छिंदवाड़ा में जहरीला कफ सिरप पीने से अब तक 26 बच्चों की मौत हो चुकी है। बच्चों की मौत की प्रारंभिक वजह किडनी फेल होना बताया जा रहा है, लेकिन ये केवल यहां तक सीमित नहीं थी। कफ सिरप में शामिल डायएथिलीन ग्लाइकॉल केमिकल ने बच्चों के दूसरे अंगों को भी धीरे-धीरे डैमेज किया था, जिसमें लिवर और फेफड़े भी शामिल है। इसका सबसे भयावह पहलू ये है कि जहरीली दवा से बच्चों के ब्रेन ने काम करना बंद कर दिया था। इस मामले में 3 बच्चों का पोस्टमॉर्टम हुआ है, लेकिन प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इसकी रिपोर्ट को दबाए बैठा है। दवा का इस्तेमाल करने वाले अभी भी कई बच्चों का इलाज नागपुर के अस्पताल में चल रहा है। आखिर एक मामूली सर्दी-खांसी की दवा ने बच्चों के शरीर को इस कदर कैसे तबाह किया कि वे अपनी पुरानी जिंदगी में नहीं लौट सके? भास्कर ने फॉरेंसिक एक्सपर्ट के साथ टॉक्सिकोलॉजिस्ट और उन शिशु रोग विशेषज्ञों से बात की, जिन्होंने बच्चों का इलाज किया था। पढ़िए, रिपोर्ट… जहरीले सिरप ने शरीर में एसिड बनाया
यह समझने के लिए कि आखिर इस सिरप ने बच्चों को कैसे मारा, हमने ग्वालियर मेडिकल कॉलेज के टॉक्सिकोलॉजिस्ट डॉ. विनोद ढींगरा से बात की। उन्होंने बताया कि कफ सिरप में मिलाया गया ‘डायएथिलीन ग्लाइकॉल’ वही केमिकल है, जो गाड़ियों को ठंडा रखने वाले कूलेंट में इस्तेमाल होता है। यह इंसानी शरीर के लिए बेहद खतरनाक है। डॉ. ढींगरा ने एक अमेरिकन जर्नल की रिपोर्ट का हवाला देते हुए समझाया, ‘जब यह केमिकल मानव शरीर में जाता है, तो मेटाबॉलाइज होकर कई जहरीले एसिड बनाता है। इससे शरीर में एसिड की मात्रा खतरनाक रूप से बढ़ जाती है, जिसे ‘मेटाबोलिक एसिडोसिस’ कहते हैं। इसका सबसे पहला और घातक असर किडनी पर होता है और वह काम करना बंद कर देती है। इसके बाद यह जहर फेफड़ों में पानी भरने लगता है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है। आखिर में, यह दिमाग और सेंट्रल नर्वस सिस्टम को भी भारी नुकसान पहुंचाता है।’ हर शव का पोस्टमॉर्टम होता तो खुलते कई राज
मध्य प्रदेश के मेडिको लीगल इंस्टीट्यूट के पूर्व डायरेक्टर और फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉ. अशोक शर्मा इस मामले में एक बड़ी चूक की ओर इशारा करते हैं। वे कहते हैं, ‘जब एक ही तरह के लक्षणों से बच्चों की मौतें हो रही थीं, तो प्रशासन को तुरंत हर शव का पोस्टमॉर्टम कराने का निर्णय लेना चाहिए था। पोस्टमॉर्टम में विसरा (आंतरिक अंगों के सैंपल) और हिस्टोपैथोलॉजी (ऊतकों की सूक्ष्म जांच) से यह साफ हो जाता कि शरीर के किस हिस्से में कितना जहरीला केमिकल पहुंचा और उसने किस अंग को कितना नुकसान पहुंचाया।’ इसके लिए डॉ. शर्मा भोपाल गैस त्रासदी का उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि भोपाल गैस त्रासदी में जब मरने वालों का पोस्टमॉर्टम और हिस्टोपैथोलॉजी जांच हुई, तभी यह निर्णायक रूप से पता चला था कि गैस में सायनाइड जैसा जहर भी था, जिसका सबसे ज्यादा असर फेफड़ों पर हुआ था। डॉक्टरों की आंखों देखी- बच्चों के सारे अंग फेल हो चुके थे
