राजस्थान हाईकोर्ट ने अजमेर डिस्कॉम को बहू की सैलरी से ससुर को 20 हजार रुपए देने के आदेश दिए हैं। जोधपुर बेंच के जस्टिस फरजंद अली ने अनुकंपा नियुक्ति के एक मामले में यह फैसला सुनाया है। मामला अलवर जिले के खेरली का है। हाईकोर्ट ने डिस्कॉम को आदेश दिए कि बहू शशि कुमारी के वेतन से हर महीने 20 हजार रुपए काटकर ससुर भगवान सिंह सैनी के बैंक खाते में जमा किए जाएं। यह कटौती 1 नवंबर 2025 से प्रभावी होगी और भगवान सिंह के जीवनकाल तक जारी रहेगी। इससे पहले कोर्ट ने 10 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे 29 अक्टूबर को सुनाया गया। हाईकोर्ट ने कहा- जब ऐसे परिवार के एक सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिया जाता है, तो यह व्यक्तिगत क्षमता में नहीं बल्कि पूरे परिवार के प्रतिनिधि के रूप में दिया जाता है। इसलिए इसके साथ अन्य जीवित आश्रितों के हितों की रक्षा करने और उनके भरण-पोषण को सुनिश्चित करने की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी आती है। बहू को अनुकंपा नियुक्ति देने की सिफारिश की थी
दरअसल, अलवर में कठूमर के खेरली निवासी भगवान सिंह सैनी ने रिट याचिका दायर की थी। उनका बेटा राजेश कुमार अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में तकनीकी सहायक के पद पर कार्यरत था। 15 सितंबर 2015 को सेवा के दौरान उसका निधन हो गया। राजेश की मौत के बाद विभाग ने 21 सितंबर और 26 सितंबर 2015 को पत्र जारी कर भगवान सिंह को अनुकंपा नियुक्ति के तहत आवेदन करने का निर्देश दिया। राजेश की पत्नी शशि कुमारी ने भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। अनुकंपा नियुक्ति का प्रस्ताव सबसे पहले भगवान सिंह को दिया गया था। लेकिन उन्होंने उदारता या किन्हीं अन्य कारणों से स्वेच्छा से सिफारिश की कि यह अनुकंपा नियुक्ति उनकी जगह बहू को दी जाए। इस सिफारिश के बाद 11 मार्च 2016 को अजमेर डिस्कॉम ने शशि कुमारी को अनुकंपा के आधार पर LDC के पद पर नियुक्त किया। बहू ने वचन पूरे नहीं किए
नियुक्ति के समय शशि कुमारी ने 19 अक्टूबर 2015 को एक शपथ पत्र दिया था, जिसमें तीन वचन दिए गए थे। पहला, वह अपने पति के माता-पिता के साथ रहेगी और उनका भरण-पोषण करेगी। दूसरा, वह उनके कल्याण की पूर्ण जिम्मेदारी लेगी। तीसरा, वह दूसरी शादी नहीं करेगी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि वह शपथ पत्र झूठा था, क्योंकि शशि कुमारी उस समय अपने माता-पिता के साथ अलग रह रही थी। खेरली कठूमर नगर पालिका के अध्यक्ष की जांच रिपोर्ट से भी यह पुष्टि हुई कि पति की मौत के मात्र 18 दिनों के भीतर ही शशि कुमारी ने ससुराल छोड़ दिया और अपने माता-पिता के साथ रहने लगी। योग्यता से नहीं मिली यह नियुक्ति
जस्टिस फरजंद अली ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि शशि कुमारी को यह नियुक्ति उनकी व्यक्तिगत योग्यता, क्षमता या पात्रता के आधार पर नहीं मिली। कोई विज्ञापन नहीं निकाला गया, कोई प्रतिस्पर्धी चयन नहीं हुआ और न ही उन्होंने कोई लिखित परीक्षा या साक्षात्कार दिया। यह राज्य की ओर से एक दयापूर्ण कार्य था जो अपने दिवंगत कर्मचारियों के आश्रितों की रक्षा और सहायता के लिए किया गया। दयनीय स्थिति में दायर की याचिका
