मध्य प्रदेश में जहरीला कफ सिरप पीने से 26 मासूमों की जान चली गई। पहले उनकी किडनी फेल हुई, इसके बाद शरीर के बाकी अंगों ने भी काम करना बंद कर दिया। आखिर में उनके ब्रेन पर इसका असर हुआ और बच्चों ने दम तोड़ दिया। कफ सिरप की कीमत 89 रुपए थी और इसे पर्चे में लिखने के बदले डॉ. प्रवीण सोनी को 10 फीसदी कमीशन यानी 8 रुपए 90 पैसे मिलते थे। जितने बच्चों के लिए दवा लिखी, उनसे डॉ. प्रवीण सोनी को करीब 230 रुपए मिले थे। बच्चों की बिगड़ी हालत में उनके माता-पिता बार-बार डॉ. सोनी के पास पहुंचे और वो उन्हें कोल्ड्रिफ पिलाने की सलाह देते रहे। केवल डॉ. प्रवीण सोनी ही नहीं, इस मामले में सिस्टम में बैठे जिम्मेदार भी आंखें मूंदे रहे। 4 अक्टूबर को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा था, “हर कसूरवार पर सख्त कार्रवाई होगी।” आज 18 दिन बीत चुके हैं, लेकिन सरकार को कोई ठोस कसूरवार नहीं मिल रहा है। सरकार ने जिम्मेदारी के नाम पर तीन सरकारी बाबुओं का निलंबन और ड्रग कंट्रोलर का तबादला कर दिया गया है। अब ऐसी कौन सी जांच है, जो यह बताएगी कि इन मासूमों के असली हत्यारे कौन हैं? भास्कर ने विशेषज्ञों से बात करके इस पूरे तंत्र को समझने की कोशिश की कि आखिर इस जहरीली दवा के बनने से लेकर बच्चों तक पहुंचने तक हमारे सिस्टम के कौन-कौन से किरदार इस गुनाह में बराबर के साझेदार रहे हैं। पढ़िए, रिपोर्ट… बिना जांच के तमिलनाडु से छिंदवाड़ा तक पहुंचा ‘जहर’
इस कहानी का विलेन है- श्रीसन फॉर्मा का मालिक रंगनाथन। यह वही कंपनी है, जिसे तमिलनाडु सरकार पहले ही गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने के कारण बैन कर चुकी थी। लेकिन रंगनाथन ने कानून को धता बताते हुए बस नाम और जगह बदलकर अपनी मौत की फैक्ट्री फिर से शुरू कर दी। फैक्ट्री की केमिकल एनालिस्ट के. माहेश्वरी ने दवा बनाने के लिए जरूरी प्रोपलीन ग्लाइकॉल की जगह डायथिलीन ग्लाइकॉल नामक जहरीले औद्योगिक सॉल्वेंट का इस्तेमाल कर लिया। इसका इस्तेमाल पेंट, ब्रेक फ्लूइड और एंटीफ्रीज में होता है। इंसान के शरीर में जाते ही यह किडनी और लिवर को पूरी तरह से नष्ट कर देता है। सबसे बड़ी लापरवाही यह हुई कि बिना किसी क्वालिटी टेस्ट के, बिना जांच रिपोर्ट का इंतजार किए, बैच नंबर एसआर-13 को बाजार में उतार दिया गया। जहर से भरी यह खेप मध्य प्रदेश के सुपर स्टॉकिस्ट, जबलपुर के कटारिया फॉर्मा तक पहुंच गई। यहां से यह छिंदवाड़ा के स्टॉकिस्ट न्यू अपना फॉर्मा और फिर शहर के मेडिकल स्टोर्स तक पहुंच गई। इधर बच्चे तड़पते रहे, उधर डॉ. सोनी कमीशन के चक्कर में दवा लिखते रहे
