पंजाब के मशहूर ‘किला रायपुर ग्रामीण ओलिंपिक’ को दोबारा शुरू करने की तैयारी चल रही है। इसके लिए पंजाब सरकार ने 11 जुलाई को विधानसभा में एक बिल पेश किया और उसे पास भी कर दिया। अगर अब राज्यपाल की मंजूरी मिल गई, तो फरवरी 2026 में लुधियाना के किला रायपुर में फिर से बैल दौड़ देखने को मिलेगी। इस बार बैल दौड़ को कानूनी रूप देने के लिए पशु क्रूरता कानून (Animal Cruelty Act) में बदलाव किया गया है। सरकार ने साफ कहा है कि दौड़ के दौरान बैलों को डंडे या किसी तेज चीज से नहीं मारा जाएगा, सिर्फ हाथ से थपथपा सकते हैं। जानकारों के मुताबिक, बैलगाड़ी की दौड़ में हिस्सा लेने वाले हर बैल की मेडिकल जांच होगी और सभी बैलों का रजिस्ट्रेशन भी कराया जाएगा। साथ ही देसी नस्ल के बैलों को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है। इसके बाद पंजाब के बाकी इलाकों में भी बैल दौड़ के मुकाबले हो सकेंगे। बता दें कि 2025 में जब किला रायपुर में ग्रामीण ओलिंपिक हुए थे, तब बैल दौड़ को शामिल नहीं किया गया था। लेकिन अब इस पर सरकार कानून लाई है, तो विधायक खुद बैलों के साथ यात्रा निकालकर इसका प्रचार कर रहे हैं, जो लोगों में चर्चा का विषय बन गया है। देखें सरकार की बैल यात्रा की कुछ तस्वीरें पहले जानें कैसे ग्रामीण ओलिंपिक बनीं किला रायपुर की खेलें 1933 में समाज सेवक इंदर ग्रेवाल ने शुरू किया
पंजाब के जिला लुधियाना में आते किला रायपुर की ग्रामीण खेलों की शुरुआत साल1933 में हुई। इनको शुरू करने का श्रेय लुधियाना के ही समाजसेवक इंदर सिंह ग्रेवाल को जाता है। इन खेलों को शुरू करने के पीछे उद्देश्य पंजाब के किसानों को एक प्लेटफार्म पर एकत्रित करना था। इनके मनोरंजन के लिए खेलें शुरू की गईं जो आगे चलकर पूरे पंजाब में फेमस हो गईं और इन्हें पंजाब का मिनी ओलिंपिक कहा जाने लगा। रायपुर के हॉकी में सिल्वर कप जीतने से हुई शुरुआात
साल 1933 में पहली बार रायपुर की हॉकी टीम ने जालंधर में सिल्वर कप जीता। इसी जीत से प्रेरित होकर ग्रेवाल जट्ट समुदाय ने गांवों के बीच वॉलीबॉल, कबड्डी और एथलेटिक्स की शुरुआत हुई और उसी साल “ग्रेवाल स्पोर्ट्स एसोसिएशन” बनाई गई। 1944 में पहली बार हुई बैल दौड़
साल 1940 में 440 गज का ट्रैक बनाकर एथलेटिक्स के मुकाबले शुरू हुए और साल 1944 में बाबा बक्शी के प्रयासों से बैलगाड़ी दौड़ शामिल की गई। साल 1950 में महिलाओं के लिए खेल आयोजनों की शुरुआत हुई, जो साल 1953 में औपचारिक रूप से शामिल किए गए। दुनियाभर को दिखाई जाती है पंजाब की विरासत
इंदर सिंह ग्रेवाल के प्रयासों के कारण, यह खेलें त्योहार की तरह बन गईं और हर साल आयोजित होने लगीं। अब ये खेलें दुनिया भर से लोगों को आकर्षित करती हैं। यह न केवल एक खेल आयोजन है, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी है जो पंजाब की समृद्ध विरासत को दुनियाभर में दिखाता है। लाखों रुपए कीमत के बैल लेते हैं हिस्सा, देसी घी से पाले जाते हैं
बैलगाड़ी दौड़ में हिस्सा लेने वाले बैलों की कीमत लाखों रुपए तक होती है और उनकी देखभाल बच्चों की तरह की जाती है। पंजाब के बलकार सिंह जैसे अनुभवी पशुपालक बताते हैं कि वे अपने बैलों को देसी घी, चुनिंदा अनाज और पोषक आहार खिलाकर उन्हें ताकतवर बनाते हैं। कई मेलों में उनके बैल इनाम भी जीत चुके हैं। इनको दौड़ाने के लिए प्रशिक्षित जॉकी रखे जाते हैं। अब जानें क्यों लगा बैलों की दौड़ पर प्रतिबंध जीत के लिए बैलों को नशे की गोलियां खिलाने के लगे आरोप
साल 1933 से शुरू इन खेलों में बैल दौड़ पर सवाल उठने शुरू हो गए। कुई पशु प्रेमियों ने पशु क्रूरता को लेकर कोर्ट का रुख किया। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि कुछ मालिक अपने बैलों को दौड़ के दौरान तेज भगाने के लिए नशे की गोलियां खिलाते हैं और लोहे की नुकीली ‘क्रिच’ से मारते हैं, जिससे बैल दर्द से भागने लगता है। एनिमल वेलफेयर बोर्ड ने निगरानी शुरू की
आरोपों के चलते एनिमल वेलफेयर बोर्ड की टीमों ने किला रायपुर की खेलों में बैल दौड़ के आयोजन की निगरानी शुरू की। आयोजकों ने भी कुछ साल तक पशुओं के प्रति क्रूरता रोकने के प्रयास किए, लेकिन फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया और बैल दौड़ पर साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पंजाब हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। यह फैसला “पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960” के तहत दिया गया था। 2014 के बाद से फीका पड़ा खेल उत्सव
साल 2014 के आदेश और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश के बाद कानूनी रूप से बैल दौड़ पर बैन लगने के बाद किला रायपुर में खलों का आकर्षण फीका पड़ने लगा। धीरे-धीरे यहां आने वाले लोगों की संख्या भी कम होने लगी। विवादों से भी जुड़ा किला रायपुर ग्रामीण ओलिंपिक
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की रोक के आदेश को 11 साल बीत चुके हैं और कभी भी यहां बैल दौड़ देखने को नहीं मिली। बैल दौड़ के जाने के बाद यहां और भी विवाद पैदा हुए और ये खेल आयोजन कुछ सालों में ही बंद हो गया। विवाद उस समय और गहरा गया जब आयोजन स्थल की जमीन को लेकर कानूनी मसला खड़ा हो गया, जिससे साल 2018 के बाद खेल आयोजन पूरी तरह रुक गया। साल 2023 में गांव के पट्टी सुहाविया गुट के पक्ष में फैसला आने के बाद आयोजन को दोबारा शुरू करने की राह साफ हुई। साल 2024 से पंजाब सरकार ने खेलों के आयोजन की जिम्मेदारी अपने हाथ में ली। पहले भी इसे शुरू करने के दो प्रयास हो चुके
पंजाब सरकार ने 2019 में विधानसभा में एक संशोधन विधेयक पारित किया था, जिससे बैल दौड़ को कानूनी मान्यता मिल सके। इसके तहत पशुओं की देखभाल और सुरक्षा से जुड़े विशेष प्रावधानों के साथ पारंपरिक खेल को संरक्षित करने की बात कही गई थी। 2024 में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी से मुलाकात कर इस खेल को दोबारा शुरू कराने की मांग भी की थी। अब 2025 में राज्य सरकार ने इस दिशा में अंतिम कदम बढ़ा दिया है। पंजाब विधानसभा ने सर्वसम्मति से विधेयक को पारित कर दिया है। राज्यपाल की मंजूरी मिलते ही बैल दौड़ को कानूनी दर्जा मिल जाएगा। बैल दौड़ के अलावा ये मुकाबले भी फेमस
बैल दौड़ के अलावा इस आयोजन में पुरुष और महिला हॉकी, अंडर-14 और अंडर-17 बालिकाओं के लिए कबड्डी, 60 मीटर तथा 100 मीटर दौड़, 1500 मीटर महिला-पुरुष रेस, 400 मीटर की हीट और फाइनल, खो-खो, पुरुष वॉलीबॉल, शूटिंग और पारंपरिक ग्रामीण खेलों की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। इतना ही नहीं, शाम को मशहूर पंजाबी गायक गीतों से समा बांधते हैं। म्यूजिक इंडस्ट्री के अलावा पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री के कलाकारों को भी यहां मंच दिया जाता है। हॉकी में जीत की हैट्रिक वाली टीम को मिलती है 1 किलो सोने की ट्रॉफी
