हिमाचल प्रदेश के रोहड़ू के दलगांव में चल रहे ऐतिहासिक भुंडा महायज्ञ में शनिवार को शाम के वक्त बेड़ा रस्म पूरी की गई। इस महायज्ञ में सूरत राम ने मौत की घाटी को घास से बनी रस्सी से पार किया। इसे देखने के लिए हजारों की संख्या में दलगांव में भीड़ उमड़ी। दावा किया जा रहा है कि इसमें एक लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए। इस रस्म को पूरा करने से पहले जब रस्सा लगाया जा रहा था तो उस दौरान कुछ लोगों के हाथ से रस्सी नीचे गिर गई। मगर बाद में संभलते हुए स्थानीय लोगों ने इसे बांध दिया। इससे रस्म निभाने में वक्त लग गया। इस रस्म को विशेष जाती का व्यक्ति बेड़ा बनकर निभाता है। बेड़ा सूरत राम ने एक ऊंची पहाड़ी से रस्सी के जरिए नीचे की दूसरी पहाड़ी के बीच स्लाइड करते हुए मौत की खाई को पार किया। सूरत राम ने (65 साल) नौवीं बार बेड़ा बनकर रस्सी के सहारे मौत की घाटी को पार किया। 1985 में बकरालू महाराज के मंदिर में इससे पहले भुंडा हुआ था। उस वक्त भी सूरत राम (तब 21 साल के थे) ने ही इस रस्म को पूरा किया था। आज सूरत राम ने नौवीं बार रस्म निभाई है। सूरत राम बोले- डर से आगे आस्था सूरत राम ने बताया कि कि वह भाग्यशाली हैं, जो उन्हें यह दैवीय कार्य करने का मौका मिला है। आस्था डर से कहीं आगे है। वह बताते हैं कि इस रस्सी को नाग का प्रतीक माना जाता है। यह प्रदर्शन भुंडा महायज्ञ का अहम हिस्सा है। यह यज्ञ रामायण महाभारत काल मे नरमेघ का स्वरूप माना जाता है। बेड़ा के नियम कठोर बेड़ा एक विशेष जाति के लोग होते हैं। वहीं इस दैवीय कार्य करते हैं। इसके लिए चुने गए व्यक्ति को कई कठोर नियमों का पालन करता पड़ता हैं। सूरत राम ने कहा कि उन्होंने देवता के मंदिर में पूरे नियम के साथ ब्रह्मचर्य का पालन किया। भुंडा महायज्ञ शुरू होने से 3 महीने पहले से घर जाने की इजाजत नहीं होती। बेड़ा को देवता के मंदिर में ही रहना पड़ता है। बेड़ा के लिए एक समय का भोजन मंदिर में ही बनता है। अनुष्ठान के समापन होने तक न तो बाल और न ही नाखून काटे जाते हैं। सुबह चार बजे भोजन करने के बाद फिर अगले दिन सुबह चार बजे भोजन किया जाता है। यानी 24 घंटे में केवल एक बार भोजन किया जाता है। इस दौरान अधिकतम मौन व्रत का पालन किया जाता है। इसके अलावा अन्य प्रतिबंध भी रहते हैं। ढाई महीने में तैयार की रस्सी सूरत राम ने बताया कि इस रस्म को पूरा करने के लिए विशेष घास से खुद रस्सा तैयार किया है। इसे तैयार करने में चार लोगों ने सहयोग किया और इसे बनाने में ढाई महीने का समय लग गया। भुंडा के पीछे की मान्यता मान्यता है कि भुंडा महायज्ञ की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी। इस यज्ञ में भगवान परशुराम ने नरमुंडों की बलि दी थी। इसलिए इसे नरमेघ यज्ञ भी कहा जाता है। ये अनुष्ठान, पूर्ववर्ती बुशैहर रियासत के राजाओं की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। हिमाचल में कुल्लू के निरमंड, रामपुर बुशहर, रोहडू में भी इसे सदियों से मनाया जा रहा है। भुंडा महायज्ञ में दूर दूर से लोग इसे देखने पहुंचे हैं और रोहडू की स्पैल वैली के भमनाला, करालश, खोड़सू, दयारमोली, बश्टाड़ी, गावणा, बठारा, कुटाड़ा, खशकंडी, दलगांव और भेटली गांवों में 1500 के करीब परिवार इसकी मेजबानी कर रहे हैं। देश विदेश से घर लौटते हैं स्थानीय लोग इन गांव के जो लोग देश-विदेश में नौकरी या व्यवसाय करते हैं, वह भी भूंडा के लिए वापस घर लौटते हैं। क्षेत्र के लोग तीन सालों से इसकी तैयारियों में जुटे थे। इसमें स्पैल घाटी के तीन प्रमुख देवता बौंद्रा महाराज, महेश्वर और मोहरी दलगांव मंदिर पहुंच गए हैं। इन देवताओं के साथ हजारों की संख्या में देवलु (देवता के कारदार) और श्रद्धालु भी पहुंच रहे है।
