कभी देहरादून शहर की पहचान रहीं रिस्पना नदी और बिंदाल नदी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। जिन नदियों से शहर को सिंचाई और पेयजल का बड़ा सहारा मिलता था, वही नदियां अब कूड़ा, सीवर और अतिक्रमण का भार ढोने को मजबूर हैं। शहर के बीच से गुजरते हुए इन नदियों का पानी कई जगह पूरी तरह सूख चुका है। हालात ऐसे हैं कि नदी तल अब बहाव का रास्ता नहीं, बल्कि कूड़ा फेंकने की जगह बनता जा रहा है। जगह-जगह खुले सीवर सीधे नदियों में गिर रहे हैं, जिससे ये नदियां धीरे-धीरे नालों में तब्दील हो रही हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि हालात सबके सामने होने के बावजूद नदियों को बचाने के ठोस और असरदार प्रयास जमीन पर नजर नहीं आ रहे। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अभी भी प्राकृतिक विज्ञान के मुताबिक काम नहीं हुआ, तो देहरादून आने वाले समय में अपनी शहरी नदियों को पूरी तरह खो सकता है। नदियों के सूखने के पीछे सिर्फ एक वजह नहीं रिस्पना और बिंदाल के सूखने की कहानी किसी एक कारण तक सीमित नहीं है। अंधाधुंध वन कटाव ने इनके कैचमेंट और रीचार्ज एरिया को कमजोर कर दिया। तेजी से फैलता शहर, बढ़ती जनसंख्या और बढ़ता जैविक प्रदूषण भी इन नदियों पर लगातार दबाव बना रहा है। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन ने बारिश के पैटर्न को बिगाड़ दिया है। कभी लंबा सूखा, तो कभी अचानक तेज बारिश और बादल फटने जैसी घटनाएं नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और रीचार्ज सिस्टम को नुकसान पहुंचा रही हैं। ऊपर से शहर का सीवर और कूड़ा इन नदियों की अस्मिता पर सीधा वार कर रहा है। 10–15 साल में खत्म होती गई क्वालिटी और क्वांटिटी स्प्रिंग शेड एंड रिवर रिजुवेनेशन एजेंसी (SARA) की अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी कहकशां नसीम के मुताबिक, पिछले 10–15 सालों में देहरादून का तेजी से विस्तार हुआ। इससे पूरे शहरी क्षेत्र में बायोटिक प्रेशर बढ़ा और आसपास के जंगलों पर भी सीधा असर पड़ा। उनका कहना है कि जंगलों पर दबाव बढ़ने से नदियों का प्राकृतिक स्राव कम हुआ। साथ ही अचानक बारिश, बाढ़ और अन्य जलवायु घटनाओं ने रीचार्ज जोन को प्रभावित किया। यही वजह है कि धीरे-धीरे इन नदियों के पानी की क्वालिटी और क्वांटिटी दोनों खत्म होती चली गईं। रिस्पना के कैचमेंट एरिया को रीचार्ज करने के लिए पहले भी तलानी-गाड़ और चामा-सारी क्षेत्रों में काम हुआ है, जबकि सांग नदी के रीचार्ज के लिए अभी वृहद स्तर पर प्रयास चल रहे हैं। प्रकृति और नदियों के विज्ञान को नहीं समझ पाए पर्यावरणविद अनिल जोशी कहते हैं कि देश-दुनिया में शहरों से निकलने वाली अधिकांश नदियां आज सूख रही हैं या नालों में बदल चुकी हैं। मानसून के दौरान जरूर ये उग्र रूप दिखाती हैं, लेकिन बाकी समय इनकी पहचान सिर्फ कूड़ा ढोने तक सीमित रह गई है। जोशी के मुताबिक, सरकारों ने नदियों को बचाने की कोशिशें कीं, लेकिन ज्यादा सफलता इसलिए नहीं मिली क्योंकि हम अब तक प्रकृति और नदियों के विज्ञान को सही ढंग से समझ ही नहीं पाए। न नदी हमने बनाई, न जंगल हमने बसाए ये प्रकृति की देन हैं और इन्हें उसी तरीके से संभालना होगा। वनविहीन होते कैचमेंट एरिया ने तोड़ी कमर जोशी बताते हैं कि नदियों को जीवन देने वाले वाटरशेड और कैचमेंट एरिया आज वन-विहीन हो चुके हैं। वनों के कुप्रबंधन और अतिक्रमण ने इन इलाकों को कमजोर किया है। जंगल सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देते, बल्कि जल-छिद्रों को सींचने का भी काम करते हैं। वन कटने से जल-छिद्रों तक पानी नहीं पहुंच पा रहा, नतीजा यह कि पानी नदियों में टिक नहीं