6 जनवरी को NEET की तैयारी कर रही छात्रा शंभू हॉस्टल के कमरे में बेहोश मिलती है। हॉस्टल के कर्मचारी उसे हॉस्पिटल ले जाते हैं। एक हॉस्पिटल, दो हॉस्पिटल और फिर तीसरे हॉस्पिटल में मौत। छह जनवरी से नौ जनवरी तक चले इस घटनाक्रम में पुलिस सीन से गायब है। तीन दिन तक न हॉस्टल सील हुआ, न कमरा, न बिस्तर, न कपड़े। कानून के जानकारों के अनुसार यही सबसे महत्वपूर्ण समय था, जिसमें सबूत इकट्ठे किए जाते, लेकिन पुलिस सबसे सुस्त रही। थाना प्रभारी रौशनी कुमारी ने एक कहानी गढ़ी कि लड़की ने सुसाइड किया है। उसी कहानी को एएसपी, एसपी और खुद एसएसपी भी आगे बढ़ाते रहे। भास्कर की पड़ताल में यह सामने आया कि यह किसी एक अफसर की गलती नहीं है। बिहार के इस संवेदनशील मामले में 5 चेहरे जिनकी लापरवाही सामने आई है। जिसमें थाना प्रभारी ने गलत रिपोर्ट दी, एएसपी, एसपी ने उसे सुसाइड बता दिया और एसएसपी ने तो रेप से ही इनकार कर दिया। भास्कर ने इस पूरे मामले पर लीगल एक्सपर्ट से बात की, पढ़िए किस अधिकारी की क्या जिम्मेदारी थी और उसने क्या लापरवाही की…? जिम्मेदारी: थाना प्रभारी के रूप में रौशनी कुमारी को 6 जनवरी को मिली सूचना को मेडिको-लीगल केस (MLC) मानना था। कानून में भी स्पष्ट है यदि कोई छात्रा संदिग्ध हालत में बेहोश मिलती है, तो पुलिस को तत्काल मौके पर पहुंचकर कमरे को सील, हॉस्टल को सर्च और परिवार को सूचित करना होता है। उन्हें चाहिए था कि वे FIR की प्रक्रिया शुरू करातीं, फोरेंसिक टीम बुलातीं और अस्पताल में इलाज के दौरान किसी निष्कर्ष से बचतीं। लापरवाही : तीन दिन तक पुलिस की गैरहाजिरी सबसे बड़ा सवाल है। इस दौरान हॉस्टल का कमरा खुला रहा। तीन लोगों को हिरासत में लेकर छोड़ दिया गया, लेकिन हॉस्टल की जांच नहीं हुई। सबसे गंभीर चूक यह रही कि थाना प्रभारी की शुरुआती रिपोर्ट ही आगे की पूरी जांच की बेसलाइन बन गई, जिसे बाद में कोई अधिकारी चुनौती देता नहीं दिखा। या उसे क्रॉस चेक करवाने की प्रक्रिया भी नहीं की गई। जिम्मेदारी: ASP स्तर पर केस की री-एप्रेजल होती है। यह देखा जाता है कि क्या शुरुआती जांच में कोई एंगल छूटा तो नहीं है। उन्हें चाहिए था कि वे 6–9 जनवरी की पुलिस गैरहाजिरी पर सवाल उठाते और हॉस्टल की दोबारा जांच के आदेश देते। यही नहीं नीट छात्रा का स्टेटमेंट भी लेना चाहिए था। जैसे-उसके शरीर पर चोट कैसे लगी, प्राइवेट पार्ट में चोट है या नहीं। लापरवाही: ASP अभिनव कुमार ने थाना प्रभारी की रिपोर्ट को ही आधार मान लिया। न कमरे की फोरेंसिक जांच कराई गई, न नए सिरे से संदिग्धों को जोड़ा गया। यह वह टाइम था, जहां केस को सही दिशा में मोड़ा जा सकता था, लेकिन कैजुअल एप्रोच से ही काम किया गया। ऐसा मान लिया गया कि मामला सुसाइड का है, दब जाएगा। जिम्मेदारी: SP स्तर पर किसी भी संवेदनशील केस में पोस्टमॉर्टम से पहले निष्कर्ष नहीं दिया जाता है। मीडिया ब्रीफिंग में संयम जरूरी होता है। यहां सीधे जजमेंटल बयान आ गया कि रेप हुआ ही नहीं है। लापरवाही: एसपी परिचय कुमार ने बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के सीधे इसे सुसाइड बताया। नींद की गोली और मोबाइल सर्च की कहानी सामने लाए। मेडिकल रिपोर्ट में उनकी सभी बातें उलट साबित हुईं। बिना जांच के नीचे के अफसरों की रिपोर्ट पर भरोसा कर लिया। SSP कॉन्फ्रेंस