1962 के भारत-चीन युद्ध में लेह-लद्दाख के पहाड़ी दर्रे रेजांग-ला में शहीद में हुए 114 शहीदों का 63 साल बाद तर्पण किया गया है। इसके लिए रेजांग-ला पराक्रम यात्रा निकाली गई, जो 6500 किलोमीटर का सफर तय करके रेजांग-ला के अहीर धाम में पहुंची और गंगाजल अर्पित कर तर्पण किया। रेजांग-ला शौर्य समिति के महासचिव राव नरेश चौहान ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि यात्रा 17 जून को जोधपुर से शुरू हुई। हवाई और सड़क रास्ते से पूर्व सैनिक और समिति के सदस्य हरियाणा, राजस्थान, यूपी और पंजाब से होकर लद्दाख पहुंचे। इस यात्रा ने रेजांग-ला में शहीद हुए 110 सैनिकों के गांव और जिले को टच किया। 14 जुलाई यानी सावन के पहले सोमवार को हरिद्वार से गंगाजल लिया और 23 जुलाई को अहीर धाम में जल चढ़ाया गया। राव नरेश बताते हैं कि शहादत के 63 साल बाद भी उन सैनिकों का तर्पण नहीं हुआ था। इसलिए, वहां गंगाजल चढ़ाकर वीर सैनिकों का तर्पण किया गया। यात्रा का उत्तराखंड में बाबा रामदेव और चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री नायब सैनी ने स्वागत किया था। 2 अगस्त को दिल्ली के नेशनल वॉर मेमोरियल में खत्म हुई। हर साल 18 नवंबर को रेजांग-ला दिवस मनाया जाता है। युद्ध में 124 अहीर सैनिकों ने चीन के 1300 सैनिकों को ढेर कर दिया था। 124 भारतीय जवानों में से 114 शहीद हुए। जिंदा बचे सभी 10 शूरवीर रेवाड़ी से हैं। हवलदार निहाल को कुत्ते ने राह दिखाई थी, तब वह क्वार्टर मास्टर तक पहुंचे थे। रेवाड़ी में रेजांग-ला शौर्य स्मारक भी बना है। जानिए चीनियों की गिरफ्त से बच निकले हवलदार निहाल सिंह की जुबानी पूरी कहानी… *********************** ये खबर भी पढ़ें हरियाणा के जांबाजों की कहानी, रेवाड़ी के 2 भाई एक बंकर में शहीद 18 नवंबर 1962 का वो ऐतिहासिक दिन जब भारतीय सैनिकों ने लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर रेजांग-ला की शौर्य गाथा लिखी। दुर्गम बर्फीली चोटी पर हरियाणा में अहीरवाल के वीर सैनिकों ने ऐसी अमर गाथा लिखी, जो आज भी युवाओं के जेहन में देशभक्ति की भावना पैदा करती है (पूरी खबर पढ़ें)
1962 के भारत-चीन युद्ध में लेह-लद्दाख के पहाड़ी दर्रे रेजांग-ला में शहीद में हुए 114 शहीदों का 63 साल बाद तर्पण किया गया है। इसके लिए रेजांग-ला पराक्रम यात्रा निकाली गई, जो 6500 किलोमीटर का सफर तय करके रेजांग-ला के अहीर धाम में पहुंची और गंगाजल अर्पित कर तर्पण किया। रेजांग-ला शौर्य समिति के महासचिव राव नरेश चौहान ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि यात्रा 17 जून को जोधपुर से शुरू हुई। हवाई और सड़क रास्ते से पूर्व सैनिक और समिति के सदस्य हरियाणा, राजस्थान, यूपी और पंजाब से होकर लद्दाख पहुंचे। इस यात्रा ने रेजांग-ला में शहीद हुए 110 सैनिकों के गांव और जिले को टच किया। 14 जुलाई यानी सावन के पहले सोमवार को हरिद्वार से गंगाजल लिया और 23 जुलाई को अहीर धाम में जल चढ़ाया गया। राव नरेश बताते हैं कि शहादत के 63 साल बाद भी उन सैनिकों का तर्पण नहीं हुआ था। इसलिए, वहां गंगाजल चढ़ाकर वीर सैनिकों का तर्पण किया गया। यात्रा का उत्तराखंड में बाबा रामदेव और चंडीगढ़ में मुख्यमंत्री नायब सैनी ने स्वागत किया था। 2 अगस्त को दिल्ली के नेशनल वॉर मेमोरियल में खत्म हुई। हर साल 18 नवंबर को रेजांग-ला दिवस मनाया जाता है। युद्ध में 124 अहीर सैनिकों ने चीन के 1300 सैनिकों को ढेर कर दिया था। 124 भारतीय जवानों में से 114 शहीद हुए। जिंदा बचे सभी 10 शूरवीर रेवाड़ी से हैं। हवलदार निहाल को कुत्ते ने राह दिखाई थी, तब वह क्वार्टर मास्टर तक पहुंचे थे। रेवाड़ी में रेजांग-ला शौर्य स्मारक भी बना है। जानिए चीनियों की गिरफ्त से बच निकले हवलदार निहाल सिंह की जुबानी पूरी कहानी… *********************** ये खबर भी पढ़ें हरियाणा के जांबाजों की कहानी, रेवाड़ी के 2 भाई एक बंकर में शहीद 18 नवंबर 1962 का वो ऐतिहासिक दिन जब भारतीय सैनिकों ने लद्दाख की बर्फीली चोटियों पर रेजांग-ला की शौर्य गाथा लिखी। दुर्गम बर्फीली चोटी पर हरियाणा में अहीरवाल के वीर सैनिकों ने ऐसी अमर गाथा लिखी, जो आज भी युवाओं के जेहन में देशभक्ति की भावना पैदा करती है (पूरी खबर पढ़ें)