रहा और बहाव धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। ऐसे संभव है नदियों की वापसी अनिल जोशी कहते हैं कि नदियों की वापसी नामुमकिन नहीं है, लेकिन इसके लिए प्राकृतिक तरीकों से काम करना होगा। उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि देहरादून के शुक्ला-पुर स्थित हेस्को नदी 2009 के आसपास पूरी तरह सूख गई थी। इसके बाद आसपास 1200 से ज्यादा जल-छिद्र बनाए गए और बड़े पैमाने पर वन लगाए गए। बारिश का पानी जमीन में समाया, नमी बनी और 2010-11 के आसपास नदी फिर से जीवित हो गई। आज उसमें सालभर पानी रहता है। इसके साथ-साथ पूरा इकोसिस्टम और भोजन श्रृंखला भी विकसित हुई। ऐसे प्रयोग बिहार, यूपी और पहाड़ों के कई इलाकों में सफल रहे हैं। सरकार और नगर निगम से एक्शन की मांग समाजसेवी और स्थानीय निवासी सुशांत मोहन कहते हैं कि उत्तराखंड से निकलने वाले छोटे नदी-नाले आगे चलकर गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियों में मिलते हैं। अगर ये दूषित होंगे, तो बड़ी नदियां भी प्रभावित होंगी। उनका कहना है कि रिस्पना जैसी प्रमुख नदी आज गंभीर रूप से प्रदूषित हो चुकी है। नगर निगम और स्मार्ट सिटी को चाहिए कि जहां-जहां लोग नदी को डंपिंग ग्राउंड बना रहे हैं, वहां कैमरे लगाए जाएं और कूड़ा फेंकने वालों पर चालान हो। कई साल पहले लगाए गए बारकोड सिस्टम आज तक सक्रिय नहीं हो पाए, जबकि उनका उद्देश्य कूड़ा प्रबंधन को दुरुस्त करना था। जनवरी की बारिश भी दे रही चेतावनी देहरादून में बारिश का पैटर्न लगातार बदल रहा है। जनवरी महीने में 2017 से 2025 के बीच कभी 149.6 मिमी तक बारिश हुई, तो 2024 में शून्य और 2025 में सिर्फ 7 मिमी बारिश दर्ज की गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह असंतुलन भी नदियों के सूखने और रीचार्ज सिस्टम के कमजोर होने का बड़ा संकेत है।
कभी देहरादून शहर की पहचान रहीं रिस्पना नदी और बिंदाल नदी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। जिन नदियों से शहर को सिंचाई और पेयजल का बड़ा सहारा मिलता था, वही नदियां अब कूड़ा, सीवर और अतिक्रमण का भार ढोने को मजबूर हैं। शहर के बीच से गुजरते हुए इन नदियों का पानी कई जगह पूरी तरह सूख चुका है। हालात ऐसे हैं कि नदी तल अब बहाव का रास्ता नहीं, बल्कि कूड़ा फेंकने की जगह बनता जा रहा है। जगह-जगह खुले सीवर सीधे नदियों में गिर रहे हैं, जिससे ये नदियां धीरे-धीरे नालों में तब्दील हो रही हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि हालात सबके सामने होने के बावजूद नदियों को बचाने के ठोस और असरदार प्रयास जमीन पर नजर नहीं आ रहे। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अभी भी प्राकृतिक विज्ञान के मुताबिक काम नहीं हुआ, तो देहरादून आने वाले समय में अपनी शहरी नदियों को पूरी तरह खो सकता है। नदियों के सूखने के पीछे सिर्फ एक वजह नहीं रिस्पना और बिंदाल के सूखने की कहानी किसी एक कारण तक सीमित नहीं है। अंधाधुंध वन कटाव ने इनके कैचमेंट और रीचार्ज एरिया को कमजोर कर दिया। तेजी से फैलता शहर, बढ़ती जनसंख्या और बढ़ता जैविक प्रदूषण भी इन नदियों पर लगातार दबाव बना रहा है। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन ने बारिश के पैटर्न को बिगाड़ दिया है। कभी लंबा सूखा, तो कभी अचानक तेज बारिश और बादल फटने जैसी घटनाएं नदियों के प्राकृतिक प्रवाह और रीचार्ज सिस्टम को नुकसान पहुंचा रही हैं। ऊपर से शहर का सीवर और कूड़ा इन नदियों की अस्मिता पर सीधा वार कर रहा है। 