नगर पालिका अध्यक्ष की रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया कि भगवान सिंह बुजुर्ग हैं। उनके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है और वे गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। बहू ने नियुक्ति तो ले ली, लेकिन सास-ससुर का भरण-पोषण नहीं किया। बुजुर्ग ने 3 जून 2017 को अधीक्षण अभियंता को रिप्रजेंटेशन भेजा और 7 दिसंबर 2017 को रजिस्टर्ड नोटिस भी भेजा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद साल 2018 में उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर शशि कुमारी के वेतन का 50 प्रतिशत हिस्सा उनके बैंक खाते में जमा कराने की मांग की। वादे से पीछे नहीं हट सकती
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रॉमिसरी एस्टॉपल (वचन से प्रतिबंध) का सिद्धांत पूरी तरह लागू होता है। जब शशि कुमारी ने एक विशिष्ट आश्वासन देकर लाभ प्राप्त किया, तो अब वह संबंधित दायित्व से मुकर नहीं सकती। कोर्ट ने कहा कि शशि कुमारी ने शपथ पत्र की ताकत पर रोजगार प्राप्त किया। इसलिए वह अब उस वादे से पीछे नहीं हट सकती, जो उसे दिए गए लाभ का आधार था। बहू को मिला 70 प्रतिशत मुआवजा
रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि अनुकंपा नियुक्ति के बाद शशि कुमारी ने भविष्य निधि और मुआवजे की राशि का लगभग 70 प्रतिशत भी प्राप्त किया। इसके बावजूद उन्होंने सास-ससुर को छोड़ दिया और कहीं और रह रही हैं। प्रतिवादी के वकील ने स्वीकार किया कि उन्होंने पुनर्विवाह किया है, जिसके कारण उनका तर्क था कि उनका पूर्व सास-ससुर का भरण-पोषण करने का कानूनी कर्तव्य समाप्त हो गया। कोर्ट के फैसले में हर पहलू
याचिकाकर्ता की उम्र, मेडिकल कंडीशन, बेटे पर उनकी निर्भरता और बहू के शपथ पत्र से उत्पन्न नैतिक व न्यायसंगत दायित्व को देखते हुए कोर्ट ने निर्णय दिया कि 1 नवंबर 2025 से विभाग शशि कुमारी के वेतन से 20,000 रुपए प्रति माह की कटौती सुनिश्चित करेगा। यह राशि सीधे याचिकाकर्ता के बैंक खाते में उनके भरण-पोषण के लिए जमा की जाएगी। यह व्यवस्था याचिकाकर्ता के जीवनकाल तक या सक्षम प्राधिकारी के आगे के आदेश तक जारी रहेगी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अजमेर डिस्कॉम को बहू की सैलरी से ससुर को 20 हजार रुपए देने के आदेश दिए हैं। जोधपुर बेंच के जस्टिस फरजंद अली ने अनुकंपा नियुक्ति के एक मामले में यह फैसला सुनाया है। मामला अलवर जिले के खेरली का है। हाईकोर्ट ने डिस्कॉम को आदेश दिए कि बहू शशि कुमारी के वेतन से हर महीने 20 हजार रुपए काटकर ससुर भगवान सिंह सैनी के बैंक खाते में जमा किए जाएं। यह कटौती 1 नवंबर 2025 से प्रभावी होगी और भगवान सिंह के जीवनकाल तक जारी रहेगी। इससे पहले कोर्ट ने 10 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे 29 अक्टूबर को सुनाया गया। हाईकोर्ट ने कहा- जब ऐसे परिवार के एक सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिया जाता है, तो यह व्यक्तिगत क्षमता में नहीं बल्कि पूरे परिवार के प्रतिनिधि के रूप में दिया जाता है। इसलिए इसके साथ अन्य जीवित आश्रितों के हितों की रक्षा करने और उनके भरण-पोषण को सुनिश्चित करने की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी आती है। बहू को अनुकंपा नियुक्ति देने की सिफारिश की थी
दरअसल, अलवर में कठूमर के खेरली निवासी भगवान सिंह सैनी ने रिट याचिका दायर की थी। उनका बेटा राजेश कुमार अजमेर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड में तकनीकी सहायक के पद पर कार्यरत था। 15 सितंबर 2015 को सेवा के दौरान उसका निधन हो गया। राजेश की मौत के बाद विभाग ने 21 सितंबर और 26 सितंबर 2015 को पत्र जारी कर भगवान सिंह को अनुकंपा नियुक्ति के तहत आवेदन करने का निर्देश दिया। राजेश की पत्नी शशि कुमारी ने भी अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। अनुकंपा नियुक्ति का प्रस्ताव सबसे पहले भगवान सिंह को दिया गया था। लेकिन उन्होंने उदारता या किन्हीं अन्य कारणों से स्वेच्छा से सिफारिश की कि यह अनुकंपा नियुक्ति उनकी जगह बहू को दी जाए। इस सिफारिश के बाद 11 मार्च 2016 को अजमेर डिस्कॉम ने शशि कुमारी को अनुकंपा के आधार पर LDC के पद पर नियुक्त किया। बहू ने वचन पूरे नहीं किए
