की ख्याति और वैभव के कारण उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अयोध्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर दरभंगा महाराज के उत्तराधिकारी कुमार कपिलेश्वर को विशेष बुलावा पत्र भेजा था। इस अवसर पर यूपी सरकार ने उन्हें राज्य अतिथि बनाया था। कुमार कपिलेश्वर बताते हैं, अयोध्या में भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर उन्हें और उनकी पत्नी कविता और बेटे अरिहंत को आमंत्रित किया गया था। प्रसाद के साथ अशोक सिंहल फाउंडेशन की तरफ से स्मृति चिन्ह भी दिया गया था। दरभंगा राज में रेलवे और हवाई जहाज की सुविधा दरभंगा महाराज पूरी तरह से मॉडर्न सोच वाले रहे। रेलवे और हवाई जहाज तक की सुविधा दरभंगा राज में मौजूद थी। दरभंगा महाराज शिक्षा जगत के साथ-साथ रोजगार सृजन के भी मास्टर रहे। उन्होंने अपनी राजधानी के बीचोंबीच 250 एकड़ जमीन पर अस्पताल बनवा दिया। उस समय रेलवे, बिजली जैसी चीजें दिल्ली के साथ दरभंगा में भी आई थीं। दरभंगा राज के महल में उस समय शानदार सजावट हुई थी। आज भी दीवारों पर लंदन की टाइल्स मौजूद हैं। दरभंगा महाराज ने हिंदी में आर्य भारत, इंग्लिश में इंडियन नेशन और मैथिली में मिथिला मिहिर नाम से अखबार चलाया था। महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह ने शिक्षा और देश की स्वतंत्रता आंदोलन में विशेष योगदान दिया है। दरभंगा राज ने की थी फुटबाल महासंघ की स्थापना दरभंगा राज के राजा विश्वेश्वर सिंह ने अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ की स्थापना दरभंगा से की थी। आज इसकी पहचान देश में फुटबाल के बड़े संघ के रूप में है। फुटबाल के लिए होने वाली संतोष ट्रॉफी के पहले अध्यक्ष भी राजा विश्वेश्वर सिंह रहे हैं। इनकी याद में ही दरभंगा कप का आयोजन हर साल होता है। राज दरबार के राजाओं की कहानी दरभंगा राज के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ गौ रक्षणी सभा की स्थापना की थी। तिरहुत रेलवे के विकास में अभूतपूर्व योगदान दिया। गौ हत्या रोकने के लिए कड़े नियम बनाए थे। दरभंगा के राजा रामेश्वर सिंह को महाराजाधिराज की उपाधि मिली थी। राजा रामेश्वर सिंह का कार्यकाल सनातान धर्म के लिए प्रख्यात रहा। रामेश्वर सिंह एक कट्टर हिंदू राजा के रूप में विख्यात थे और तंत्र विद्या के बहुत बड़े साधक रहे। राजा रामेश्वर सिंह ने देश और विदेश में 100 से अधिक मंदिरों का निर्माण कराया था। राजा कामेश्वर को अंग्रेजों ने सर की उपाधि दी थी। वह महाराजा कामेश्वर सिंह के बड़े बेटे थे। वह 1929 में राज सिंहासन पर बैठे थे। उन्होंने बिहार यूनाइटेड पार्टी की स्थापना की थी। यह पार्टी कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखी जाती थी। संविधान सभा के सदस्य होने के साथ-साथ आजीवन राज्य सभा के सदस्य रहे। बिहार में जब विनाशकारी भूकंप आया तो राजा कामेश्वर ने जनता के लिए अपना पूरा खजाना खोल दिया था। महाराजा सर कामेश्वर सिंह दरभंगा राज के आखिरी महाराजा रहे। राज कुमार सुभेश्वर सिंह राजबहादुर विश्वेश्वर सिंह के पुत्र थे। इनकी ख्याति शिक्षा के विकास में सबसे अधिक रही। कई यूनिवर्सिटी के साथ कॉलेजों की स्थापना और प्रसार में अहम भूमिका निभाई। दरभंगा राज के मौजूदा उत्तराधिकारी कुमार कपिलेश्वर दो भाई हैं। बड़े राजकुमार अमेरिका में रहते हैं, जबकि छोटे कुमार कपिलेश्वर दरभंगा में रहकर राज पाठ की देखरेख करते हैं। कुमार कपिलेश्वर भी अपने पूर्वजों की तरह ही मिथिलांचल में विख्यात हैं। खेल स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ मिथिलांचल के विभिन्न धार्मिक व सामाजिक संगठनों के लिए काम कर रहे हैं। इसके साथ राजनगर रिलीजियस ट्रस्ट के अधीन आने वाले 11 मंदिरों के ट्रस्टी भी हैं। इतिहासकार डॉ. संतोष बताते हैं, दरभंगा राज मैथिल ब्राह्मण हैं, लेकिन श्वेत ब्राह्मण टाइटल सिंह लगाते हैं।