संवाद-1 : श्रीराम-शूर्पणखा {राक्षसी शूर्पणखा ने वन में भगवान राम को देखा, तो उनसे मोहित होकर विवाह का प्रस्ताव रख दिया। {शूर्पणखा ने कहा- वीर राम! आप मेरे पति बनें। {श्रीराम : मैं तो सीता का पति हूं। आपको पाना संभव नहीं है। {श्रीराम ने हंसी में कहा- मेरे भ्राता लक्ष्मण अविवाहित हैं, आप उनके पास जाएं। {लक्ष्मण बोले- ‘मैं तो दास हूं, क्या आप दास पत्नी बनेंगी। प्रभु राम सर्वगुण संपन्न हैं, उनके पास जाइए। {इसी बीच शूर्पणखा ने सीता पर हमला कर दिया। लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट दिए। चुनौती:
रिश्तों की सीमाएं भूलकर दूसरों के अधिकार में हस्तक्षेप करना और अस्वीकृति को अपमान समझ लेना। सीख:
मर्यादा और बंधन का सम्मान ही परिवार और समाज को संतुलित रखता है। अस्वीकृति को गरिमा के साथ स्वीकारना ही जीवन की परिपक्वता है। संवाद-2 : श्रीराम-लक्ष्मण {रावण का षड्यंत्र पूरा करने के लिए मायावी राक्षस मारीच स्वर्ण मृग का रूप धारण करके सीता के सामने आ गया। {सीता ने श्रीराम से कहा- इस मृग ने मेरा मन मोह लिया है। आप इसे ले आइए। {लक्ष्मण ने संदेह जताया- भैया, मैं तो समझता हूं कि इस मृग के रूप में वह मारीच नाम का राक्षस ही आया है। {भगवान राम ने कहा- ‘सीता की इच्छा पूरी करना भी उतना ही जरूरी है, जितना राक्षसों का नाश करना। तुम जैसा कह रहे हो, यदि वैसा ही है, तो भी मुझे उसका वध करना ही चाहिए।’ चुनौती:
कभी-कभी अपनों की तीव्र इच्छा पूरी करने के लिए जोखिम उठाकर किसी संकट में पड़ जाना। सीख:
प्रेम साहस देता है, कमजोर नहीं बनाता। लेकिन सुरक्षा और जोखिम का आकलन करके उसके मुताबिक कदम आगे बढ़ाना बेहद जरूरी है। संवाद-3 : सीता-लक्ष्मण {श्रीराम के बाण मारते ही जब मारीच ‘हे सीते! हे लक्ष्मण!’ की आवाज लगाकर गिरा तो सीता घबरा गईं। {सीता ने कहा- लक्ष्मण! आपके भ्राता अवश्य किसी संकट में फंस गए हैं, शीघ्र जाकर उनकी रक्षा करें। {लक्ष्मण ने कहा- नाग, असुर, गंधर्व और देव-दानव मिलकर भी उन्हें नहीं हरा सकते। यह राक्षस की माया है। {सीता भयंकर विलाप करते हुए लक्ष्मण से बार-बार जाने का अनुरोध करने लगीं। {विवश होकर लक्ष्मण ने उस दिशा की ओर प्रस्थान कर दिया, जिधर से आवाज आ रही थी। चुनौती:
संकट में तुरंत अपना धैर्य खो देना व परिस्थिति का आकलन किए बिना ही कोई निर्णय सुना देना। सीख:
हर संकट असली नहीं होता है, इसलिए पहले धैर्य से उस जानकारी का स्रोत और उद्देश्य समझें। विश्वास और स्थिति का सही आकलन ही सुरक्षा है। संवाद-4 : रावण-सीता {श्रीराम-लक्ष्मण के कुटिया से दूर जाते ही रावण ब्राह्मण के वेश में सीता के समीप आ गया। उसने सीता को बहलाने की कोशिश की। {रावण ने कहा- हे सुंदरी! आपके अंगों की कान्ति स्वर्ण के समान है। आप मेरी पटरानी बनें। लंका में दिव्य और मानुष-भोगों का उपभोग करें। {सीता ने कहा- मैं तन-मन-प्राण से अपने पति प्रभु राम की अनुरागिणी हूं। तुम एक सियार हो और मैं सिंहिनी, मैं तुम्हारे लिए सर्वथा दुर्लभ हूं। {यह सुनकर गुस्से से भरे रावण ने सीता का हरण कर लिया। चुनौती:
शक्तिशाली व्यक्ति धन और पद का प्रलोभन देकर गलत मार्ग पर ले जाने की कोशिश करता है। सीख:
निष्ठा और धर्म किसी भी प्रलोभन से बड़े हैं। मूल्य छोड़कर मिला सुख क्षणिक है, लेकिन सिद्धांत के लिए उठाया गया कष्ट ही स्थायी विजय देता है। (श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में अरण्य कांड के सर्ग 17, 18, 42, 43, 44, 45, 47 और 48 से ये संवाद लिए गए हैं। कल पढ़ें चौथा भाग किष्किंधाकांड…)
संवाद-1 : श्रीराम-शूर्पणखा {राक्षसी शूर्पणखा ने वन में भगवान राम को देखा, तो उनसे मोहित होकर विवाह का प्रस्ताव रख दिया। {शूर्पणखा ने कहा- वीर राम! आप मेरे पति बनें। {श्रीराम : मैं तो सीता का पति हूं। आपको पाना संभव नहीं है। {श्रीराम ने हंसी में कहा- मेरे भ्राता लक्ष्मण अविवाहित हैं, आप उनके पास जाएं। {लक्ष्मण बोले- ‘मैं तो दास हूं, क्या आप दास पत्नी बनेंगी। प्रभु राम सर्वगुण संपन्न हैं, उनके पास जाइए। {इसी बीच शूर्पणखा ने सीता पर हमला कर दिया। लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट दिए। चुनौती:
रिश्तों की सीमाएं भूलकर दूसरों के अधिकार में हस्तक्षेप करना और अस्वीकृति को अपमान समझ लेना। सीख:
मर्यादा और बंधन का सम्मान ही परिवार और समाज को संतुलित रखता है। अस्वीकृति को गरिमा के साथ स्वीकारना ही जीवन की परिपक्वता है। संवाद-2 : श्रीराम-लक्ष्मण {रावण का षड्यंत्र पूरा करने के लिए मायावी राक्षस मारीच स्वर्ण मृग का रूप धारण करके सीता के सामने आ गया। {सीता ने श्रीराम से कहा- इस मृग ने मेरा मन मोह लिया है। आप इसे ले आइए। {लक्ष्मण ने संदेह जताया- भैया, मैं तो समझता हूं कि इस मृग के रूप में वह मारीच नाम का राक्षस ही आया है। {भगवान राम ने कहा- ‘सीता की इच्छा पूरी करना भी उतना ही जरूरी है, जितना राक्षसों का नाश करना। तुम जैसा कह रहे हो, यदि वैसा ही है, तो भी मुझे उसका वध करना ही चाहिए।’ चुनौती:
कभी-कभी अपनों की तीव्र इच्छा पूरी करने के लिए जोखिम उठाकर किसी संकट में पड़ जाना। सीख:
प्रेम साहस देता है, कमजोर नहीं बनाता। लेकिन सुरक्षा और जोखिम का आकलन करके उसके मुताबिक कदम आगे बढ़ाना बेहद जरूरी है। संवाद-3 : सीता-लक्ष्मण {श्रीराम के बाण मारते ही जब मारीच ‘हे सीते! हे लक्ष्मण!’ की आवाज लगाकर गिरा तो सीता घबरा गईं। {सीता ने कहा- लक्ष्मण! आपके भ्राता अवश्य किसी संकट में फंस गए हैं, शीघ्र जाकर उनकी रक्षा करें। {लक्ष्मण ने कहा- नाग, असुर, गंधर्व और देव-दानव मिलकर भी उन्हें नहीं हरा सकते। यह राक्षस की माया है। {सीता भयंकर विलाप करते हुए लक्ष्मण से बार-बार जाने का अनुरोध करने लगीं। {विवश होकर लक्ष्मण ने उस दिशा की ओर प्रस्थान कर दिया, जिधर से आवाज आ रही थी। चुनौती:
संकट में तुरंत अपना धैर्य खो देना व परिस्थिति का आकलन किए बिना ही कोई निर्णय सुना देना। सीख:
हर संकट असली नहीं होता है, इसलिए पहले धैर्य से उस जानकारी का स्रोत और उद्देश्य समझें। विश्वास और स्थिति का सही आकलन ही सुरक्षा है। संवाद-4 : रावण-सीता {श्रीराम-लक्ष्मण के कुटिया से दूर जाते ही रावण ब्राह्मण के वेश में सीता के समीप आ गया। उसने सीता को बहलाने की कोशिश की। {रावण ने कहा- हे सुंदरी! आपके अंगों की कान्ति स्वर्ण के समान है। आप मेरी पटरानी बनें। लंका में दिव्य और मानुष-भोगों का उपभोग करें। {सीता ने कहा- मैं तन-मन-प्राण से अपने पति प्रभु राम की अनुरागिणी हूं। तुम एक सियार हो और मैं सिंहिनी, मैं तुम्हारे लिए सर्वथा दुर्लभ हूं। {यह सुनकर गुस्से से भरे रावण ने सीता का हरण कर लिया। चुनौती:
शक्तिशाली व्यक्ति धन और पद का प्रलोभन देकर गलत मार्ग पर ले जाने की कोशिश करता है। सीख:
निष्ठा और धर्म किसी भी प्रलोभन से बड़े हैं। मूल्य छोड़कर मिला सुख क्षणिक है, लेकिन सिद्धांत के लिए उठाया गया कष्ट ही स्थायी विजय देता है। (श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण में अरण्य कांड के सर्ग 17, 18, 42, 43, 44, 45, 47 और 48 से ये संवाद लिए गए हैं। कल पढ़ें चौथा भाग किष्किंधाकांड…)