कफ सिरप पीने के बाद जब बच्चों को नागपुर के अस्पतालों में लाया गया, तो शुरुआती तौर पर डॉक्टरों को भी लगा कि यह किडनी फैलियर का सामान्य मामला है। नागपुर के वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश अग्रवाल, जिन्होंने कई बच्चों का इलाज किया, उस भयावह मंजर को याद करते हुए कहते हैं, “जब बच्चे हमारे पास पहुंचे तो शुरू में हमें लगा कि यह किडनी फैलियर है। जैसे ही हमने डायलिसिस शुरू किया, उनकी हालत और बिगड़ने लगी। तब हमें एहसास हुआ कि यह सिर्फ किडनी की समस्या नहीं, बल्कि मल्टी-ऑर्गन फैलियर है। जहर उनके लिवर, फेफड़े और ब्रेन तक पहुंच चुका था।” वह कहते हैं, ‘सबसे दुखद यह था कि माता-पिता को पता ही नहीं था कि वे अपने बच्चों को दवा के नाम पर जहर पिला रहे हैं। वे तो डॉक्टर के लिखे पर्चे के अनुसार कफ सिरप का पूरा डोज देते रहे। जब हमने कई बच्चों के पर्चे देखे और पाया कि उन सभी में ‘कोल्ड्रिफ’ सिरप कॉमन है, तब हमें शक हुआ। पहली खतरे की घंटी और प्रशासन की चुप्पी
छिंदवाड़ा मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पवन नंदुरकर वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इस पूरे मामले में खतरे की घंटी बजाई थी। वे कहते हैं, ‘जब तक बच्चे हमारे जिला अस्पताल पहुंचे, वे बहुत क्रिटिकल हो चुके थे। हमारे पास उन्हें समझने या लंबा इलाज देने का समय नहीं था, इसलिए हमने बिना देर किए उन्हें बेहतर इलाज के लिए नागपुर रेफर किया। तब तक हमें भी नहीं पता था कि ऐसा क्यों हो रहा है। सच्चाई का खुलासा तब हुआ, जब नागपुर से एक बच्चे की किडनी की बायोप्सी रिपोर्ट आई। डॉ. नंदुरकर बताते हैं, ‘बायोप्सी रिपोर्ट में ‘एक्यूट ट्यूबलर इंज्युरी’ का पता चला, जो किसी बाहरी जहरीले तत्व की वजह से होती है। तभी हमें शक हुआ कि यह कफ सिरप से हो सकता है।’ सीएमएचओ बोले- पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट नहीं मिली
प्रशासन ने इतना सब होने के बाद भी कफ सिरप को बैन करने में 15 दिन लगा दिए। तब तक और भी बच्चे इसका इस्तेमाल कर चुके थे। प्रशासन ने मौतों का सही कारण जानने के लिए भी कोई ठोस कदम नहीं उठाए। छिंदवाड़ा के सीएमएचओ नरेश गोन्नाडे का कहना है कि जिन बच्चों का पोस्टमॉर्टम हुआ है, उसकी रिपोर्ट उन्हें भी नहीं मिली है। फिलहाल, जो बच्चे अस्पताल में भर्ती हैं, उनके परिजन किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहे हैं। खबर पर आप अपनी राय यहां दे सकते हैं… मामले से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें…
कफ सिरप केस- छिंदवाड़ा के एक और बच्चे की मौत, MP में मौत का आंकड़ा 26 पहुंचा छिंदवाड़ा जिले में जहरीले कफ सिरप से बच्चों की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है। 15 अक्टूबर की सुबह चौरई क्षेत्र की 3 साल 6 माह की अम्बिका विश्वकर्मा की नागपुर में इलाज के दौरान मौत हो गई। इसके साथ ही मध्य प्रदेश में सिरप कांड से मरने वाले बच्चों का आंकड़ा अब 26 पर पहुंच गया है। दो और बच्चे नागपुर के अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर…