10–15 साल में खत्म होती गई क्वालिटी और क्वांटिटी स्प्रिंग शेड एंड रिवर रिजुवेनेशन एजेंसी (SARA) की अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी कहकशां नसीम के मुताबिक, पिछले 10–15 सालों में देहरादून का तेजी से विस्तार हुआ। इससे पूरे शहरी क्षेत्र में बायोटिक प्रेशर बढ़ा और आसपास के जंगलों पर भी सीधा असर पड़ा। उनका कहना है कि जंगलों पर दबाव बढ़ने से नदियों का प्राकृतिक स्राव कम हुआ। साथ ही अचानक बारिश, बाढ़ और अन्य जलवायु घटनाओं ने रीचार्ज जोन को प्रभावित किया। यही वजह है कि धीरे-धीरे इन नदियों के पानी की क्वालिटी और क्वांटिटी दोनों खत्म होती चली गईं। रिस्पना के कैचमेंट एरिया को रीचार्ज करने के लिए पहले भी तलानी-गाड़ और चामा-सारी क्षेत्रों में काम हुआ है, जबकि सांग नदी के रीचार्ज के लिए अभी वृहद स्तर पर प्रयास चल रहे हैं। प्रकृति और नदियों के विज्ञान को नहीं समझ पाए पर्यावरणविद अनिल जोशी कहते हैं कि देश-दुनिया में शहरों से निकलने वाली अधिकांश नदियां आज सूख रही हैं या नालों में बदल चुकी हैं। मानसून के दौरान जरूर ये उग्र रूप दिखाती हैं, लेकिन बाकी समय इनकी पहचान सिर्फ कूड़ा ढोने तक सीमित रह गई है। जोशी के मुताबिक, सरकारों ने नदियों को बचाने की कोशिशें कीं, लेकिन ज्यादा सफलता इसलिए नहीं मिली क्योंकि हम अब तक प्रकृति और नदियों के विज्ञान को सही ढंग से समझ ही नहीं पाए। न नदी हमने बनाई, न जंगल हमने बसाए ये प्रकृति की देन हैं और इन्हें उसी तरीके से संभालना होगा। वनविहीन होते कैचमेंट एरिया ने तोड़ी कमर जोशी बताते हैं कि नदियों को जीवन देने वाले वाटरशेड और कैचमेंट एरिया आज वन-विहीन हो चुके हैं। वनों के कुप्रबंधन और अतिक्रमण ने इन इलाकों को कमजोर किया है। जंगल सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देते, बल्कि जल-छिद्रों को सींचने का भी काम करते हैं। वन कटने से जल-छिद्रों तक पानी नहीं पहुंच पा रहा, नतीजा यह कि पानी नदियों में टिक नहीं रहा और बहाव धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। ऐसे संभव है नदियों की वापसी अनिल जोशी कहते हैं कि नदियों की वापसी नामुमकिन नहीं है, लेकिन इसके लिए प्राकृतिक तरीकों से काम करना होगा। उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि देहरादून के शुक्ला-पुर स्थित हेस्को नदी 2009 के आसपास पूरी तरह सूख गई थी। इसके बाद आसपास 1200 से ज्यादा जल-छिद्र बनाए गए और बड़े पैमाने पर वन लगाए गए। बारिश का पानी जमीन में समाया, नमी बनी और 2010-11 के आसपास नदी फिर से जीवित हो गई। आज उसमें सालभर पानी रहता है। इसके साथ-साथ पूरा इकोसिस्टम और भोजन श्रृंखला भी विकसित हुई। ऐसे प्रयोग बिहार, यूपी और पहाड़ों के कई इलाकों में सफल रहे हैं। सरकार और नगर निगम से एक्शन की मांग समाजसेवी और स्थानीय निवासी सुशांत मोहन कहते हैं कि उत्तराखंड से निकलने वाले छोटे नदी-नाले आगे चलकर गंगा और यमुना जैसी बड़ी नदियों में मिलते हैं। अगर ये दूषित होंगे, तो बड़ी नदियां भी प्रभावित होंगी। उनका कहना है कि रिस्पना जैसी प्रमुख नदी आज गंभीर रूप से प्रदूषित हो चुकी है। नगर निगम और स्मार्ट सिटी को चाहिए कि जहां-जहां लोग नदी को डंपिंग ग्राउंड बना रहे हैं, वहां कैमरे लगाए जाएं और कूड़ा फेंकने वालों पर चालान हो। कई साल पहले लगाए गए बारकोड सिस्टम आज तक सक्रिय नहीं हो पाए, जबकि उनका उद्देश्य कूड़ा प्रबंधन को दुरुस्त करना था। जनवरी की बारिश भी दे रही चेतावनी देहरादून में बारिश का पैटर्न लगातार बदल रहा है। जनवरी महीने में 2017 से 2025 के बीच कभी 149.6 मिमी तक बारिश हुई, तो 2024 में शून्य और 2025 में सिर्फ 7 मिमी बारिश दर्ज की गई। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह असंतुलन भी नदियों के सूखने और रीचार्ज सिस्टम के कमजोर होने का बड़ा संकेत है।