नियम के अनुसार, हर जिले के ड्रग इंस्पेक्टर्स की यह जिम्मेदारी होती है कि वे बाजार में बिक रही दवाओं के रैंडम सैंपल लेकर उनकी जांच करें। लेकिन छिंदवाड़ा में ऐसा कुछ नहीं हुआ। जहर से भरी यह दवा बिना किसी रोक-टोक के मेडिकल स्टोर्स पर बिकती रही। खांसी के इलाज के लिए डॉ. प्रवीण सोनी बच्चों को यही दवा लिखते रहे। जब बच्चों के माता-पिता उल्टी, पेट दर्द और पेशाब रुकने की शिकायत लेकर वापस डॉ. सोनी के पास पहुंचे, तो किसी भी जिम्मेदार डॉक्टर की तरह दवा के साइड इफेक्ट की जांच करने के बजाय, सोनी ने माता-पिता को वही सिरप पिलाते रहने की सलाह दी और कहा, ‘अब किसी दूसरे डॉक्टर के पास ले जाओ।’ डॉ. प्रवीण सोनी ने भी यह मान लिया है कि कोल्ड्रिफ लिखने के बदले उन्हें कंपनी से हर सिरप पर 10% का कमीशन मिलता था। दवा की एमआरपी 89 रुपए है यानी एक बच्चे की जिंदगी की कीमत महज 8 रुपए 90 पैसे? सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, छिंदवाड़ा में इस बैच के 594 सिरप सप्लाई हुए थे। अगर ये सारे सिरप बिक भी जाते, तो डॉक्टर को कुल मिलाकर सिर्फ 5286 रुपए का कमीशन मिलता। इलाज के लिए किसी ने कर्ज लिया, तो किसी ने गहने बेचे
38 साल से प्रैक्टिस कर रहे एक डॉक्टर के लिए शायद यह समझना मुश्किल नहीं था कि बच्चे की पेशाब रुक रही है, शरीर में सूजन आ रही है यानी उसकी किडनी काम करना बंद कर रही है। लेकिन कमीशन का लालच शायद पेशेवर नैतिकता पर भारी पड़ गया। माता-पिता अपने तड़पते बच्चों को लेकर अस्पताल-दर-अस्पताल भागते रहे, लेकिन मध्य प्रदेश के सरकारी सिस्टम से उन्हें कोई मदद नहीं मिली। किसी ने कर्ज लिया, किसी ने गहने बेचे, तो किसी ने अपनी जमीन गिरवी रख दी, ताकि अपने बच्चे की जिंदगी बचा सकें। वे 125 किलोमीटर दूर नागपुर के बड़े अस्पतालों में पहुंचे, लेकिन ज्यादातर वहां से अपने बच्चों की लाशें लेकर ही लौटे। नागपुर के डॉक्टरों ने बताया, तब नींद से जागा छिंदवाड़ा का सिस्टम
छिंदवाड़ा का सोया हुआ सरकारी सिस्टम तब जागा, जब नागपुर के डॉक्टरों ने खतरे की घंटी बजाई। उन्होंने पाया कि किडनी फेल होने की शिकायत के साथ आ रहे सभी बच्चों के पर्चे पर एक दवा ‘कोल्ड्रिफ सिरप’ कॉमन थी। उन्होंने तुरंत छिंदवाड़ा के स्वास्थ्य विभाग को इसकी सूचना दी। 26 सितंबर को नागपुर मेडिकल कॉलेज ने बच्चों की किडनी बायोप्सी की रिपोर्ट भेजकर आधिकारिक तौर पर पुष्टि की कि बच्चों की किडनी किसी दवा के जहरीले प्रभाव के कारण खराब हो रही है। इसके बाद छिंदवाड़ा के तत्कालीन कलेक्टर शीलेंद्र सिंह ने स्वास्थ्य अमले की आपात बैठक बुलाई। बैठक में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पवन नंदुरकर ने साफ कहा कि बायोप्सी रिपोर्ट और नागपुर के डॉक्टरों की सलाह के आधार पर इस कफ सिरप को तुरंत बैन किया जाना चाहिए। 29 सितंबर को यानी पहली शिकायत के कई दिनों बाद, छिंदवाड़ा प्रशासन ने अपने जिले में इस दवा को फ्रीज किया और इसकी बिक्री पर पाबंदी लगा दी। सैंपल जांच के लिए भोपाल भेजे गए। मंत्री ने दी क्लीन चिट, अफसर करते रहे लीपापोती
यहां से सरकारी तंत्र की बेशर्मी और लापरवाही का एक नया अध्याय शुरू होता है। 29 सितंबर को छिंदवाड़ा में जिस दवा पर पाबंदी लगी, उसी दवा को दो दिन बाद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने यह कहकर क्लीन चिट दे दी कि ‘सरकार के पास कफ सिरप से मौत होने की कोई रिपोर्ट नहीं है, इसलिए पूरे राज्य में इसे बैन नहीं कर सकते।’ उधर, स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव संदीप यादव मीडिया की उन खबरों को निराधार बताते रहे, जो बच्चों की मौत की सच्चाई बयान कर रही थीं। वे कहते रहे, ‘पत्रकारों को जो छापना है, छापने दो।’ यादव के जनसंपर्क अधिकारियों ने तो भास्कर की खबरों का खंडन तक प्रसारित करने की तैयारी कर ली थी, लेकिन उनकी यह कोशिश नाकाम हो गई। तमिलनाडु सरकार को बताया लापरवाही का जिम्मेदार
3 अक्टूबर को तमिलनाडु सरकार की जांच रिपोर्ट आ गई, जिसमें यह पुष्टि हो गई कि सिरप में 48% जहरीला केमिकल है। इस रिपोर्ट के आने के बाद किरकिरी से बचने के लिए मुख्यमंत्री ने खुद ट्वीट कर दवा को पूरे प्रदेश में बैन करने की जानकारी दी। जब रिपोर्ट में जहर की पुष्टि हो गई, तब भी प्रमुख सचिव यादव ने अपनी गलती नहीं मानी। वह यह कहते रहे कि इसमें मध्य प्रदेश सरकार की नहीं, बल्कि तमिलनाडु सरकार की गलती है, जिसने बिना क्वालिटी जांच के दवा को अप्रूव कर दिया। छुट्टी पर अफसर, लैब में ताला और दम तोड़ते बच्चे
लापरवाही की इंतहा यह थी कि 30 सितंबर को छिंदवाड़ा से जो सैंपल भोपाल भेजे गए थे, उनकी टेस्टिंग 4 अक्टूबर से शुरू हुई। बीच के दिनों में हमारा ड्रग डिपार्टमेंट और जांच लैब छुट्टियां मनाते रहे। तत्कालीन ड्रग कंट्रोलर दिनेश मौर्य ने बेशर्मी से स्वीकार किया कि दशहरे की छुट्टी थी, इसलिए कोई जांच नहीं हुई। उससे पहले अफसर नवमी की पूजा पर चले गए थे। जब तमिलनाडु की रिपोर्ट से देश भर में हंगामा मचा, तो भोपाल की लैब ने 5 अक्टूबर की आधी रात को अपनी रिपोर्ट जारी की, जिसमें सिरप में 46% जहर होने की पुष्टि हुई। पुलिस की कार्रवाई और अधूरे सवाल
एक्शन के नाम पर मध्य प्रदेश पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने तमिलनाडु जाकर फैक्ट्री मालिक रंगनाथन और केमिकल एनालिस्ट को गिरफ्तार कर लिया है। डॉ. प्रवीण सोनी को भी गिरफ्तार किया गया। उन्होंने लोअर कोर्ट में जमानत अर्जी दाखिल की, लेकिन वो खारिज हो गई। हाईकोर्ट में अपील की है, जिस पर 27 अक्टूबर को सुनवाई होगी। डॉ. सोनी के वकीलों ने तर्क दिए कि उन्होंने सिर्फ दवा लिखी है, बनाई नहीं इसलिए उन्हें आरोपी नहीं बनाया जा सकता। सरकारी वकील ने तर्क दिया- डॉ. सोनी को यह जानकारी थी कि फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (FDC) वाली दवाएं 4 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को नहीं दी जानी चाहिए, फिर भी उन्होंने यह दवा जारी रखी। वो इसके बदले 10 फीसदी कमीशन लेते थे, ये उन्होंने स्वीकार किया है। सरकारी वकील के तर्क सुनने के बाद कोर्ट ने डॉ. सोनी को जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा- घटना की जानकारी होने के बाद भी डॉक्टर ने संबंधित दवा का उपयोग जारी रखा। स्वास्थ्य महानिदेशालय की 18 दिसंबर 2023 की गाइडलाइन के बावजूद 4 वर्ष से कम आयु के बच्चों को एफडीसी सिरप देना गंभीर लापरवाही है। अपराध गंभीर प्रकृति का है, जांच अभी अधूरी है और अभियुक्त साक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है। इस पूरे मामले ने देश के दवा रेगुलेशन सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। देश के ड्रग कंट्रोलर ने सभी तरह की सिरप के कच्चे माल की भी जांच के आदेश दिए हैं और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने भी इस मामले पर रिपोर्ट मांगी है। एक्सपर्ट बोले- हर कदम पर हुई चूक
नेशनल हेल्थ मिशन के पूर्व एडिशनल डायरेक्टर और पूर्व सीएमएचओ डॉ. पंकज शुक्ला ने कहा कि इस मामले में हर कदम पर लापरवाही नजर आती है। कोल्ड्रिफ सिरप बनाने वाली श्रीसन फॉर्मा ने क्वालिटी टेस्ट किए बिना इसे बाजार में भेज दिया। वहां के ड्रग इंस्पेक्टर और ड्रग कंट्रोलर इसकी निगरानी करने में पूरी तरह विफल रहे। इसके बाद श्रीसन फॉर्मा ने बिना जांच रिपोर्ट के ही सिरप को जबलपुर के सुपर स्टॉकिस्ट कटारिया फॉर्मा को भेज दिया। जो कि एक आपराधिक लापरवाही है। इधर, कटारिया फॉर्मा ने भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई और दवा की जांच रिपोर्ट देखे बिना ही उसे छिंदवाड़ा के स्टॉकिस्ट को सप्लाई कर दिया। वे कहते हैं- हमारे राज्य में ये नियम ही नहीं है कि जो दवा बिकने के लिए आती है, उसकी लैब टेस्ट रिपोर्ट मांगी जाए। हमारे देश में ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 में अंग्रेजों के जमाने में बना था। उस समय इतनी दवाइयां नहीं बनती थी, न ही इतनी ज्यादा मिलावट होती थी। लोगों में नैतिकता का अभाव भी नहीं था। इस एक्ट को बदलने की जरूरत है। मामले से जुड़ी ये खबर भी पढे़ं… 26 मौतों के दर्दभरे किस्से…दिमाग तक पहुंचा सिरप छिंदवाड़ा में जहरीला कफ सिरप पीने से अब तक 26 बच्चों की मौत हो चुकी है। बच्चों की मौत की प्रारंभिक वजह किडनी फेल होना बताया जा रहा है, लेकिन ये केवल यहां तक सीमित नहीं थी। कफ सिरप में शामिल डायएथिलीन ग्लाइकॉल केमिकल ने बच्चों के दूसरे अंगों को भी धीरे-धीरे डैमेज किया था, जिसमें लिवर और फेफड़े भी शामिल है। पढे़ं पूरी खबर… मध्य प्रदेश में हर जिले में दवाओं की जांच की तैयारी
मध्य प्रदेश में जहरीले सिरप से 26 बच्चों की मौत के बाद अब राज्य सरकार दवाओं में होने वाली मिलावट की जांच माइक्रो लेवल पर कराने की तैयारी कर रही है। इसके लिए दवाओं की जांच के पूरे सिस्टम को अपग्रेड करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इस बदलाव पर करीब 211 करोड़ रुपए खर्च करने की तैयारी है। पढे़ं पूरी खबर…
