पंजाब के कई शहरों में दशहरे की तैयारियां तेज हो गई हैं। अमृतसर, जालंधर और लुधियाना जैसे बड़े शहरों में रावण के पुतले बनाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि यहां तैयार होने वाले पुतले सिर्फ पंजाब में ही नहीं, बल्कि विदेश में भी जलाए जाते हैं। इसके लिए विदेश से ऑर्डर आते हैं और फिर यहां से रावण के सिर बनाकर भेजे जाते हैं। ये ऑर्डर ज्यादातर भारतीय मूल के लोगों की ओर से आते हैं, जो विदेश में भी दशहरा धूमधाम से मनाते हैं। इस बार दशहरा 2 अक्टूबर को मनाया जाएगा। अमृतसर के विनोद कुमार बनवारी लाल का परिवार पिछली 5 पीढ़ियों से रावण के पुतले बनाने का काम कर रहा है। यह परिवार सालों से विदेश भी पुतले कोरियर करता रहा है। इस बार भी परिवार को 12 रावण के सिरों का ऑर्डर मिला है। हालांकि, यह पिछले बार की तुलना में 3 कम है। विनोद बताते हैं, “हमें लंदन से रावण के चेहरे बनाने का ऑर्डर मिला है। यह कोई पहली बार नहीं है। कई सालों से हम ऐसे ऑर्डर बना रहे हैं।” इस साल 12 चेहरों का ऑर्डर मिला
विनोद कुमार बताते हैं कि पूरा रावण विदेश भेजना मुश्किल होता है, इसलिए वे सिर्फ रावण के चेहरे ही लंदन भेजते हैं। वहां जाकर स्थानीय लोग उन चेहरों को इस्तेमाल कर रावण के पुतले तैयार करते हैं। इस साल उन्हें करीब 12 रावणों के चेहरे बनाने का ऑर्डर मिला है। आमतौर पर यह संख्या 15 तक भी पहुंच जाती है। उन्होंने यह कला अपने दादा और पिता से सीखी, जिसमें उन्हें कई साल लग गए। बाकी शरीर के हिस्से तो एक अंदाज से बन जाते हैं, लेकिन चेहरा सबसे पेचीदा और अहम होता है। विदेश भेजे जाते हैं 2 से ढाई फीट के चेहरे
विनोद कुमार ने बताया कि वे रावण के चेहरों को कोरियर के माध्यम से विदेश भेजते हैं, खासकर लंदन। इस कोरियर का पूरा खर्च वहां ऑर्डर देने वाले लोग खुद उठाते हैं। इस बार सभी चेहरे भेजने में लगभग 80 हजार रुपए का खर्च आया है।चेहरे आमतौर पर 2 से ढाई फीट लंबे बनाए जाते हैं। 30 से 35 फीट ऊंचे रावण तैयार किए जाते
विनोद बताते हैं कि अगर इससे बड़े चेहरे बनाए जाएं, तो कोरियर से भेजना मुश्किल हो जाता है, ऐसे में उनके टूटने या खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।ये चेहरे वहां पहुंचने के बाद स्थानीय कारीगरों द्वारा रावण के पुतलों में लगाए जाते हैं, और फिर उन्हीं चेहरों को इस्तेमाल कर 30 से 35 फीट ऊंचे रावण तैयार किए जाते हैं, जिनका दशहरे के दिन दहन किया जाता है। 100 फीट ऊंचा रावण जलेगा अमृतसर में
इस बार विनोद कुमार और उनका परिवार 100 फीट ऊंचा रावण बना रहे हैं, जो अमृतसर का सबसे बड़ा रावण होगा। विनोद का कहना है कि यह सिर्फ एक पुतला नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और कला का प्रतीक है। वह मानते हैं कि दशहरे की रौनक में अमृतसर सिर्फ अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेज नहीं रहा, बल्कि अब यह कला देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुंच रही है। हम नहीं बनाएंगे तो परंपरा खत्म हो जाएगी
विनोद कुमार कहते हैं कि रावण बनाने की कला उनके परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही है। अगर वे और उनका परिवार इसे जारी नहीं रखेंगे, तो ये परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो सकती है। विनोद बताते हैं कि यह परंपरा उनके दादा जी ने शुरू की थी, और आज उनका परिवार अमृतसर में रावण बनाने वालों में सबसे आगे माना जाता है। अफसर भी बन जाएं, परंपरा नहीं छोड़ेंगे
विनोद कुमार का कहना है कि रावण बनाना उनके लिए एक धरोहर है, जिसे उनका परिवार पीढ़ियों से सहेज रहा है। वे मानते हैं कि चाहे जिंदगी में कुछ भी बन जाएं, अफसर भी, लेकिन यह परंपरा कभी नहीं छोड़ेंगे। दिलचस्प बात यह है कि अब उनकी बेटी भी इस कला को सीख रही है। वह देहरादून पढ़ती है, लेकिन हर साल अमृतसर आकर रावण बनाने में मदद करती है। इस बार ऑर्डर कम, बाढ़ का असर
विनोद कुमार ने बताया कि इस बार पंजाब में आई बाढ़ ने उनके काम पर भी असर डाला है। हर साल अजनाला और अमृतसर के आसपास के गांवों से बड़े-बड़े रावणों के ऑर्डर आया करते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार गांव के लोगों ने कहा कि रावण बनाने पर खर्च होने वाले पैसे बाढ़ पीड़ितों की मदद में देना चाहते हैं। यह सुनकर दिल को तसल्ली मिली कि त्योहार से बड़ा इंसानियत का त्योहार होता है।
