हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के पूर्व चेयरमैन प्रोफेसर अब्दुल गनी भट का 90 साल की उम्र में बुधवार को निधन हो गया। वह कुछ समय से बीमार थे और उत्तरी कश्मीर के बारामुला जिले के सोपोर में अपने घर पर ही उन्होंने आखिरी सांस ली। परिवार ने बताया कि भट का निधन अल्प बीमारी के बाद हुआ। उनके अंतिम संस्कार और जनाजे की जानकारी परिवार जल्द देगा। 1935 में जन्मे भट हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के संस्थापक नेताओं में से एक थे और लंबे समय तक अलगाववादी राजनीति से जुड़े रहे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से फारसी और लॉ की डिग्री प्राप्त करने वाले प्रो. भट कश्मीर के पुराने और कट्टर अलगाववादी नेताओं में एक थे। उन्होंने कुछ समय तक सोपोर में वकालत भी की और वर्ष 1963 में वह जम्मू-कश्मीर शिक्षा विभाग के अंतर्गत फारसी के प्रोफेसर नियुक्त हुए थे। 1986 में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट पार्टी बनाई उन्होंने 1986 में दूसरे नेताओं के साथ मिलकर मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (MUF) की स्थापना की थी। 1993 में बने ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (APHC) के चेयरमैन भी रहे। इसके अलावा वे मुस्लिम कॉन्फ्रेंस, जम्मू-कश्मीर (MCJK) के अध्यक्ष रहे, जिसे बाद में भारत सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। प्रोफेसर अब्दुल गनी भट से जुड़े विवादित किस्से हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के पूर्व चेयरमैन प्रोफेसर अब्दुल गनी भट अपने बयानों और राजनीतिक रुख को लेकर कई बार विवादों में रहे। 1996 में उनके भाई की अज्ञात हमलावरों ने हत्या कर दी थी। बाद में भट ने कहा था कि यह काम अपने ही लोगों” ने किया है, न कि सुरक्षा बलों ने। उन्होंने कहा था- ‘मुझे पता है कि सच कड़वा है और इसे कहने का खतरा है, लेकिन मुझे कोई चुप नहीं करा सकता।’ जनवरी 2011 को उन्होंने श्रीनगर में एक सेमीनार को संबोधित करते हुए कहा था कि हमारे अपने ही कुछ लोगों को, हमारे अपनों ने ही कत्ल किया और कत्ल कराया है। हालांकि, उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था, लेकिन उन्होंने यह बात मीरवाइज फारूक अहमद और अब्दुल गनी लोन की हत्या के संदर्भ में कही थी। जम्मू-कश्मीर पर रुख भट ने कई मौकों पर कहा था कि ‘जम्मू-कश्मीर की आजादी संभव नहीं है’ और भारत व पाकिस्तान को बातचीत से हल निकालना चाहिए। हुर्रियत के कट्टरपंथी धड़े ने इसे भारत समर्थक रुख बताया और उनकी आलोचना की। संविधान सभा को लेकर बयान- 2011 में उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर की 1951 की संविधान सभा के फैसलों को नकारा नहीं जा सकता। इस बयान को हुर्रियत के कई नेताओं ने “अलगाववादी आंदोलन के खिलाफ” बताया। उन्होंने बार-बार कहा कि कश्मीर मसले का हल केवल भारत और पाकिस्तान की बातचीत से होगा। उनके इस मध्यमार्गी रवैये से हुर्रियत के भीतर ही विरोध पैदा होता रहा।
हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के पूर्व चेयरमैन प्रोफेसर अब्दुल गनी भट का 90 साल की उम्र में बुधवार को निधन हो गया। वह कुछ समय से बीमार थे और उत्तरी कश्मीर के बारामुला जिले के सोपोर में अपने घर पर ही उन्होंने आखिरी सांस ली। परिवार ने बताया कि भट का निधन अल्प बीमारी के बाद हुआ। उनके अंतिम संस्कार और जनाजे की जानकारी परिवार जल्द देगा। 1935 में जन्मे भट हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के संस्थापक नेताओं में से एक थे और लंबे समय तक अलगाववादी राजनीति से जुड़े रहे। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से फारसी और लॉ की डिग्री प्राप्त करने वाले प्रो. भट कश्मीर के पुराने और कट्टर अलगाववादी नेताओं में एक थे। उन्होंने कुछ समय तक सोपोर में वकालत भी की और वर्ष 1963 में वह जम्मू-कश्मीर शिक्षा विभाग के अंतर्गत फारसी के प्रोफेसर नियुक्त हुए थे। 1986 में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट पार्टी बनाई उन्होंने 1986 में दूसरे नेताओं के साथ मिलकर मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (MUF) की स्थापना की थी। 1993 में बने ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (APHC) के चेयरमैन भी रहे। इसके अलावा वे मुस्लिम कॉन्फ्रेंस, जम्मू-कश्मीर (MCJK) के अध्यक्ष रहे, जिसे बाद में भारत सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। प्रोफेसर अब्दुल गनी भट से जुड़े विवादित किस्से हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के पूर्व चेयरमैन प्रोफेसर अब्दुल गनी भट अपने बयानों और राजनीतिक रुख को लेकर कई बार विवादों में रहे। 1996 में उनके भाई की अज्ञात हमलावरों ने हत्या कर दी थी। बाद में भट ने कहा था कि यह काम अपने ही लोगों” ने किया है, न कि सुरक्षा बलों ने। उन्होंने कहा था- ‘मुझे पता है कि सच कड़वा है और इसे कहने का खतरा है, लेकिन मुझे कोई चुप नहीं करा सकता।’ जनवरी 2011 को उन्होंने श्रीनगर में एक सेमीनार को संबोधित करते हुए कहा था कि हमारे अपने ही कुछ लोगों को, हमारे अपनों ने ही कत्ल किया और कत्ल कराया है। हालांकि, उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था, लेकिन उन्होंने यह बात मीरवाइज फारूक अहमद और अब्दुल गनी लोन की हत्या के संदर्भ में कही थी। जम्मू-कश्मीर पर रुख भट ने कई मौकों पर कहा था कि ‘जम्मू-कश्मीर की आजादी संभव नहीं है’ और भारत व पाकिस्तान को बातचीत से हल निकालना चाहिए। हुर्रियत के कट्टरपंथी धड़े ने इसे भारत समर्थक रुख बताया और उनकी आलोचना की। संविधान सभा को लेकर बयान- 2011 में उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर की 1951 की संविधान सभा के फैसलों को नकारा नहीं जा सकता। इस बयान को हुर्रियत के कई नेताओं ने “अलगाववादी आंदोलन के खिलाफ” बताया। उन्होंने बार-बार कहा कि कश्मीर मसले का हल केवल भारत और पाकिस्तान की बातचीत से होगा। उनके इस मध्यमार्गी रवैये से हुर्रियत के भीतर ही विरोध पैदा होता रहा।