1990 के दशक में जब उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन चला, तो प्रदर्शनकारियों में सबसे ज्यादा महिलाएं नजर आती थीं। कई प्रदर्शनों में अकेली महिलाएं ही केंद्र और राज्य सरकार के कार्यालयों के गेट पर मोर्चा संभाले दिखतीं थीं। कुछ महिलाएं तो छोटे छोटे बच्चों को गोद में लेकर आंदोलन में शामिल होती थीं। ऐसी ही हजारों महिलाओं के संघर्ष के कारण 9 नवंबर को उत्तराखंड रजत जंयती मनाने की तैयारी कर रहा है। उस दौर में मातृशक्ति कि भूमिका की खुद बीते कल हरिद्वार में सीएम पुष्कर सिंह धामी ने तारीफ की है और मंच से उन्होंने आंदोलनकारियों को नमन करते हुए कहा- रजत उत्सव एक उत्सव मात्र नहीं, बल्कि यह राज्य आंदोलनकारियों, माताओं-बहनों के प्रति अपनी भावांजलि अर्पित करने का पावन अवसर भी है, जिन्होंने उत्तराखंड के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। अब उत्तराखंड आंदोलन में महिलाओं की अहमियत को तस्वीरों से समझिए…. अब पढ़िए कार्यक्रम में महिलाओं पर क्या बोले सीएम… आंदोलन में शामिल महिलाओं से जुड़े कुछ किस्से एक अकेली महिला के साहस की मिसाल… लेखक अनिल चमोली अपने एक आर्टिकल में लिखते हैं कि- एक अकेली महिला लाठी के बल पर दोपहर तक गेट पर रहती, साथ में स्वेटर बुनकर समय बिताती, और सुनिश्चित करती कि दफ्तर बंद रहें। इस प्रकार की तस्वीरें उस दौर के समाचार पत्रों में खूब छपती थीं। रायपुर क्षेत्र में तो एक गर्भवती महिला के पेट पर लात मारने जैसी घटना भी हुई। लेकिन महिलाएं आंदोलन से डरी नहीं और खुद को आंदोलन से अलग नहीं किया। उन्होंने गिरफ्तारी कबूल की लेकिन प्रदर्शनों में आना नहीं छोड़ा। पीएंडटी कॉलोनी से जुड़ा किस्सा.. देहरादून में स्थित पीएंडटी कॉलोनी की वो महिलाएं भी खूब चर्चा में रहीं जिन्होंने पोस्ट ऑफिस और दूरसंचार विभाग पर ताले डालकर बंद करवाने में अहम भूमिका निभाई। यहां पर ज्यादातर वो महिलाएं आती थीं जो पास के सरकारी आवासों में रहती थीं। अधिकारी इन महिलाओं से इतना परेशान हो गए थे की उन्होंने दफ्तरों के बाहर नोटिस चिपकवा दिए कि जो महिलाएं प्रदर्शन में आएंगी उनके सरकारी आवास खाली करवा लिए जाएंगे। लेकिन महिलाओं ने अधिकारियों की इस प्लानिंग को भी फेल कर दिया। नोटिसों के चिपकने के बाद उन जगहों की जिम्मेदारी दूसरी उन महिलाओं को दे दी गई जो सरकारी आवासों में नहीं रहती थीं, और कुछ इस तरह आंदोलन और दफ्तर के बाहर महिलाओं का प्रदर्शन जारी रहा। जज के आवास पर धरने पर बैठीं… कुछ महिलाओं की गिरफ्तारी के बाद उनकी रिहाई की मांग को लेकर आंदोलनकारी महिलाएं जज के आवास के बाहर धरने पर बैठ गईं। कमला पंत जैसे नेताओं ने जेल में बंद महिलाओं और उनके छोटे बच्चों के लिए आवाज उठाई।
1990 के दशक में जब उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन चला, तो प्रदर्शनकारियों में सबसे ज्यादा महिलाएं नजर आती थीं। कई प्रदर्शनों में अकेली महिलाएं ही केंद्र और राज्य सरकार के कार्यालयों के गेट पर मोर्चा संभाले दिखतीं थीं। कुछ महिलाएं तो छोटे छोटे बच्चों को गोद में लेकर आंदोलन में शामिल होती थीं। ऐसी ही हजारों महिलाओं के संघर्ष के कारण 9 नवंबर को उत्तराखंड रजत जंयती मनाने की तैयारी कर रहा है। उस दौर में मातृशक्ति कि भूमिका की खुद बीते कल हरिद्वार में सीएम पुष्कर सिंह धामी ने तारीफ की है और मंच से उन्होंने आंदोलनकारियों को नमन करते हुए कहा- रजत उत्सव एक उत्सव मात्र नहीं, बल्कि यह राज्य आंदोलनकारियों, माताओं-बहनों के प्रति अपनी भावांजलि अर्पित करने का पावन अवसर भी है, जिन्होंने उत्तराखंड के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। अब उत्तराखंड आंदोलन में महिलाओं की अहमियत को तस्वीरों से समझिए…. अब पढ़िए कार्यक्रम में महिलाओं पर क्या बोले सीएम… आंदोलन में शामिल महिलाओं से जुड़े कुछ किस्से एक अकेली महिला के साहस की मिसाल… लेखक अनिल चमोली अपने एक आर्टिकल में लिखते हैं कि- एक अकेली महिला लाठी के बल पर दोपहर तक गेट पर रहती, साथ में स्वेटर बुनकर समय बिताती, और सुनिश्चित करती कि दफ्तर बंद रहें। इस प्रकार की तस्वीरें उस दौर के समाचार पत्रों में खूब छपती थीं। रायपुर क्षेत्र में तो एक गर्भवती महिला के पेट पर लात मारने जैसी घटना भी हुई। लेकिन महिलाएं आंदोलन से डरी नहीं और खुद को आंदोलन से अलग नहीं किया। उन्होंने गिरफ्तारी कबूल की लेकिन प्रदर्शनों में आना नहीं छोड़ा। पीएंडटी कॉलोनी से जुड़ा किस्सा.. देहरादून में स्थित पीएंडटी कॉलोनी की वो महिलाएं भी खूब चर्चा में रहीं जिन्होंने पोस्ट ऑफिस और दूरसंचार विभाग पर ताले डालकर बंद करवाने में अहम भूमिका निभाई। यहां पर ज्यादातर वो महिलाएं आती थीं जो पास के सरकारी आवासों में रहती थीं। अधिकारी इन महिलाओं से इतना परेशान हो गए थे की उन्होंने दफ्तरों के बाहर नोटिस चिपकवा दिए कि जो महिलाएं प्रदर्शन में आएंगी उनके सरकारी आवास खाली करवा लिए जाएंगे। लेकिन महिलाओं ने अधिकारियों की इस प्लानिंग को भी फेल कर दिया। नोटिसों के चिपकने के बाद उन जगहों की जिम्मेदारी दूसरी उन महिलाओं को दे दी गई जो सरकारी आवासों में नहीं रहती थीं, और कुछ इस तरह आंदोलन और दफ्तर के बाहर महिलाओं का प्रदर्शन जारी रहा। जज के आवास पर धरने पर बैठीं… कुछ महिलाओं की गिरफ्तारी के बाद उनकी रिहाई की मांग को लेकर आंदोलनकारी महिलाएं जज के आवास के बाहर धरने पर बैठ गईं। कमला पंत जैसे नेताओं ने जेल में बंद महिलाओं और उनके छोटे बच्चों के लिए आवाज उठाई।