उत्तराखंड के बागेश्वर में आज शहीद हवलदार सुरेश सिंह का सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। शुक्रवार को उनकी पार्थिव देह को जम्मू से दिल्ली लाया गया था और फिर यहां से पैतृक गांव बमन भीड़ी पहुंचाया गया था। शव के गांव में पहुंचते ही पूरे क्षेत्र में मातम का माहौल छा गया। शहीद की पत्नी तो पति को ताबूत में देख बार बार बेहोश होती रहीं, उनकी आंखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे। वहीं, सुरेश की अंतिम यात्रा में हजारों की तादाद में लोग शामिल हुए। सभी ने नम आखों के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी। जिसके बाद दोपहर के समय बमन भीड़ी गांव के पास ही सरयू-गोमती घाट पर शहीद के भाई ने उन्हें मुखाग्नि दी। बता दें कि सुरेश सिंह की पोस्टिंग जम्मू में थी और 8 अक्टूबर को अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई थी। उन्हें समय पर आर्मी हॉस्पिटल जम्मू में भी भर्ती करा दिया गया था लेकिन इलाज के दौरान ही उन्होंने दम तोड़ दिया। शहीद की अंतिम यात्रा से जुड़ी कुछ PHOTOS देखिए… अब पढ़ें कौन थे हवलदार सुरेश सिंह…. बागेश्वर में जन्में, दो बच्चों के पिता बागेश्वर जिले के बमन भीड़ी गांव में जन्में सुरेश सिंह (47) को बचपन से ही आर्मी में भर्ती होना था, मेहनत और शिक्षा की बदौलत वो यूनिट 3 राजपूत रेजिमेंट में भर्ती भी हो गए। परिवार में उनके पिता का निधन हो चुका है जबकि मां गांव में ही रहती हैं। ग्रामीणों ने बताया कि सुरेश सिंह तीन भाइयों में सबसे छोटे थे जबकि उनके एक भाई का भी निधन हो चुका है। वहीं सुरेश का दो बच्चे भी हैं, जिनके सिर से अब पिता का छाया छिन चुका है। ड्यूटी के दौरान तबीयत बिगड़ी, पहले दिल्ली पहुंचा शव सुरेश सिंह रोज की तरह अपनी ड्यूटी पर थे लेकिन 8 अक्टूबर को अचानक उनकी तबीयत एकदम से बिगड़ गई, साथियों ने उन्हें अस्पताल भी पहुंचाया लेकिन यहां इलाज के दौरान ही उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। जिसके बाद सुरेश सिंह की पार्थिव देह को शुक्रवार सुबह फ्लाइट से दिल्ली लाया गया। देर शाम पार्थिव देह उनके गांव बमन भीड़ी पहुंची।और शनिवार सुबह 11 बजे गांव के पास गोमती-सरयू संगम घाट में जवान का सैन्य सम्मान से अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान कौसानी के सिग्नल पोर से आए जवानों ने सुरेश सिंह को गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया। 200 मीटर लंबी निकाली तिरंगा यात्रा
अंतिम संस्कार से पहले 200 मीटर लंबी तिरंगा यात्रा भी निकाली गई थी। साथ ही जवान की पार्थिव देह के अंतिम दर्शन करने के दौरान उनकी पत्नी भी बार बार बेहोश हो रहीं थीं जिन्हें परिवार की दूसरी महिलाएं संभाल रहीं थी, साथ ही उनके बच्चों का भी रो-रोकर बुरा हाल था। सैनिक कल्याण विभाग के अधिकारी ने पहुंचकर दी श्रद्धांजलि
सैनिक कल्याण विभाग की ओर से सहायक अधिकारी कैलाश पंत ने शहीद के पैतृक गांव पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस दौरान पूर्व सैनिक संगठन के रमेश तिवारी, कैलाश पंत, माधो सिंह, मनोज कुमार, रमेश भंडारी, भूपेश दफैटी, मोहन सिंह, प्रताप सिंह और भूपाल सिंह भी शामिल रहे। जिला प्रशासन ने नहीं की व्यवस्था
अंतिम संस्कार से पहले पूर्व सैनिक संगठन के सचिव रमेश भंडारी ने भी प्रशासन के अधिकारियों पर सवाल खड़े किए थे, उन्होंने बताया था कि अंतिम संस्कार की समय सीमा तय होने के बाद भी जिला प्रशासन ने सैनिक के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी। काफी समय इंतजार करने के बाद वह पहुंचे। उन्होंने कहा- सैनिक हमेशा सीमा में तैनात रहता है। पर जब उसके शहीद होने पर भी अधिकारियों के पास उसके लिए समय नहीं होता, तो बुरा लगता है
उत्तराखंड के बागेश्वर में आज शहीद हवलदार सुरेश सिंह का सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया। शुक्रवार को उनकी पार्थिव देह को जम्मू से दिल्ली लाया गया था और फिर यहां से पैतृक गांव बमन भीड़ी पहुंचाया गया था। शव के गांव में पहुंचते ही पूरे क्षेत्र में मातम का माहौल छा गया। शहीद की पत्नी तो पति को ताबूत में देख बार बार बेहोश होती रहीं, उनकी आंखों से आंसू रुक ही नहीं रहे थे। वहीं, सुरेश की अंतिम यात्रा में हजारों की तादाद में लोग शामिल हुए। सभी ने नम आखों के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी। जिसके बाद दोपहर के समय बमन भीड़ी गांव के पास ही सरयू-गोमती घाट पर शहीद के भाई ने उन्हें मुखाग्नि दी। बता दें कि सुरेश सिंह की पोस्टिंग जम्मू में थी और 8 अक्टूबर को अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई थी। उन्हें समय पर आर्मी हॉस्पिटल जम्मू में भी भर्ती करा दिया गया था लेकिन इलाज के दौरान ही उन्होंने दम तोड़ दिया। शहीद की अंतिम यात्रा से जुड़ी कुछ PHOTOS देखिए… अब पढ़ें कौन थे हवलदार सुरेश सिंह…. बागेश्वर में जन्में, दो बच्चों के पिता बागेश्वर जिले के बमन भीड़ी गांव में जन्में सुरेश सिंह (47) को बचपन से ही आर्मी में भर्ती होना था, मेहनत और शिक्षा की बदौलत वो यूनिट 3 राजपूत रेजिमेंट में भर्ती भी हो गए। परिवार में उनके पिता का निधन हो चुका है जबकि मां गांव में ही रहती हैं। ग्रामीणों ने बताया कि सुरेश सिंह तीन भाइयों में सबसे छोटे थे जबकि उनके एक भाई का भी निधन हो चुका है। वहीं सुरेश का दो बच्चे भी हैं, जिनके सिर से अब पिता का छाया छिन चुका है। ड्यूटी के दौरान तबीयत बिगड़ी, पहले दिल्ली पहुंचा शव सुरेश सिंह रोज की तरह अपनी ड्यूटी पर थे लेकिन 8 अक्टूबर को अचानक उनकी तबीयत एकदम से बिगड़ गई, साथियों ने उन्हें अस्पताल भी पहुंचाया लेकिन यहां इलाज के दौरान ही उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। जिसके बाद सुरेश सिंह की पार्थिव देह को शुक्रवार सुबह फ्लाइट से दिल्ली लाया गया। देर शाम पार्थिव देह उनके गांव बमन भीड़ी पहुंची।और शनिवार सुबह 11 बजे गांव के पास गोमती-सरयू संगम घाट में जवान का सैन्य सम्मान से अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान कौसानी के सिग्नल पोर से आए जवानों ने सुरेश सिंह को गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया। 200 मीटर लंबी निकाली तिरंगा यात्रा
अंतिम संस्कार से पहले 200 मीटर लंबी तिरंगा यात्रा भी निकाली गई थी। साथ ही जवान की पार्थिव देह के अंतिम दर्शन करने के दौरान उनकी पत्नी भी बार बार बेहोश हो रहीं थीं जिन्हें परिवार की दूसरी महिलाएं संभाल रहीं थी, साथ ही उनके बच्चों का भी रो-रोकर बुरा हाल था। सैनिक कल्याण विभाग के अधिकारी ने पहुंचकर दी श्रद्धांजलि
सैनिक कल्याण विभाग की ओर से सहायक अधिकारी कैलाश पंत ने शहीद के पैतृक गांव पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस दौरान पूर्व सैनिक संगठन के रमेश तिवारी, कैलाश पंत, माधो सिंह, मनोज कुमार, रमेश भंडारी, भूपेश दफैटी, मोहन सिंह, प्रताप सिंह और भूपाल सिंह भी शामिल रहे। जिला प्रशासन ने नहीं की व्यवस्था
अंतिम संस्कार से पहले पूर्व सैनिक संगठन के सचिव रमेश भंडारी ने भी प्रशासन के अधिकारियों पर सवाल खड़े किए थे, उन्होंने बताया था कि अंतिम संस्कार की समय सीमा तय होने के बाद भी जिला प्रशासन ने सैनिक के लिए कोई व्यवस्था नहीं की थी। काफी समय इंतजार करने के बाद वह पहुंचे। उन्होंने कहा- सैनिक हमेशा सीमा में तैनात रहता है। पर जब उसके शहीद होने पर भी अधिकारियों के पास उसके लिए समय नहीं होता, तो बुरा लगता है