पंजाब के कई शहरों में दशहरे की तैयारियां तेज हो गई हैं। अमृतसर, जालंधर और लुधियाना जैसे बड़े शहरों में रावण के पुतले बनाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि यहां तैयार होने वाले पुतले सिर्फ पंजाब में ही नहीं, बल्कि विदेश में भी जलाए जाते हैं। इसके लिए विदेश से ऑर्डर आते हैं और फिर यहां से रावण के सिर बनाकर भेजे जाते हैं। ये ऑर्डर ज्यादातर भारतीय मूल के लोगों की ओर से आते हैं, जो विदेश में भी दशहरा धूमधाम से मनाते हैं। इस बार दशहरा 2 अक्टूबर को मनाया जाएगा। अमृतसर के विनोद कुमार बनवारी लाल का परिवार पिछली 5 पीढ़ियों से रावण के पुतले बनाने का काम कर रहा है। यह परिवार सालों से विदेश भी पुतले कोरियर करता रहा है। इस बार भी परिवार को 12 रावण के सिरों का ऑर्डर मिला है। हालांकि, यह पिछले बार की तुलना में 3 कम है। विनोद बताते हैं, “हमें लंदन से रावण के चेहरे बनाने का ऑर्डर मिला है। यह कोई पहली बार नहीं है। कई सालों से हम ऐसे ऑर्डर बना रहे हैं।” इस साल 12 चेहरों का ऑर्डर मिला
विनोद कुमार बताते हैं कि पूरा रावण विदेश भेजना मुश्किल होता है, इसलिए वे सिर्फ रावण के चेहरे ही लंदन भेजते हैं। वहां जाकर स्थानीय लोग उन चेहरों को इस्तेमाल कर रावण के पुतले तैयार करते हैं। इस साल उन्हें करीब 12 रावणों के चेहरे बनाने का ऑर्डर मिला है। आमतौर पर यह संख्या 15 तक भी पहुंच जाती है। उन्होंने यह कला अपने दादा और पिता से सीखी, जिसमें उन्हें कई साल लग गए। बाकी शरीर के हिस्से तो एक अंदाज से बन जाते हैं, लेकिन चेहरा सबसे पेचीदा और अहम होता है। विदेश भेजे जाते हैं 2 से ढाई फीट के चेहरे
विनोद कुमार ने बताया कि वे रावण के चेहरों को कोरियर के माध्यम से विदेश भेजते हैं, खासकर लंदन। इस कोरियर का पूरा खर्च वहां ऑर्डर देने वाले लोग खुद उठाते हैं। इस बार सभी चेहरे भेजने में लगभग 80 हजार रुपए का खर्च आया है।चेहरे आमतौर पर 2 से ढाई फीट लंबे बनाए जाते हैं। 30 से 35 फीट ऊंचे रावण तैयार किए जाते
विनोद बताते हैं कि अगर इससे बड़े चेहरे बनाए जाएं, तो कोरियर से भेजना मुश्किल हो जाता है, ऐसे में उनके टूटने या खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।ये चेहरे वहां पहुंचने के बाद स्थानीय कारीगरों द्वारा रावण के पुतलों में लगाए जाते हैं, और फिर उन्हीं चेहरों को इस्तेमाल कर 30 से 35 फीट ऊंचे रावण तैयार किए जाते हैं, जिनका दशहरे के दिन दहन किया जाता है। 100 फीट ऊंचा रावण जलेगा अमृतसर में
इस बार विनोद कुमार और उनका परिवार 100 फीट ऊंचा रावण बना रहे हैं, जो अमृतसर का सबसे बड़ा रावण होगा। विनोद का कहना है कि यह सिर्फ एक पुतला नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा और कला का प्रतीक है। वह मानते हैं कि दशहरे की रौनक में अमृतसर सिर्फ अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेज नहीं रहा, बल्कि अब यह कला देश की सीमाओं को पार कर विदेशों तक पहुंच रही है। हम नहीं बनाएंगे तो परंपरा खत्म हो जाएगी
विनोद कुमार कहते हैं कि रावण बनाने की कला उनके परिवार में पीढ़ियों से चली आ रही है। अगर वे और उनका परिवार इसे जारी नहीं रखेंगे, तो ये परंपरा धीरे-धीरे खत्म हो सकती है। विनोद बताते हैं कि यह परंपरा उनके दादा जी ने शुरू की थी, और आज उनका परिवार अमृतसर में रावण बनाने वालों में सबसे आगे माना जाता है। अफसर भी बन जाएं, परंपरा नहीं छोड़ेंगे
विनोद कुमार का कहना है कि रावण बनाना उनके लिए एक धरोहर है, जिसे उनका परिवार पीढ़ियों से सहेज रहा है। वे मानते हैं कि चाहे जिंदगी में कुछ भी बन जाएं, अफसर भी, लेकिन यह परंपरा कभी नहीं छोड़ेंगे। दिलचस्प बात यह है कि अब उनकी बेटी भी इस कला को सीख रही है। वह देहरादून पढ़ती है, लेकिन हर साल अमृतसर आकर रावण बनाने में मदद करती है। इस बार ऑर्डर कम, बाढ़ का असर
विनोद कुमार ने बताया कि इस बार पंजाब में आई बाढ़ ने उनके काम पर भी असर डाला है। हर साल अजनाला और अमृतसर के आसपास के गांवों से बड़े-बड़े रावणों के ऑर्डर आया करते थे, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार गांव के लोगों ने कहा कि रावण बनाने पर खर्च होने वाले पैसे बाढ़ पीड़ितों की मदद में देना चाहते हैं। यह सुनकर दिल को तसल्ली मिली कि त्योहार से बड़ा इंसानियत का त्योहार होता है।