छिंदवाड़ा में जहरीला कफ सिरप पीने से अब तक 26 बच्चों की मौत हो चुकी है। बच्चों की मौत की प्रारंभिक वजह किडनी फेल होना बताया जा रहा है, लेकिन ये केवल यहां तक सीमित नहीं थी। कफ सिरप में शामिल डायएथिलीन ग्लाइकॉल केमिकल ने बच्चों के दूसरे अंगों को भी धीरे-धीरे डैमेज किया था, जिसमें लिवर और फेफड़े भी शामिल है। इसका सबसे भयावह पहलू ये है कि जहरीली दवा से बच्चों के ब्रेन ने काम करना बंद कर दिया था। इस मामले में 3 बच्चों का पोस्टमॉर्टम हुआ है, लेकिन प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग इसकी रिपोर्ट को दबाए बैठा है। दवा का इस्तेमाल करने वाले अभी भी कई बच्चों का इलाज नागपुर के अस्पताल में चल रहा है। आखिर एक मामूली सर्दी-खांसी की दवा ने बच्चों के शरीर को इस कदर कैसे तबाह किया कि वे अपनी पुरानी जिंदगी में नहीं लौट सके? भास्कर ने फॉरेंसिक एक्सपर्ट के साथ टॉक्सिकोलॉजिस्ट और उन शिशु रोग विशेषज्ञों से बात की, जिन्होंने बच्चों का इलाज किया था। पढ़िए, रिपोर्ट… जहरीले सिरप ने शरीर में एसिड बनाया
यह समझने के लिए कि आखिर इस सिरप ने बच्चों को कैसे मारा, हमने ग्वालियर मेडिकल कॉलेज के टॉक्सिकोलॉजिस्ट डॉ. विनोद ढींगरा से बात की। उन्होंने बताया कि कफ सिरप में मिलाया गया ‘डायएथिलीन ग्लाइकॉल’ वही केमिकल है, जो गाड़ियों को ठंडा रखने वाले कूलेंट में इस्तेमाल होता है। यह इंसानी शरीर के लिए बेहद खतरनाक है। डॉ. ढींगरा ने एक अमेरिकन जर्नल की रिपोर्ट का हवाला देते हुए समझाया, ‘जब यह केमिकल मानव शरीर में जाता है, तो मेटाबॉलाइज होकर कई जहरीले एसिड बनाता है। इससे शरीर में एसिड की मात्रा खतरनाक रूप से बढ़ जाती है, जिसे ‘मेटाबोलिक एसिडोसिस’ कहते हैं। इसका सबसे पहला और घातक असर किडनी पर होता है और वह काम करना बंद कर देती है। इसके बाद यह जहर फेफड़ों में पानी भरने लगता है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है। आखिर में, यह दिमाग और सेंट्रल नर्वस सिस्टम को भी भारी नुकसान पहुंचाता है।’ हर शव का पोस्टमॉर्टम होता तो खुलते कई राज
मध्य प्रदेश के मेडिको लीगल इंस्टीट्यूट के पूर्व डायरेक्टर और फॉरेंसिक एक्सपर्ट डॉ. अशोक शर्मा इस मामले में एक बड़ी चूक की ओर इशारा करते हैं। वे कहते हैं, ‘जब एक ही तरह के लक्षणों से बच्चों की मौतें हो रही थीं, तो प्रशासन को तुरंत हर शव का पोस्टमॉर्टम कराने का निर्णय लेना चाहिए था। पोस्टमॉर्टम में विसरा (आंतरिक अंगों के सैंपल) और हिस्टोपैथोलॉजी (ऊतकों की सूक्ष्म जांच) से यह साफ हो जाता कि शरीर के किस हिस्से में कितना जहरीला केमिकल पहुंचा और उसने किस अंग को कितना नुकसान पहुंचाया।’ इसके लिए डॉ. शर्मा भोपाल गैस त्रासदी का उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि भोपाल गैस त्रासदी में जब मरने वालों का पोस्टमॉर्टम और हिस्टोपैथोलॉजी जांच हुई, तभी यह निर्णायक रूप से पता चला था कि गैस में सायनाइड जैसा जहर भी था, जिसका सबसे ज्यादा असर फेफड़ों पर हुआ था। डॉक्टरों की आंखों देखी- बच्चों के सारे अंग फेल हो चुके थे
