इंदौर की एक महिला ने जिंदगी और मौत के बीच कई बार जंग लड़ी और जीत गई। शादी के सात साल बाद गर्भवती हुई इस महिला के सामने हालात इतने गंभीर हो गए कि डॉक्टरों को प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने की सलाह देनी पड़ी, लेकिन उसने हार मानने से इनकार कर दिया। दरअसल, गर्भ ठहरने के बाद महिला की दोनों किडनियां खराब हो गईं। हालत नाजुक होने पर डॉक्टरों ने गर्भ समापन की सलाह दी, लेकिन महिला अपने फैसले पर अडिग रही। पांचवें माह में डायलिसिस के दौरान उसे कार्डियक अरेस्ट आ गया और करीब सात मिनट तक उसकी सांसें थम गईं। तत्काल सीपीआर दिया गया, जिसके बाद उसकी सांसें लौट सकीं। सातवें माह में महिला को पीलिया हो गया, जिससे गर्भस्थ शिशुओं की जान पर भी खतरा मंडराने लगा। हालात को देखते हुए डॉक्टरों को डिलीवरी करानी पड़ी। महिला के हौसले और डॉक्टरों की निगरानी के बीच आखिरकार जुड़वां बच्चों एक बेटा और एक बेटी का जन्म हुआ। दोनों नवजात स्वस्थ हैं और परिवार में खुशियों का माहौल है। डॉक्टरों का दावा है कि मेडिकल लिटरेचर में यह अपनी तरह का दुनिया का पहला मामला है। यह है मौत से लड़ने वाली फाइटर जागृति महिला का नाम जागृति पति राहुल कुशवाह (35) निवासी इंदौर है। पति एक हॉस्पिटल में बायो मेडिकल इंजीनियर है। दंपती को सात साल तक कोई संतान नहीं हुई। फिर इस साल जागृति गर्भवती हुई। चार माह तक सब कुछ अच्छा था। 18वें हफ्ते में उसे ब्लीडिंग होने लगी। अगस्त में उसे विशेष ज्यूपिटर हॉस्पिटल में एडमिट कराया। यहां पता चला कि इन्फेक्शन के कारण उसकी दोनों किडनियां खराब हैं। रोज छह घंटे तक डायलिसिस
जागृति के शरीर में फैले इन्फेक्शन से लिवर में इंजुरी हो गई और मल्टी ऑर्गन्स फैलियर की स्थिति हो गई। डॉक्टरों के मुताबिक आमतौर पर सामान्य जन में किडनी खराब होने पर खतरा तो रहता ही है, लेकिन प्रेग्नेंसी के दौरान 10 गुना बढ़ जाता है। इस पर तत्काल जागृति का डायलिसिस शुरू किया गया। इसके साथ ही एंटीबायोटिक्स दिए गए। रोज छह घंटे डायलिसिस शुरू हो गया। रिकवर नहीं हो सकती किडनियां
एक्सपर्ट के मुताबिक अगर कोई मरीज डायलिसिस पर चार हफ्ते से ज्यादा निकालता है और किडनी में रिकवरी नहीं होती है तो बायोप्सी की जाती है। 22वें हफ्ते में जागृति की बायोप्सी कराई जो काफी जोखिमपूर्ण थी। डॉक्टरों के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था। इसकी रिपोर्ट में पता चला कि अब दोनों किडनियां रिकवर नहीं हो सकती। ट्रांसप्लांट नहीं डायलिसिस ही था विकल्प
किडनी खराब होने पर या तो ट्रांसप्लांट की जाती है या मरीज को डायलिसिस पर रखा जाता है। चूंकि महिला गर्भवती थी इसलिए ट्रांसप्लांट नहीं हो सकता था। ऐसे में डॉक्टरों ने जागृति को सुझाव दिया कि वह प्रेग्नेंसी टर्मिट कर खुद का स्वास्थ्य संभालें नहीं तो जोखिम की स्थिति बनी रहेगी। मेरे लिए बच्चे हैं अनमोल
जागृति का कहना था कि उनके लिए बच्चे अनमोल हैं, क्योंकि सात साल बाद वह गर्भवती हुई है। वह चाहती है कि उसकी डिलीवरी ही हो और घर में किलकारियां गूंजे। रोज डायलिसिस की स्थिति में जागृति की मॉनिटरिंग की गई। 24वें हफ्ते में जागृति के लंग्स में पानी भरने के कारण ऑक्सीजन कम हो गई। सांस लेने में तकलीफ होने के दौरान उन्हें वेंटिलेटर (नॉन इन्वेसिबल) पर लिया गया। इस दौरान हार्ट बंद हो गया तो डॉक्टरों ने उसे 7 मिनट तक सीपीआर दिया, सांसें लौट गई। 7 मिनट के दौरान हार्ट बंद ही रहा। सांस लौटने के बाद उन्हें 24 घंटे वेंटिलेटर पर ही रखना पड़ा। डॉक्टरों के लिए यह बड़ी चुनौती रही। जागृति और उसके पति ने कहा कि डॉ. सनी मोदी और डॉ. जयश्री श्रीधर व टीम को बहुत-बहुत धन्यवाद देते हैं। कार्डियक अरेस्ट के दौरान स्वस्थ रहे दोनों शिशु
सोनोग्राफी करवाने के साथ गर्भस्थ शिशुओं का एक्जामिनेशन किया गया। इसमें सुखद पहलू यह रहा कि इतना सबकुछ होने के बाद भी दोनों शिशु स्वस्थ रहे। डॉक्टरों ने यहां भी जागृति को सलाह दी कि खतरा अभी बरकरार है। इसके साथ ही टर्मिनेट करने से मना कर दिया। सातवें माह में फिर एक और खतरा
सब कुछ कुछ ठीक था कि फिर 30वें हफ्ते में उन्हें पीलिया हो गया। यह तो मां और बच्चों दोनों के लिए काफी घातक था। इस पर उन्हें तुरंत सीजर कराने को कहा। डिलीवरी के बाद जुड़वा बच्चे हुए। इनमें एक बच्चे (मेल) का वजन 835 ग्राम और दूसरे (फीमेल) का 1130 ग्राम था। इसमें फीमेल 40 दिन और मेल करीब 50 दिनों तक NICU में एडमिट रहे। इनमें मेल को पैटर्न डक्टस आर्टरियोसस कर (हार्ट की एनोमली) डिटेक्ट हुई थी। उसे एनोमली मेडिसिन से कंट्रोल किया। डॉक्टरों के मुताबिक अगर ऐसा नहीं होता तो उसकी भी बड़ी सर्जरी करनी पड़ती। डॉक्टर बोले; मरीज के रूप में फाइटर थी जागृति महिला का इलाज डॉ. सनी मोदी ((नेफ्रोलॉजिस्ट) ने किया। डॉ. मोदी ने बताया कि ऐसी स्थिति में अकसर महिला प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करवा देती है क्योंकि वह पहले खुद की सुरक्षा चाहती है, लेकिन जागृति फाइटर थी। उन्होंने उम्मीद जारी रखी और हिम्मत के साथ विश्वास कायम रखा। इसलिए है दुनिया का पहला मामला
डॉ. मोदी का दावा है कि मेडिकल की दुनिया में ऐसा मामला पहले कभी रिकॉर्ड नहीं हुआ है कि डायलिसिस के दौरान सफल प्रेग्नेंसी हुई हो। खासकर उस दौरान महिला को कार्डियक अरेस्ट होकर हार्ट बंद होकर वेंटिलेटर पर लिया गया था। जब कार्डियक अरेस्ट हुआ तो ऑक्सीजन नहीं मिलने से महिला का ब्रेन डेमेज हो सकता था। इस दौरान समान ब्लड सर्कुलेशन बच्चे में भी होता है तो उन्हें भी हाईपोक्सी ब्रेन डेमेज हो सकता था। इस दौरान बार-बार अल्ट्रा साउंड किए तो दोनों स्वस्थ थे। 7 मिनट तक हार्ट बंद होना बड़ी बात होती है। मरीज स्थाई रूप से कोमा में चला जाता है। इस कारण मेडिकल लिटरेचर में यह दुनिया का पहला ऐसा मामला है। हफ्ते में दो बार डायलिसिस, ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग
दंपती दोनों बच्चों को स्वस्थ पाकर बहुत खुश हैं, लेकिन अभी संघर्ष बाकी है। दरअसल अब जागृति का हफ्ते में दो बार डायलिसिस चल रहा है। उन्होंने अब किडनी ट्रांसप्लांट के लिए SOTO (State Organ and Tissue Transplant Organisation) में रजिस्ट्रेशन कराया है। इसके लिए उन्होंने इंतजार करना होगा। ये खबर भी पढ़ें… महिला के कंधे से निकाला 5 इंच का बड़ा ट्यूमर इंदौर में डॉक्टरों की एक 25 वर्षीय महिला के कंधे के पास 5 इंच का बड़ा ट्यूमर निकालकर उसे नई जिंदगी दी है। यह सर्जरी 5 घंटे तक चली। ट्यूमर ने कंधे से लगी हड्डी को काफी नष्ट कर दिया था और फेफड़ों के पास नसों से चिपक गया था जो कैंसर में तब्दील हो सकता था। सर्जरी के बाद महिला स्वस्थ है। पूरी खबर पढ़ें
इंदौर की एक महिला ने जिंदगी और मौत के बीच कई बार जंग लड़ी और जीत गई। शादी के सात साल बाद गर्भवती हुई इस महिला के सामने हालात इतने गंभीर हो गए कि डॉक्टरों को प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करने की सलाह देनी पड़ी, लेकिन उसने हार मानने से इनकार कर दिया। दरअसल, गर्भ ठहरने के बाद महिला की दोनों किडनियां खराब हो गईं। हालत नाजुक होने पर डॉक्टरों ने गर्भ समापन की सलाह दी, लेकिन महिला अपने फैसले पर अडिग रही। पांचवें माह में डायलिसिस के दौरान उसे कार्डियक अरेस्ट आ गया और करीब सात मिनट तक उसकी सांसें थम गईं। तत्काल सीपीआर दिया गया, जिसके बाद उसकी सांसें लौट सकीं। सातवें माह में महिला को पीलिया हो गया, जिससे गर्भस्थ शिशुओं की जान पर भी खतरा मंडराने लगा। हालात को देखते हुए डॉक्टरों को डिलीवरी करानी पड़ी। महिला के हौसले और डॉक्टरों की निगरानी के बीच आखिरकार जुड़वां बच्चों एक बेटा और एक बेटी का जन्म हुआ। दोनों नवजात स्वस्थ हैं और परिवार में खुशियों का माहौल है। डॉक्टरों का दावा है कि मेडिकल लिटरेचर में यह अपनी तरह का दुनिया का पहला मामला है। यह है मौत से लड़ने वाली फाइटर जागृति महिला का नाम जागृति पति राहुल कुशवाह (35) निवासी इंदौर है। पति एक हॉस्पिटल में बायो मेडिकल इंजीनियर है। दंपती को सात साल तक कोई संतान नहीं हुई। फिर इस साल जागृति गर्भवती हुई। चार माह तक सब कुछ अच्छा था। 18वें हफ्ते में उसे ब्लीडिंग होने लगी। अगस्त में उसे विशेष ज्यूपिटर हॉस्पिटल में एडमिट कराया। यहां पता चला कि इन्फेक्शन के कारण उसकी दोनों किडनियां खराब हैं। रोज छह घंटे तक डायलिसिस
जागृति के शरीर में फैले इन्फेक्शन से लिवर में इंजुरी हो गई और मल्टी ऑर्गन्स फैलियर की स्थिति हो गई। डॉक्टरों के मुताबिक आमतौर पर सामान्य जन में किडनी खराब होने पर खतरा तो रहता ही है, लेकिन प्रेग्नेंसी के दौरान 10 गुना बढ़ जाता है। इस पर तत्काल जागृति का डायलिसिस शुरू किया गया। इसके साथ ही एंटीबायोटिक्स दिए गए। रोज छह घंटे डायलिसिस शुरू हो गया। रिकवर नहीं हो सकती किडनियां
एक्सपर्ट के मुताबिक अगर कोई मरीज डायलिसिस पर चार हफ्ते से ज्यादा निकालता है और किडनी में रिकवरी नहीं होती है तो बायोप्सी की जाती है। 22वें हफ्ते में जागृति की बायोप्सी कराई जो काफी जोखिमपूर्ण थी। डॉक्टरों के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था। इसकी रिपोर्ट में पता चला कि अब दोनों किडनियां रिकवर नहीं हो सकती। ट्रांसप्लांट नहीं डायलिसिस ही था विकल्प
किडनी खराब होने पर या तो ट्रांसप्लांट की जाती है या मरीज को डायलिसिस पर रखा जाता है। चूंकि महिला गर्भवती थी इसलिए ट्रांसप्लांट नहीं हो सकता था। ऐसे में डॉक्टरों ने जागृति को सुझाव दिया कि वह प्रेग्नेंसी टर्मिट कर खुद का स्वास्थ्य संभालें नहीं तो जोखिम की स्थिति बनी रहेगी। मेरे लिए बच्चे हैं अनमोल
जागृति का कहना था कि उनके लिए बच्चे अनमोल हैं, क्योंकि सात साल बाद वह गर्भवती हुई है। वह चाहती है कि उसकी डिलीवरी ही हो और घर में किलकारियां गूंजे। रोज डायलिसिस की स्थिति में जागृति की मॉनिटरिंग की गई। 24वें हफ्ते में जागृति के लंग्स में पानी भरने के कारण ऑक्सीजन कम हो गई। सांस लेने में तकलीफ होने के दौरान उन्हें वेंटिलेटर (नॉन इन्वेसिबल) पर लिया गया। इस दौरान हार्ट बंद हो गया तो डॉक्टरों ने उसे 7 मिनट तक सीपीआर दिया, सांसें लौट गई। 7 मिनट के दौरान हार्ट बंद ही रहा। सांस लौटने के बाद उन्हें 24 घंटे वेंटिलेटर पर ही रखना पड़ा। डॉक्टरों के लिए यह बड़ी चुनौती रही। जागृति और उसके पति ने कहा कि डॉ. सनी मोदी और डॉ. जयश्री श्रीधर व टीम को बहुत-बहुत धन्यवाद देते हैं। कार्डियक अरेस्ट के दौरान स्वस्थ रहे दोनों शिशु
सोनोग्राफी करवाने के साथ गर्भस्थ शिशुओं का एक्जामिनेशन किया गया। इसमें सुखद पहलू यह रहा कि इतना सबकुछ होने के बाद भी दोनों शिशु स्वस्थ रहे। डॉक्टरों ने यहां भी जागृति को सलाह दी कि खतरा अभी बरकरार है। इसके साथ ही टर्मिनेट करने से मना कर दिया। सातवें माह में फिर एक और खतरा
सब कुछ कुछ ठीक था कि फिर 30वें हफ्ते में उन्हें पीलिया हो गया। यह तो मां और बच्चों दोनों के लिए काफी घातक था। इस पर उन्हें तुरंत सीजर कराने को कहा। डिलीवरी के बाद जुड़वा बच्चे हुए। इनमें एक बच्चे (मेल) का वजन 835 ग्राम और दूसरे (फीमेल) का 1130 ग्राम था। इसमें फीमेल 40 दिन और मेल करीब 50 दिनों तक NICU में एडमिट रहे। इनमें मेल को पैटर्न डक्टस आर्टरियोसस कर (हार्ट की एनोमली) डिटेक्ट हुई थी। उसे एनोमली मेडिसिन से कंट्रोल किया। डॉक्टरों के मुताबिक अगर ऐसा नहीं होता तो उसकी भी बड़ी सर्जरी करनी पड़ती। डॉक्टर बोले; मरीज के रूप में फाइटर थी जागृति महिला का इलाज डॉ. सनी मोदी ((नेफ्रोलॉजिस्ट) ने किया। डॉ. मोदी ने बताया कि ऐसी स्थिति में अकसर महिला प्रेग्नेंसी टर्मिनेट करवा देती है क्योंकि वह पहले खुद की सुरक्षा चाहती है, लेकिन जागृति फाइटर थी। उन्होंने उम्मीद जारी रखी और हिम्मत के साथ विश्वास कायम रखा। इसलिए है दुनिया का पहला मामला
डॉ. मोदी का दावा है कि मेडिकल की दुनिया में ऐसा मामला पहले कभी रिकॉर्ड नहीं हुआ है कि डायलिसिस के दौरान सफल प्रेग्नेंसी हुई हो। खासकर उस दौरान महिला को कार्डियक अरेस्ट होकर हार्ट बंद होकर वेंटिलेटर पर लिया गया था। जब कार्डियक अरेस्ट हुआ तो ऑक्सीजन नहीं मिलने से महिला का ब्रेन डेमेज हो सकता था। इस दौरान समान ब्लड सर्कुलेशन बच्चे में भी होता है तो उन्हें भी हाईपोक्सी ब्रेन डेमेज हो सकता था। इस दौरान बार-बार अल्ट्रा साउंड किए तो दोनों स्वस्थ थे। 7 मिनट तक हार्ट बंद होना बड़ी बात होती है। मरीज स्थाई रूप से कोमा में चला जाता है। इस कारण मेडिकल लिटरेचर में यह दुनिया का पहला ऐसा मामला है। हफ्ते में दो बार डायलिसिस, ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग
दंपती दोनों बच्चों को स्वस्थ पाकर बहुत खुश हैं, लेकिन अभी संघर्ष बाकी है। दरअसल अब जागृति का हफ्ते में दो बार डायलिसिस चल रहा है। उन्होंने अब किडनी ट्रांसप्लांट के लिए SOTO (State Organ and Tissue Transplant Organisation) में रजिस्ट्रेशन कराया है। इसके लिए उन्होंने इंतजार करना होगा। ये खबर भी पढ़ें… महिला के कंधे से निकाला 5 इंच का बड़ा ट्यूमर इंदौर में डॉक्टरों की एक 25 वर्षीय महिला के कंधे के पास 5 इंच का बड़ा ट्यूमर निकालकर उसे नई जिंदगी दी है। यह सर्जरी 5 घंटे तक चली। ट्यूमर ने कंधे से लगी हड्डी को काफी नष्ट कर दिया था और फेफड़ों के पास नसों से चिपक गया था जो कैंसर में तब्दील हो सकता था। सर्जरी के बाद महिला स्वस्थ है। पूरी खबर पढ़ें