नियुक्ति के समय शशि कुमारी ने 19 अक्टूबर 2015 को एक शपथ पत्र दिया था, जिसमें तीन वचन दिए गए थे। पहला, वह अपने पति के माता-पिता के साथ रहेगी और उनका भरण-पोषण करेगी। दूसरा, वह उनके कल्याण की पूर्ण जिम्मेदारी लेगी। तीसरा, वह दूसरी शादी नहीं करेगी। याचिकाकर्ता का आरोप है कि वह शपथ पत्र झूठा था, क्योंकि शशि कुमारी उस समय अपने माता-पिता के साथ अलग रह रही थी। खेरली कठूमर नगर पालिका के अध्यक्ष की जांच रिपोर्ट से भी यह पुष्टि हुई कि पति की मौत के मात्र 18 दिनों के भीतर ही शशि कुमारी ने ससुराल छोड़ दिया और अपने माता-पिता के साथ रहने लगी। योग्यता से नहीं मिली यह नियुक्ति
जस्टिस फरजंद अली ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि शशि कुमारी को यह नियुक्ति उनकी व्यक्तिगत योग्यता, क्षमता या पात्रता के आधार पर नहीं मिली। कोई विज्ञापन नहीं निकाला गया, कोई प्रतिस्पर्धी चयन नहीं हुआ और न ही उन्होंने कोई लिखित परीक्षा या साक्षात्कार दिया। यह राज्य की ओर से एक दयापूर्ण कार्य था जो अपने दिवंगत कर्मचारियों के आश्रितों की रक्षा और सहायता के लिए किया गया। दयनीय स्थिति में दायर की याचिका
नगर पालिका अध्यक्ष की रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया कि भगवान सिंह बुजुर्ग हैं। उनके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं है और वे गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। बहू ने नियुक्ति तो ले ली, लेकिन सास-ससुर का भरण-पोषण नहीं किया। बुजुर्ग ने 3 जून 2017 को अधीक्षण अभियंता को रिप्रजेंटेशन भेजा और 7 दिसंबर 2017 को रजिस्टर्ड नोटिस भी भेजा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद साल 2018 में उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर शशि कुमारी के वेतन का 50 प्रतिशत हिस्सा उनके बैंक खाते में जमा कराने की मांग की। वादे से पीछे नहीं हट सकती
हाईकोर्ट ने कहा कि प्रॉमिसरी एस्टॉपल (वचन से प्रतिबंध) का सिद्धांत पूरी तरह लागू होता है। जब शशि कुमारी ने एक विशिष्ट आश्वासन देकर लाभ प्राप्त किया, तो अब वह संबंधित दायित्व से मुकर नहीं सकती। कोर्ट ने कहा कि शशि कुमारी ने शपथ पत्र की ताकत पर रोजगार प्राप्त किया। इसलिए वह अब उस वादे से पीछे नहीं हट सकती, जो उसे दिए गए लाभ का आधार था। बहू को मिला 70 प्रतिशत मुआवजा
रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि अनुकंपा नियुक्ति के बाद शशि कुमारी ने भविष्य निधि और मुआवजे की राशि का लगभग 70 प्रतिशत भी प्राप्त किया। इसके बावजूद उन्होंने सास-ससुर को छोड़ दिया और कहीं और रह रही हैं। प्रतिवादी के वकील ने स्वीकार किया कि उन्होंने पुनर्विवाह किया है, जिसके कारण उनका तर्क था कि उनका पूर्व सास-ससुर का भरण-पोषण करने का कानूनी कर्तव्य समाप्त हो गया। कोर्ट के फैसले में हर पहलू
याचिकाकर्ता की उम्र, मेडिकल कंडीशन, बेटे पर उनकी निर्भरता और बहू के शपथ पत्र से उत्पन्न नैतिक व न्यायसंगत दायित्व को देखते हुए कोर्ट ने निर्णय दिया कि 1 नवंबर 2025 से विभाग शशि कुमारी के वेतन से 20,000 रुपए प्रति माह की कटौती सुनिश्चित करेगा। यह राशि सीधे याचिकाकर्ता के बैंक खाते में उनके भरण-पोषण के लिए जमा की जाएगी। यह व्यवस्था याचिकाकर्ता के जीवनकाल तक या सक्षम प्राधिकारी के आगे के आदेश तक जारी रहेगी।