मध्य प्रदेश में जहरीला कफ सिरप पीने से 26 मासूमों की जान चली गई। पहले उनकी किडनी फेल हुई, इसके बाद शरीर के बाकी अंगों ने भी काम करना बंद कर दिया। आखिर में उनके ब्रेन पर इसका असर हुआ और बच्चों ने दम तोड़ दिया। कफ सिरप की कीमत 89 रुपए थी और इसे पर्चे में लिखने के बदले डॉ. प्रवीण सोनी को 10 फीसदी कमीशन यानी 8 रुपए 90 पैसे मिलते थे। जितने बच्चों के लिए दवा लिखी, उनसे डॉ. प्रवीण सोनी को करीब 230 रुपए मिले थे। बच्चों की बिगड़ी हालत में उनके माता-पिता बार-बार डॉ. सोनी के पास पहुंचे और वो उन्हें कोल्ड्रिफ पिलाने की सलाह देते रहे। केवल डॉ. प्रवीण सोनी ही नहीं, इस मामले में सिस्टम में बैठे जिम्मेदार भी आंखें मूंदे रहे। 4 अक्टूबर को मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा था, “हर कसूरवार पर सख्त कार्रवाई होगी।” आज 18 दिन बीत चुके हैं, लेकिन सरकार को कोई ठोस कसूरवार नहीं मिल रहा है। सरकार ने जिम्मेदारी के नाम पर तीन सरकारी बाबुओं का निलंबन और ड्रग कंट्रोलर का तबादला कर दिया गया है। अब ऐसी कौन सी जांच है, जो यह बताएगी कि इन मासूमों के असली हत्यारे कौन हैं? भास्कर ने विशेषज्ञों से बात करके इस पूरे तंत्र को समझने की कोशिश की कि आखिर इस जहरीली दवा के बनने से लेकर बच्चों तक पहुंचने तक हमारे सिस्टम के कौन-कौन से किरदार इस गुनाह में बराबर के साझेदार रहे हैं। पढ़िए, रिपोर्ट… बिना जांच के तमिलनाडु से छिंदवाड़ा तक पहुंचा ‘जहर’
इस कहानी का विलेन है- श्रीसन फॉर्मा का मालिक रंगनाथन। यह वही कंपनी है, जिसे तमिलनाडु सरकार पहले ही गुणवत्ता मानकों पर खरा न उतरने के कारण बैन कर चुकी थी। लेकिन रंगनाथन ने कानून को धता बताते हुए बस नाम और जगह बदलकर अपनी मौत की फैक्ट्री फिर से शुरू कर दी। फैक्ट्री की केमिकल एनालिस्ट के. माहेश्वरी ने दवा बनाने के लिए जरूरी प्रोपलीन ग्लाइकॉल की जगह डायथिलीन ग्लाइकॉल नामक जहरीले औद्योगिक सॉल्वेंट का इस्तेमाल कर लिया। इसका इस्तेमाल पेंट, ब्रेक फ्लूइड और एंटीफ्रीज में होता है। इंसान के शरीर में जाते ही यह किडनी और लिवर को पूरी तरह से नष्ट कर देता है। सबसे बड़ी लापरवाही यह हुई कि बिना किसी क्वालिटी टेस्ट के, बिना जांच रिपोर्ट का इंतजार किए, बैच नंबर एसआर-13 को बाजार में उतार दिया गया। जहर से भरी यह खेप मध्य प्रदेश के सुपर स्टॉकिस्ट, जबलपुर के कटारिया फॉर्मा तक पहुंच गई। यहां से यह छिंदवाड़ा के स्टॉकिस्ट न्यू अपना फॉर्मा और फिर शहर के मेडिकल स्टोर्स तक पहुंच गई। इधर बच्चे तड़पते रहे, उधर डॉ. सोनी कमीशन के चक्कर में दवा लिखते रहे
