आत्मज्ञान : जीवन की सच्ची शांति का मार्ग

MAAsterG : जब तक हम समझेंगे नहीं कि मानवता है क्या, जब तक इंसान समझेगा नहीं कि साढ़े पाँच फुट का ये शरीर, जो मेरा है, ये मिट्टी का बना हुआ है । माँ की कोख में बूंद बनकर आया था, चाहे कोई प्रेसिडेंट हो, प्राइम मिनिस्टर हो, सेठ हो या भिखारी हो । सब बूंद बनकर ही अंदर आए थे । मिट्टी खाई, चारों तरफ मिट्टी चिपकी, और नौ महीने में बाहर आए । नाभि से कटते ही वह मरा हुआ था, फिर उसमें ऊर्जा गई, वो रोया और आखिरी में फिर वो ऊर्जा निकलेगी जिसको आत्मा, चेतना कह लो, और ये मिट्टी का डला गिरेगा ,तो उठाने वाला कोई नहीं होगा । तो जब तक ये इंसान स्वयं को नहीं समझेगा,तब तक ये चलता रहेगा । जिन्होंने खोजा, ज्ञान दिया उनको आज भगवान, भगवान का बेटा, या भगवान का दूत कह रहे हैं, उन्होंने यही ज्ञान दिया कि तू इंसान है, तू इस सृष्टि का मजा ले; क्योंकि तू ही ले सकता है, तेरे पास ही दिमाग है । ‘है इंसान तू , तो हरकतें ज़रा इंसानों जैसी कर’। तू उस भगवान, ईश्वर, गॉड, अल्लाह की औलाद है। थोड़ा सोच कि उनको क्या जवाब देगा । क्या उन्होंने किसी को मार-काट करने के लिए कहा है ? तो जब तक स्वयं को नहीं जानेंगे, तब तक ये मौज नहीं आने वाली । स्वयं को जानना है, इसी को स्पिरिचुअलिटी यानी अध्यात्म कहते हैं। तो स्वयं के इस शरीर रूपी यंत्र का ज्ञान – आत्मज्ञान ही इस धरती पर खुशहाली, शांति ला सकता है ।
प्रश्न : MAAsterG आपने बताया कि आत्मज्ञान क्यों जरूरी है । आपने बताया कि महापुरुषों की वाणी जो हमें आंतरिक आनंद दे सकती है, लेकिन वो आत्मज्ञान सही में है क्या? और हमें करना क्या है, जिसको करके हम आत्मज्ञान और आंतरिक शांति को प्राप्त कर सकते हैं?
MAAsterG : सिर्फ समझना है! और कुछ नहीं करना है । जिसको हम धर्म कहते हैं, धर्म में करना इसलिए शुरू किया गया कि इसी बहाने तुम रुकोगे मंदिर , गुरुद्वारे, चर्च, मस्जिद में । करना इसलिए कहा गया कि ये कर, वो कर, पूजा कर, पाठ कर ताकि तुम रूको । और रुकोगे तो समझोगे कि कृष्ण ने क्या कहा है, गुरु नानक देव ने क्या कहा , मोहम्मद साहब ने क्या कहा है, जीसस ने क्या कहा है ।
अब अगर आप समझ जाएँ तो इन सबने एक ही बात कही है – कि गर्भ से नौ महीने में सब जन्म लेते हैं और श्मशान में एक ही जगह जलते हैं या दफन हो जाते हैं । तो फिर ये फर्क क्यों है ? सब लोग मेहनत करते हैं पर सारे ऑफिसर क्यों नहीं बन जाते ? कोई चपरासी क्यों बनता है? सारे मिनिस्टर क्यों नहीं बन जाते ? तो ऐसा क्यों है ? ये सोचना है ! जब आप ये समझ जाएँगे कि ये भाग्य हैं । प्रारब्ध, और संचयित कर्म होते हैं, जो कि अभी आप चल रहे हैं । इस जन्म में जो भी आपने इच्छा में आसक्ति रखी, तो आपके अंदर वो रिकॉर्ड हो रहा है । फिर आप दुखी हो रहे हैं, तो जो दुखी और अशांत हो रहे हो, वो सीन फिर रीशूट होगा । क्योंकि पिछले मनुष्य जन्म में आपने यही सीन माँगा था । और अब आप रो रहे हो, तो वो सीन फिर रीशूट होगा, क्योंकि आप दुखी होकर कर रहे हैं । मैं ये चाहता हूँ, जिस पर रो रहे हो, वो भी रिकॉर्ड हो रहा है ।
‘इच्छा में आसक्ति’ गीता कह रही है, यही गुरु नानक देव कह रहे हैं ‘कर्म सदडा खेत’ और यही सबने कहा । ये जो तुम्हारे संचयित कर्मा रिकॉर्ड हो रहे है, इससे तुम्हारी प्रारब्ध, तुम्हारा भाग्य तैयार हो रहा है । और क्रियमाण कर्म वह हैं, जिस भी स्थिति का अभी तुम सामना कर रहे हो, जो भी तुम्हारी जिंदगी में हो रहा है । तो ये समझना है कि तुम यहाँ वही रोल अदा करने के लिए हो, जो रोल तुमने माँगा था । इस जन्म से पहले लाखों करोड़ों जन्म हो गए, कृष्ण भगवान यही कह रहे हैं और आगे भी होंगे । अगर तुम इसका रिलैक्स में सामना नहीं कर रहे, तो फिर तुम्हारा भाग्य अगला जन्म लेकर आएगा । इससे ज्यादा कुछ नहीं समझना। समझ गए तो खेल की मौज लो।
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