में जल्दबाजी की जिम्मेदारी: SSP का काम अधीनस्थ अधिकारियों की रिपोर्ट को क्रॉस-वेरिफाई करना होता है। खासकर तब, जब मामला यौन शोषण जैसे मुद्दे से जुड़ा हो। लापरवाही: SSP ने भी यौन शोषण की संभावना को सीधे खारिज कर दिया। यह बयान तब आया, जब मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आई भी नहीं थी। पता नहीं कैसे एसएसपी ने किसी प्राइवेट डॉक्टर की रिपोर्ट पर भरोसा कर लिया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद वही बयान पुलिस के लिए असहज सवाल बन गया। महिला डॉक्टर का हवाला देकर रेप से इनकार, शरीर पर चोट बताई जिम्मेदारी: प्रारंभिक डॉक्टर की जिम्मेदारी होती है कि यदि संकेत अस्पष्ट हों, तो रिपोर्ट रिजर्व रखी जाए। डॉक्टर को कानूनी निष्कर्ष नहीं देना चाहिए। हालांकि प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल के डॉक्टर ने रेप से इनकार किया, लेकिन शरीर पर चोट के निशान बताए थे। वो कैसे आए ये न तो पुलिस बता पाई और न डॉक्टर। लापरवाही: डॉ. सतीश ने जिस महिला डॉक्टर के आधार पर रिपोर्ट बताई उसी की शुरुआती राय से पुलिस ने रेप की संभावना से इनकार कर दिया। जबकि पोस्टमॉर्टम में जननांग पर चोट, टिश्यू ट्रॉमा और संघर्ष के निशान मिले हैं। यहीं से सवाल उठता है- क्या शुरुआती मेडिकल जांच अधूरी थी? और पुलिस जल्दबाजी कर गई। पोस्टमॉर्टम ने पुलिस की थ्योरी कैसे झूठी साबित की पुलिस : ये डिप्रेशन में आत्महत्या है रिपोर्ट: पोस्टमॉर्टम में गर्दन, कंधे, चेस्ट पर नाखूनों के निशान और पीठ रगड़ने से नीली पड़ चुकी थी। लड़की ने बचने के लिए स्ट्रगल किया, आत्महत्या की थ्योरी से मेल नहीं खाती। पुलिस: कोई रेप नहीं हुआ रिपोर्ट: प्राइवेट पार्ट में ताजा चोट, टिश्यू ट्रॉमा और ब्लीडिंग, मेडिकल ओपिनियन के मुताबिक forceful penetration किया गया। एक से ज्यादा लोग हो सकते हैं। पुलिस: नींद की गोली से लड़की बेहोश हुई रिपोर्ट: सभी प्रमुख चोटें मौत से पहले की पाई गईं। यानी पीड़िता बेहोश नहीं थी; उसने विरोध किया। पुलिस: नींद की दवाइयों का ओवरडोज रिपोर्ट: लड़की के चेस्ट को नोचा गया, कंधे पर गहरे नाखून के निशान, पीठ पर रगड़ ये सब ओवरडोज से नहीं हो सकता। पुलिस ने अब तक क्या क्या किया SIT क्या-क्या जांच करेगी 7 पॉइंट में समझिए परिवार के आरोप क्या हैं ———————— ये खबर भी पढ़िए… 2 घंटे तक रेपिस्ट से लड़ती रही NEET छात्रा:प्राइवेट पार्ट पर गहरी चोट, दरिंदों ने चेस्ट पर नोचा-पीठ नीली पड़ गई, पढ़िए पूरी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पटना में NEET की छात्रा से रेप और मौत के मामले में नया मोड़ आ गया है। रेप के दौरान छात्रा से काफी जोर जबरदस्ती की गई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार करीब डेढ़ से दो घंटे तक छात्रा दरिंदगी करने वाले से लड़ी। उसके शरीर पर चोट के निशान कुछ यही कहानी बयां कर रहे हैं। प्राइवेट पार्ट में काफी चोट है, इससे यह भी आशंका जताई जा रही है कि रेप करने वाले एक से ज्यादा हो सकते हैं। फिलहाल अब पुलिस ने भी छात्रा से रेप की बात स्वीकार कर ली है। छात्रा की मौत 11 जनवरी को हुई, शुरुआत में पुलिस इसे सुसाइड बता रही थी। सेक्सुअल असॉल्ट से भी इनकार किया था। जबकि परिवार शुरुआत से रेप का आरोप लगा रहा था। पूरी खबर पढ़िए
6 जनवरी को NEET की तैयारी कर रही छात्रा शंभू हॉस्टल के कमरे में बेहोश मिलती है। हॉस्टल के कर्मचारी उसे हॉस्पिटल ले जाते हैं। एक हॉस्पिटल, दो हॉस्पिटल और फिर तीसरे हॉस्पिटल में मौत। छह जनवरी से नौ जनवरी तक चले इस घटनाक्रम में पुलिस सीन से गायब है। तीन दिन तक न हॉस्टल सील हुआ, न कमरा, न बिस्तर, न कपड़े। कानून के जानकारों के अनुसार यही सबसे महत्वपूर्ण समय था, जिसमें सबूत इकट्ठे किए जाते, लेकिन पुलिस सबसे सुस्त रही। थाना प्रभारी रौशनी कुमारी ने एक कहानी गढ़ी कि लड़की ने सुसाइड किया है। उसी कहानी को एएसपी, एसपी और खुद एसएसपी भी आगे बढ़ाते रहे। भास्कर की पड़ताल में यह सामने आया कि यह किसी एक अफसर की गलती नहीं है। बिहार के इस संवेदनशील मामले में 5 चेहरे जिनकी लापरवाही सामने आई है। जिसमें थाना प्रभारी ने गलत रिपोर्ट दी, एएसपी, एसपी ने उसे सुसाइड बता दिया और एसएसपी ने तो रेप से ही इनकार कर दिया। भास्कर ने इस पूरे मामले पर लीगल एक्सपर्ट से बात की, पढ़िए किस अधिकारी की क्या जिम्मेदारी थी और उसने क्या लापरवाही की…? जिम्मेदारी: थाना प्रभारी के रूप में रौशनी कुमारी को 6 जनवरी को मिली सूचना को मेडिको-लीगल केस (MLC) मानना था। कानून में भी स्पष्ट है यदि कोई छात्रा संदिग्ध हालत में बेहोश मिलती है, तो पुलिस को तत्काल मौके पर पहुंचकर कमरे को सील, हॉस्टल को सर्च और परिवार को सूचित करना होता है। उन्हें चाहिए था कि वे FIR की प्रक्रिया शुरू करातीं, फोरेंसिक टीम बुलातीं और अस्पताल में इलाज के दौरान किसी निष्कर्ष से बचतीं। लापरवाही : तीन दिन तक पुलिस की गैरहाजिरी सबसे बड़ा सवाल है। इस दौरान हॉस्टल का कमरा खुला रहा। तीन लोगों को हिरासत में लेकर छोड़ दिया गया, लेकिन हॉस्टल की जांच नहीं हुई। सबसे गंभीर चूक यह रही कि थाना प्रभारी की शुरुआती रिपोर्ट ही आगे की पूरी जांच की बेसलाइन बन गई, जिसे बाद में कोई अधिकारी चुनौती देता नहीं दिखा। या उसे क्रॉस चेक करवाने की प्रक्रिया भी नहीं की गई। जिम्मेदारी: ASP स्तर पर केस की री-एप्रेजल होती है। यह देखा जाता है कि क्या शुरुआती जांच में कोई एंगल छूटा तो नहीं है। उन्हें चाहिए था कि वे 6–9 जनवरी की पुलिस गैरहाजिरी पर सवाल उठाते और हॉस्टल की दोबारा जांच के आदेश देते। यही नहीं नीट छात्रा का स्टेटमेंट भी लेना चाहिए था। जैसे-उसके शरीर पर चोट कैसे लगी, प्राइवेट पार्ट में चोट है या नहीं। लापरवाही: ASP अभिनव कुमार ने थाना प्रभारी की रिपोर्ट को ही आधार मान लिया। न कमरे की फोरेंसिक जांच कराई गई, न नए सिरे से संदिग्धों को जोड़ा गया। यह वह टाइम था, जहां केस को सही दिशा में मोड़ा जा सकता था, लेकिन कैजुअल एप्रोच से ही काम किया गया। ऐसा मान लिया गया कि मामला सुसाइड का है, दब जाएगा। जिम्मेदारी: SP स्तर पर किसी भी संवेदनशील केस में पोस्टमॉर्टम से पहले निष्कर्ष नहीं दिया जाता है। मीडिया ब्रीफिंग में संयम जरूरी होता है। यहां सीधे जजमेंटल बयान आ गया कि रेप हुआ ही नहीं है। लापरवाही: एसपी परिचय कुमार ने बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के सीधे इसे सुसाइड बताया। नींद की गोली और मोबाइल सर्च की कहानी सामने लाए। मेडिकल रिपोर्ट में उनकी सभी बातें उलट साबित हुईं। बिना जांच के नीचे के अफसरों की रिपोर्ट पर भरोसा कर लिया। SSP कॉन्फ्रेंस में जल्दबाजी की जिम्मेदारी: SSP का काम अधीनस्थ अधिकारियों की रिपोर्ट को क्रॉस-वेरिफाई करना होता है। खासकर तब, जब मामला यौन शोषण जैसे मुद्दे से जुड़ा हो। लापरवाही: SSP ने भी यौन शोषण की संभावना को सीधे खारिज कर दिया। यह बयान तब आया, जब मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आई भी नहीं थी। पता नहीं कैसे एसएसपी ने किसी प्राइवेट डॉक्टर की रिपोर्ट पर भरोसा कर लिया। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद वही बयान पुलिस के लिए असहज सवाल बन गया। महिला डॉक्टर का हवाला देकर रेप से इनकार, शरीर पर चोट बताई जिम्मेदारी: प्रारंभिक डॉक्टर की जिम्मेदारी होती है कि यदि संकेत अस्पष्ट हों, तो रिपोर्ट रिजर्व रखी जाए। डॉक्टर को कानूनी निष्कर्ष नहीं देना चाहिए। हालांकि प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल के डॉक्टर ने रेप से इनकार किया, लेकिन शरीर पर चोट के निशान बताए थे। वो कैसे आए ये न तो पुलिस बता पाई और न डॉक्टर। लापरवाही: डॉ. सतीश ने जिस महिला डॉक्टर के आधार पर रिपोर्ट बताई उसी की शुरुआती राय से पुलिस ने रेप की संभावना से इनकार कर दिया। जबकि पोस्टमॉर्टम में जननांग पर चोट, टिश्यू ट्रॉमा और संघर्ष के निशान मिले हैं। यहीं से सवाल उठता है- क्या शुरुआती मेडिकल जांच अधूरी थी? और पुलिस जल्दबाजी कर गई। पोस्टमॉर्टम ने पुलिस की थ्योरी कैसे झूठी साबित की पुलिस : ये डिप्रेशन में आत्महत्या है रिपोर्ट: पोस्टमॉर्टम में गर्दन, कंधे, चेस्ट पर नाखूनों के निशान और पीठ रगड़ने से नीली पड़ चुकी थी। लड़की ने बचने के लिए स्ट्रगल किया, आत्महत्या की थ्योरी से मेल नहीं खाती। पुलिस: कोई रेप नहीं हुआ रिपोर्ट: प्राइवेट पार्ट में ताजा चोट, टिश्यू ट्रॉमा और ब्लीडिंग, मेडिकल ओपिनियन के मुताबिक forceful penetration किया गया। एक से ज्यादा लोग हो सकते हैं। पुलिस: नींद की गोली से लड़की बेहोश हुई रिपोर्ट: सभी प्रमुख चोटें मौत से पहले की पाई गईं। यानी पीड़िता बेहोश नहीं थी; उसने विरोध किया। पुलिस: नींद की दवाइयों का ओवरडोज रिपोर्ट: लड़की के चेस्ट को नोचा गया, कंधे पर गहरे नाखून के निशान, पीठ पर रगड़ ये सब ओवरडोज से नहीं हो सकता। पुलिस ने अब तक क्या क्या किया SIT क्या-क्या जांच करेगी 7 पॉइंट में समझिए परिवार के आरोप क्या हैं ———————— ये खबर भी पढ़िए… 2 घंटे तक रेपिस्ट से लड़ती रही NEET छात्रा:प्राइवेट पार्ट पर गहरी चोट, दरिंदों ने चेस्ट पर नोचा-पीठ नीली पड़ गई, पढ़िए पूरी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट पटना में NEET की छात्रा से रेप और मौत के मामले में नया मोड़ आ गया है। रेप के दौरान छात्रा से काफी जोर जबरदस्ती की गई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार करीब डेढ़ से दो घंटे तक छात्रा दरिंदगी करने वाले से लड़ी। उसके शरीर पर चोट के निशान कुछ यही कहानी बयां कर रहे हैं। प्राइवेट पार्ट में काफी चोट है, इससे यह भी आशंका जताई जा रही है कि रेप करने वाले एक से ज्यादा हो सकते हैं। फिलहाल अब पुलिस ने भी छात्रा से रेप की बात स्वीकार कर ली है। छात्रा की मौत 11 जनवरी को हुई, शुरुआत में पुलिस इसे सुसाइड बता रही थी। सेक्सुअल असॉल्ट से भी इनकार किया था। जबकि परिवार शुरुआत से रेप का आरोप लगा रहा था। पूरी खबर पढ़िए