नियम के अनुसार, हर जिले के ड्रग इंस्पेक्टर्स की यह जिम्मेदारी होती है कि वे बाजार में बिक रही दवाओं के रैंडम सैंपल लेकर उनकी जांच करें। लेकिन छिंदवाड़ा में ऐसा कुछ नहीं हुआ। जहर से भरी यह दवा बिना किसी रोक-टोक के मेडिकल स्टोर्स पर बिकती रही। खांसी के इलाज के लिए डॉ. प्रवीण सोनी बच्चों को यही दवा लिखते रहे। जब बच्चों के माता-पिता उल्टी, पेट दर्द और पेशाब रुकने की शिकायत लेकर वापस डॉ. सोनी के पास पहुंचे, तो किसी भी जिम्मेदार डॉक्टर की तरह दवा के साइड इफेक्ट की जांच करने के बजाय, सोनी ने माता-पिता को वही सिरप पिलाते रहने की सलाह दी और कहा, ‘अब किसी दूसरे डॉक्टर के पास ले जाओ।’ डॉ. प्रवीण सोनी ने भी यह मान लिया है कि कोल्ड्रिफ लिखने के बदले उन्हें कंपनी से हर सिरप पर 10% का कमीशन मिलता था। दवा की एमआरपी 89 रुपए है यानी एक बच्चे की जिंदगी की कीमत महज 8 रुपए 90 पैसे? सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, छिंदवाड़ा में इस बैच के 594 सिरप सप्लाई हुए थे। अगर ये सारे सिरप बिक भी जाते, तो डॉक्टर को कुल मिलाकर सिर्फ 5286 रुपए का कमीशन मिलता। इलाज के लिए किसी ने कर्ज लिया, तो किसी ने गहने बेचे
38 साल से प्रैक्टिस कर रहे एक डॉक्टर के लिए शायद यह समझना मुश्किल नहीं था कि बच्चे की पेशाब रुक रही है, शरीर में सूजन आ रही है यानी उसकी किडनी काम करना बंद कर रही है। लेकिन कमीशन का लालच शायद पेशेवर नैतिकता पर भारी पड़ गया। माता-पिता अपने तड़पते बच्चों को लेकर अस्पताल-दर-अस्पताल भागते रहे, लेकिन मध्य प्रदेश के सरकारी सिस्टम से उन्हें कोई मदद नहीं मिली। किसी ने कर्ज लिया, किसी ने गहने बेचे, तो किसी ने अपनी जमीन गिरवी रख दी, ताकि अपने बच्चे की जिंदगी बचा सकें। वे 125 किलोमीटर दूर नागपुर के बड़े अस्पतालों में पहुंचे, लेकिन ज्यादातर वहां से अपने बच्चों की लाशें लेकर ही लौटे। नागपुर के डॉक्टरों ने बताया, तब नींद से जागा छिंदवाड़ा का सिस्टम
छिंदवाड़ा का सोया हुआ सरकारी सिस्टम तब जागा, जब नागपुर के डॉक्टरों ने खतरे की घंटी बजाई। उन्होंने पाया कि किडनी फेल होने की शिकायत के साथ आ रहे सभी बच्चों के पर्चे पर एक दवा ‘कोल्ड्रिफ सिरप’ कॉमन थी। उन्होंने तुरंत छिंदवाड़ा के स्वास्थ्य विभाग को इसकी सूचना दी। 26 सितंबर को नागपुर मेडिकल कॉलेज ने बच्चों की किडनी बायोप्सी की रिपोर्ट भेजकर आधिकारिक तौर पर पुष्टि की कि बच्चों की किडनी किसी दवा के जहरीले प्रभाव के कारण खराब हो रही है। इसके बाद छिंदवाड़ा के तत्कालीन कलेक्टर शीलेंद्र सिंह ने स्वास्थ्य अमले की आपात बैठक बुलाई। बैठक में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पवन नंदुरकर ने साफ कहा कि बायोप्सी रिपोर्ट और नागपुर के डॉक्टरों की सलाह के आधार पर इस कफ सिरप को तुरंत बैन किया जाना चाहिए। 29 सितंबर को यानी पहली शिकायत के कई दिनों बाद, छिंदवाड़ा प्रशासन ने अपने जिले में इस दवा को फ्रीज किया और इसकी बिक्री पर पाबंदी लगा दी। सैंपल जांच के लिए भोपाल भेजे गए। मंत्री ने दी क्लीन चिट, अफसर करते रहे लीपापोती
यहां से सरकारी तंत्र की बेशर्मी और लापरवाही का एक नया अध्याय शुरू होता है। 29 सितंबर को छिंदवाड़ा में जिस दवा पर पाबंदी लगी, उसी दवा को दो दिन बाद राज्य के स्वास्थ्य मंत्री राजेंद्र शुक्ल ने यह कहकर क्लीन चिट दे दी कि ‘सरकार के पास कफ सिरप से मौत होने की कोई रिपोर्ट नहीं है, इसलिए पूरे राज्य में इसे बैन नहीं कर सकते।’ उधर, स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख सचिव संदीप यादव मीडिया की उन खबरों को निराधार बताते रहे, जो बच्चों की मौत की सच्चाई बयान कर रही थीं। वे कहते रहे, ‘पत्रकारों को जो छापना है, छापने दो।’ यादव के जनसंपर्क अधिकारियों ने तो भास्कर की खबरों का खंडन तक प्रसारित करने की तैयारी कर ली थी, लेकिन उनकी यह कोशिश नाकाम हो गई। तमिलनाडु सरकार को बताया लापरवाही का जिम्मेदार
3 अक्टूबर को तमिलनाडु सरकार की जांच रिपोर्ट आ गई, जिसमें यह पुष्टि हो गई कि सिरप में 48% जहरीला केमिकल है। इस रिपोर्ट के आने के बाद किरकिरी से बचने के लिए मुख्यमंत्री ने खुद ट्वीट कर दवा को पूरे प्रदेश में बैन करने की जानकारी दी। जब रिपोर्ट में जहर की पुष्टि हो गई, तब भी प्रमुख सचिव यादव ने अपनी गलती नहीं मानी। वह यह कहते रहे कि इसमें मध्य प्रदेश सरकार की नहीं, बल्कि तमिलनाडु सरकार की गलती है, जिसने बिना क्वालिटी जांच के दवा को अप्रूव कर दिया। छुट्टी पर अफसर, लैब में ताला और दम तोड़ते बच्चे
लापरवाही की इंतहा यह थी कि 30 सितंबर को छिंदवाड़ा से जो सैंपल भोपाल भेजे गए थे, उनकी टेस्टिंग 4 अक्टूबर से शुरू हुई। बीच के दिनों में हमारा ड्रग डिपार्टमेंट और जांच लैब छुट्टियां मनाते रहे। तत्कालीन ड्रग कंट्रोलर दिनेश मौर्य ने बेशर्मी से स्वीकार किया कि दशहरे की छुट्टी थी, इसलिए कोई जांच नहीं हुई। उससे पहले अफसर नवमी की पूजा पर चले गए थे। जब तमिलनाडु की रिपोर्ट से देश भर में हंगामा मचा, तो भोपाल की लैब ने 5 अक्टूबर की आधी रात को अपनी रिपोर्ट जारी की, जिसमें सिरप में 46% जहर होने की पुष्टि हुई। पुलिस की कार्रवाई और अधूरे सवाल
एक्शन के नाम पर मध्य प्रदेश पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने तमिलनाडु जाकर फैक्ट्री मालिक रंगनाथन और केमिकल एनालिस्ट को गिरफ्तार कर लिया है। डॉ. प्रवीण सोनी को भी गिरफ्तार किया गया। उन्होंने लोअर कोर्ट में जमानत अर्जी दाखिल की, लेकिन वो खारिज हो गई। हाईकोर्ट में अपील की है, जिस पर 27 अक्टूबर को सुनवाई होगी। डॉ. सोनी के वकीलों ने तर्क दिए कि उन्होंने सिर्फ दवा लिखी है, बनाई नहीं इसलिए उन्हें आरोपी नहीं बनाया जा सकता। सरकारी वकील ने तर्क दिया- डॉ. सोनी को यह जानकारी थी कि फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (FDC) वाली दवाएं 4 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को नहीं दी जानी चाहिए, फिर भी उन्होंने यह दवा जारी रखी। वो इसके बदले 10 फीसदी कमीशन लेते थे, ये उन्होंने स्वीकार किया है। सरकारी वकील के तर्क सुनने के बाद कोर्ट ने डॉ. सोनी को जमानत देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा- घटना की जानकारी होने के बाद भी डॉक्टर ने संबंधित दवा का उपयोग जारी रखा। स्वास्थ्य महानिदेशालय की 18 दिसंबर 2023 की गाइडलाइन के बावजूद 4 वर्ष से कम आयु के बच्चों को एफडीसी सिरप देना गंभीर लापरवाही है। अपराध गंभीर प्रकृति का है, जांच अभी अधूरी है और अभियुक्त साक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है। इस पूरे मामले ने देश के दवा रेगुलेशन सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। देश के ड्रग कंट्रोलर ने सभी तरह की सिरप के कच्चे माल की भी जांच के आदेश दिए हैं और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने भी इस मामले पर रिपोर्ट मांगी है। एक्सपर्ट बोले- हर कदम पर हुई चूक
नेशनल हेल्थ मिशन के पूर्व एडिशनल डायरेक्टर और पूर्व सीएमएचओ डॉ. पंकज शुक्ला ने कहा कि इस मामले में हर कदम पर लापरवाही नजर आती है। कोल्ड्रिफ सिरप बनाने वाली श्रीसन फॉर्मा ने क्वालिटी टेस्ट किए बिना इसे बाजार में भेज दिया। वहां के ड्रग इंस्पेक्टर और ड्रग कंट्रोलर इसकी निगरानी करने में पूरी तरह विफल रहे। इसके बाद श्रीसन फॉर्मा ने बिना जांच रिपोर्ट के ही सिरप को जबलपुर के सुपर स्टॉकिस्ट कटारिया फॉर्मा को भेज दिया। जो कि एक आपराधिक लापरवाही है। इधर, कटारिया फॉर्मा ने भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई और दवा की जांच रिपोर्ट देखे बिना ही उसे छिंदवाड़ा के स्टॉकिस्ट को सप्लाई कर दिया। वे कहते हैं- हमारे राज्य में ये नियम ही नहीं है कि जो दवा बिकने के लिए आती है, उसकी लैब टेस्ट रिपोर्ट मांगी जाए। हमारे देश में ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक एक्ट 1940 में अंग्रेजों के जमाने में बना था। उस समय इतनी दवाइयां नहीं बनती थी, न ही इतनी ज्यादा मिलावट होती थी। लोगों में नैतिकता का अभाव भी नहीं था। इस एक्ट को बदलने की जरूरत है। मामले से जुड़ी ये खबर भी पढे़ं… 26 मौतों के दर्दभरे किस्से…दिमाग तक पहुंचा सिरप छिंदवाड़ा में जहरीला कफ सिरप पीने से अब तक 26 बच्चों की मौत हो चुकी है। बच्चों की मौत की प्रारंभिक वजह किडनी फेल होना बताया जा रहा है, लेकिन ये केवल यहां तक सीमित नहीं थी। कफ सिरप में शामिल डायएथिलीन ग्लाइकॉल केमिकल ने बच्चों के दूसरे अंगों को भी धीरे-धीरे डैमेज किया था, जिसमें लिवर और फेफड़े भी शामिल है। पढे़ं पूरी खबर… मध्य प्रदेश में हर जिले में दवाओं की जांच की तैयारी
मध्य प्रदेश में जहरीले सिरप से 26 बच्चों की मौत के बाद अब राज्य सरकार दवाओं में होने वाली मिलावट की जांच माइक्रो लेवल पर कराने की तैयारी कर रही है। इसके लिए दवाओं की जांच के पूरे सिस्टम को अपग्रेड करने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। इस बदलाव पर करीब 211 करोड़ रुपए खर्च करने की तैयारी है। पढे़ं पूरी खबर…