कफ सिरप पीने के बाद जब बच्चों को नागपुर के अस्पतालों में लाया गया, तो शुरुआती तौर पर डॉक्टरों को भी लगा कि यह किडनी फैलियर का सामान्य मामला है। नागपुर के वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश अग्रवाल, जिन्होंने कई बच्चों का इलाज किया, उस भयावह मंजर को याद करते हुए कहते हैं, “जब बच्चे हमारे पास पहुंचे तो शुरू में हमें लगा कि यह किडनी फैलियर है। जैसे ही हमने डायलिसिस शुरू किया, उनकी हालत और बिगड़ने लगी। तब हमें एहसास हुआ कि यह सिर्फ किडनी की समस्या नहीं, बल्कि मल्टी-ऑर्गन फैलियर है। जहर उनके लिवर, फेफड़े और ब्रेन तक पहुंच चुका था।” वह कहते हैं, ‘सबसे दुखद यह था कि माता-पिता को पता ही नहीं था कि वे अपने बच्चों को दवा के नाम पर जहर पिला रहे हैं। वे तो डॉक्टर के लिखे पर्चे के अनुसार कफ सिरप का पूरा डोज देते रहे। जब हमने कई बच्चों के पर्चे देखे और पाया कि उन सभी में ‘कोल्ड्रिफ’ सिरप कॉमन है, तब हमें शक हुआ। पहली खतरे की घंटी और प्रशासन की चुप्पी
छिंदवाड़ा मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पवन नंदुरकर वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने इस पूरे मामले में खतरे की घंटी बजाई थी। वे कहते हैं, ‘जब तक बच्चे हमारे जिला अस्पताल पहुंचे, वे बहुत क्रिटिकल हो चुके थे। हमारे पास उन्हें समझने या लंबा इलाज देने का समय नहीं था, इसलिए हमने बिना देर किए उन्हें बेहतर इलाज के लिए नागपुर रेफर किया। तब तक हमें भी नहीं पता था कि ऐसा क्यों हो रहा है। सच्चाई का खुलासा तब हुआ, जब नागपुर से एक बच्चे की किडनी की बायोप्सी रिपोर्ट आई। डॉ. नंदुरकर बताते हैं, ‘बायोप्सी रिपोर्ट में ‘एक्यूट ट्यूबलर इंज्युरी’ का पता चला, जो किसी बाहरी जहरीले तत्व की वजह से होती है। तभी हमें शक हुआ कि यह कफ सिरप से हो सकता है।’ सीएमएचओ बोले- पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट नहीं मिली
प्रशासन ने इतना सब होने के बाद भी कफ सिरप को बैन करने में 15 दिन लगा दिए। तब तक और भी बच्चे इसका इस्तेमाल कर चुके थे। प्रशासन ने मौतों का सही कारण जानने के लिए भी कोई ठोस कदम नहीं उठाए। छिंदवाड़ा के सीएमएचओ नरेश गोन्नाडे का कहना है कि जिन बच्चों का पोस्टमॉर्टम हुआ है, उसकी रिपोर्ट उन्हें भी नहीं मिली है। फिलहाल, जो बच्चे अस्पताल में भर्ती हैं, उनके परिजन किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहे हैं। खबर पर आप अपनी राय यहां दे सकते हैं… मामले से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें…
कफ सिरप केस- छिंदवाड़ा के एक और बच्चे की मौत, MP में मौत का आंकड़ा 26 पहुंचा छिंदवाड़ा जिले में जहरीले कफ सिरप से बच्चों की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है। 15 अक्टूबर की सुबह चौरई क्षेत्र की 3 साल 6 माह की अम्बिका विश्वकर्मा की नागपुर में इलाज के दौरान मौत हो गई। इसके साथ ही मध्य प्रदेश में सिरप कांड से मरने वाले बच्चों का आंकड़ा अब 26 पर पहुंच गया है। दो और बच्चे नागपुर के अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर…