सुप्रीम कोर्ट ने हिमालयी राज्यों में बिगड़ते पारिस्थितिक संतुलन पर चिंता जताते हुए कहा है कि यह पूरा क्षेत्र एक गंभीर अस्तित्व संकट का सामना कर रहा है। कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार से इस संबंध में कई सवालों के जवाब मांगे हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि इस मानसून में हिमाचल में भारी बारिश और भूस्खलन से सैकड़ों लोगों की जान गई और हजारों संपत्तियां तबाह हो गईं। हिमाचल का नाजुक इकोसिस्टम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पूरा हिमालयी क्षेत्र गंभीर संकट में है। लगातार हो रहे भूस्खलन, मकानों के गिरने, सड़कों के धंसने जैसी घटनाओं के लिए प्रकृति नहीं, बल्कि इंसान जिम्मेदार है। विशेषज्ञों की रिपोर्ट के हवाले से कोर्ट ने कहा कि हिमाचल में तबाही के बड़े कारण हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स, फोर लेन सड़कें, जंगलों की कटाई और बहुमंजिला इमारतें हैं। कोर्ट ने माना कि पर्यटन हिमाचल की आय का बड़ा स्रोत है, लेकिन अनियंत्रित पर्यटन से पर्यावरण पर भारी दबाव पड़ा है। राज्य को पर्यटन और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना होगा। हिमाचल प्रदेश सरकार से ये जानकारी मांगी गई कोर्ट ने कहा कि इन सभी सवालों के जवाब राज्य सरकार को शपथपत्र (एफिडेविट) के रूप में 28 अक्टूबर तक देने होंगे। हिमालयी राज्यों में इस साल 100 से ज्यादा आपदाएं आईं
भारतीय हिमालयी क्षेत्र 13 राज्यों जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल, अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल तक है। इसकी कुल लंबाई 2500 किमी है। इसे भारत की ‘जल मीनार’ भी कहते हैं, क्योंकि बड़ी नदियां यहीं से निकलती हैं। इस साल क्षेत्र में 100 से ज्यादा आपदाएं आईं। इससे उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर में काफी तबाही हुई। 626 मौतें हुईं। पहले भी जताई जा चुकी है चेतावनी इससे पहले 28 जुलाई को जस्टिस जेबी पारडीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा था कि अगर हालात नहीं बदले तो हिमाचल प्रदेश ‘हवा में गायब’ हो सकता है। उस समय भी कोर्ट ने खुद संज्ञान (सुओ मोटू) लेते हुए चेताया था कि जलवायु परिवर्तन का ‘खतरनाक असर’ राज्य में साफ दिख रहा है। विशेषज्ञों और रिपोर्टों में भी यह माना गया है कि हिमाचल में तबाही की बड़ी वजहें हाइड्रो प्रोजेक्ट, चौड़ी सड़कें, जंगलों की कटाई और अनियंत्रित पर्यटन हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी याद दिलाया कि उसकी जिम्मेदारी है कि राज्य के पारिस्थितिक संतुलन को बिगड़ने से बचाए।
सुप्रीम कोर्ट ने हिमालयी राज्यों में बिगड़ते पारिस्थितिक संतुलन पर चिंता जताते हुए कहा है कि यह पूरा क्षेत्र एक गंभीर अस्तित्व संकट का सामना कर रहा है। कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार से इस संबंध में कई सवालों के जवाब मांगे हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि इस मानसून में हिमाचल में भारी बारिश और भूस्खलन से सैकड़ों लोगों की जान गई और हजारों संपत्तियां तबाह हो गईं। हिमाचल का नाजुक इकोसिस्टम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पूरा हिमालयी क्षेत्र गंभीर संकट में है। लगातार हो रहे भूस्खलन, मकानों के गिरने, सड़कों के धंसने जैसी घटनाओं के लिए प्रकृति नहीं, बल्कि इंसान जिम्मेदार है। विशेषज्ञों की रिपोर्ट के हवाले से कोर्ट ने कहा कि हिमाचल में तबाही के बड़े कारण हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स, फोर लेन सड़कें, जंगलों की कटाई और बहुमंजिला इमारतें हैं। कोर्ट ने माना कि पर्यटन हिमाचल की आय का बड़ा स्रोत है, लेकिन अनियंत्रित पर्यटन से पर्यावरण पर भारी दबाव पड़ा है। राज्य को पर्यटन और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना होगा। हिमाचल प्रदेश सरकार से ये जानकारी मांगी गई कोर्ट ने कहा कि इन सभी सवालों के जवाब राज्य सरकार को शपथपत्र (एफिडेविट) के रूप में 28 अक्टूबर तक देने होंगे। हिमालयी राज्यों में इस साल 100 से ज्यादा आपदाएं आईं
भारतीय हिमालयी क्षेत्र 13 राज्यों जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, हिमाचल, अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा, असम और पश्चिम बंगाल तक है। इसकी कुल लंबाई 2500 किमी है। इसे भारत की ‘जल मीनार’ भी कहते हैं, क्योंकि बड़ी नदियां यहीं से निकलती हैं। इस साल क्षेत्र में 100 से ज्यादा आपदाएं आईं। इससे उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर में काफी तबाही हुई। 626 मौतें हुईं। पहले भी जताई जा चुकी है चेतावनी इससे पहले 28 जुलाई को जस्टिस जेबी पारडीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा था कि अगर हालात नहीं बदले तो हिमाचल प्रदेश ‘हवा में गायब’ हो सकता है। उस समय भी कोर्ट ने खुद संज्ञान (सुओ मोटू) लेते हुए चेताया था कि जलवायु परिवर्तन का ‘खतरनाक असर’ राज्य में साफ दिख रहा है। विशेषज्ञों और रिपोर्टों में भी यह माना गया है कि हिमाचल में तबाही की बड़ी वजहें हाइड्रो प्रोजेक्ट, चौड़ी सड़कें, जंगलों की कटाई और अनियंत्रित पर्यटन हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी याद दिलाया कि उसकी जिम्मेदारी है कि राज्य के पारिस्थितिक संतुलन को बिगड़ने से बचाए।