हिमाचल प्रदेश के रोहड़ू के दलगांव में चल रहे ऐतिहासिक भुंडा महायज्ञ में शनिवार को शाम के वक्त बेड़ा रस्म पूरी की गई। इस महायज्ञ में सूरत राम ने मौत की घाटी को घास से बनी रस्सी से पार किया। इसे देखने के लिए हजारों की संख्या में दलगांव में भीड़ उमड़ी। दावा किया जा रहा है कि इसमें एक लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए। इस रस्म को पूरा करने से पहले जब रस्सा लगाया जा रहा था तो उस दौरान कुछ लोगों के हाथ से रस्सी नीचे गिर गई। मगर बाद में संभलते हुए स्थानीय लोगों ने इसे बांध दिया। इससे रस्म निभाने में वक्त लग गया। इस रस्म को विशेष जाती का व्यक्ति बेड़ा बनकर निभाता है। बेड़ा सूरत राम ने एक ऊंची पहाड़ी से रस्सी के जरिए नीचे की दूसरी पहाड़ी के बीच स्लाइड करते हुए मौत की खाई को पार किया। सूरत राम ने (65 साल) नौवीं बार बेड़ा बनकर रस्सी के सहारे मौत की घाटी को पार किया। 1985 में बकरालू महाराज के मंदिर में इससे पहले भुंडा हुआ था। उस वक्त भी सूरत राम (तब 21 साल के थे) ने ही इस रस्म को पूरा किया था। आज सूरत राम ने नौवीं बार रस्म निभाई है। सूरत राम बोले- डर से आगे आस्था सूरत राम ने बताया कि कि वह भाग्यशाली हैं, जो उन्हें यह दैवीय कार्य करने का मौका मिला है। आस्था डर से कहीं आगे है। वह बताते हैं कि इस रस्सी को नाग का प्रतीक माना जाता है। यह प्रदर्शन भुंडा महायज्ञ का अहम हिस्सा है। यह यज्ञ रामायण महाभारत काल मे नरमेघ का स्वरूप माना जाता है। बेड़ा के नियम कठोर बेड़ा एक विशेष जाति के लोग होते हैं। वहीं इस दैवीय कार्य करते हैं। इसके लिए चुने गए व्यक्ति को कई कठोर नियमों का पालन करता पड़ता हैं। सूरत राम ने कहा कि उन्होंने देवता के मंदिर में पूरे नियम के साथ ब्रह्मचर्य का पालन किया। भुंडा महायज्ञ शुरू होने से 3 महीने पहले से घर जाने की इजाजत नहीं होती। बेड़ा को देवता के मंदिर में ही रहना पड़ता है। बेड़ा के लिए एक समय का भोजन मंदिर में ही बनता है। अनुष्ठान के समापन होने तक न तो बाल और न ही नाखून काटे जाते हैं। सुबह चार बजे भोजन करने के बाद फिर अगले दिन सुबह चार बजे भोजन किया जाता है। यानी 24 घंटे में केवल एक बार भोजन किया जाता है। इस दौरान अधिकतम मौन व्रत का पालन किया जाता है। इसके अलावा अन्य प्रतिबंध भी रहते हैं। ढाई महीने में तैयार की रस्सी सूरत राम ने बताया कि इस रस्म को पूरा करने के लिए विशेष घास से खुद रस्सा तैयार किया है। इसे तैयार करने में चार लोगों ने सहयोग किया और इसे बनाने में ढाई महीने का समय लग गया। भुंडा के पीछे की मान्यता मान्यता है कि भुंडा महायज्ञ की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी। इस यज्ञ में भगवान परशुराम ने नरमुंडों की बलि दी थी। इसलिए इसे नरमेघ यज्ञ भी कहा जाता है। ये अनुष्ठान, पूर्ववर्ती बुशैहर रियासत के राजाओं की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। हिमाचल में कुल्लू के निरमंड, रामपुर बुशहर, रोहडू में भी इसे सदियों से मनाया जा रहा है। भुंडा महायज्ञ में दूर दूर से लोग इसे देखने पहुंचे हैं और रोहडू की स्पैल वैली के भमनाला, करालश, खोड़सू, दयारमोली, बश्टाड़ी, गावणा, बठारा, कुटाड़ा, खशकंडी, दलगांव और भेटली गांवों में 1500 के करीब परिवार इसकी मेजबानी कर रहे हैं। देश विदेश से घर लौटते हैं स्थानीय लोग इन गांव के जो लोग देश-विदेश में नौकरी या व्यवसाय करते हैं, वह भी भूंडा के लिए वापस घर लौटते हैं। क्षेत्र के लोग तीन सालों से इसकी तैयारियों में जुटे थे। इसमें स्पैल घाटी के तीन प्रमुख देवता बौंद्रा महाराज, महेश्वर और मोहरी दलगांव मंदिर पहुंच गए हैं। इन देवताओं के साथ हजारों की संख्या में देवलु (देवता के कारदार) और श्रद्धालु भी पहुंच रहे है।