बात साल 1956 की है, पाकिस्तान की टीम ने पहली बार किला रायपुर की खेलों में कबड्डी कर में भाग लिया। ग्रामीण खेलों में भाग लेने के वाली ये पहली विदेश की टीम बनी। इसके बाद नारंगवाल के प्रह्लाद सिंह गरेवाल ने अपने बेटे की भगवंत सिंह की याद में 100 तोले (1 किलो) सोने का कप दिया। तब से “भगवंत गोल्ड कप” हॉकी टूर्नामेंट शुरू हुआ। खेलों के वक्त ही बैंक लॉकर से निकाली जाती है ट्रॉफी
ग्रेवाल स्पोर्ट्स एसोसिएशन के पास दो बेशकीमती ट्रॉफी हैं, एक 100 तोले शुद्ध सोने का कप और दूसरा 50 तोले चांदी का कप। इन दोनों ट्राफियों को वर्षभर बैंक के लॉकर में सुरक्षित रखा जाता है और केवल पुरस्कार वितरण के दिन ही इन्हें बाहर निकाला जाता है।
पंजाब के मशहूर ‘किला रायपुर ग्रामीण ओलिंपिक’ को दोबारा शुरू करने की तैयारी चल रही है। इसके लिए पंजाब सरकार ने 11 जुलाई को विधानसभा में एक बिल पेश किया और उसे पास भी कर दिया। अगर अब राज्यपाल की मंजूरी मिल गई, तो फरवरी 2026 में लुधियाना के किला रायपुर में फिर से बैल दौड़ देखने को मिलेगी। इस बार बैल दौड़ को कानूनी रूप देने के लिए पशु क्रूरता कानून (Animal Cruelty Act) में बदलाव किया गया है। सरकार ने साफ कहा है कि दौड़ के दौरान बैलों को डंडे या किसी तेज चीज से नहीं मारा जाएगा, सिर्फ हाथ से थपथपा सकते हैं। जानकारों के मुताबिक, बैलगाड़ी की दौड़ में हिस्सा लेने वाले हर बैल की मेडिकल जांच होगी और सभी बैलों का रजिस्ट्रेशन भी कराया जाएगा। साथ ही देसी नस्ल के बैलों को बढ़ावा देने की बात भी कही गई है। इसके बाद पंजाब के बाकी इलाकों में भी बैल दौड़ के मुकाबले हो सकेंगे। बता दें कि 2025 में जब किला रायपुर में ग्रामीण ओलिंपिक हुए थे, तब बैल दौड़ को शामिल नहीं किया गया था। लेकिन अब इस पर सरकार कानून लाई है, तो विधायक खुद बैलों के साथ यात्रा निकालकर इसका प्रचार कर रहे हैं, जो लोगों में चर्चा का विषय बन गया है। देखें सरकार की बैल यात्रा की कुछ तस्वीरें पहले जानें कैसे ग्रामीण ओलिंपिक बनीं किला रायपुर की खेलें 1933 में समाज सेवक इंदर ग्रेवाल ने शुरू किया
पंजाब के जिला लुधियाना में आते किला रायपुर की ग्रामीण खेलों की शुरुआत साल1933 में हुई। इनको शुरू करने का श्रेय लुधियाना के ही समाजसेवक इंदर सिंह ग्रेवाल को जाता है। इन खेलों को शुरू करने के पीछे उद्देश्य पंजाब के किसानों को एक प्लेटफार्म पर एकत्रित करना था। इनके मनोरंजन के लिए खेलें शुरू की गईं जो आगे चलकर पूरे पंजाब में फेमस हो गईं और इन्हें पंजाब का मिनी ओलिंपिक कहा जाने लगा। रायपुर के हॉकी में सिल्वर कप जीतने से हुई शुरुआात
साल 1933 में पहली बार रायपुर की हॉकी टीम ने जालंधर में सिल्वर कप जीता। इसी जीत से प्रेरित होकर ग्रेवाल जट्ट समुदाय ने गांवों के बीच वॉलीबॉल, कबड्डी और एथलेटिक्स की शुरुआत हुई और उसी साल “ग्रेवाल स्पोर्ट्स एसोसिएशन” बनाई गई। 1944 में पहली बार हुई बैल दौड़
साल 1940 में 440 गज का ट्रैक बनाकर एथलेटिक्स के मुकाबले शुरू हुए और साल 1944 में बाबा बक्शी के प्रयासों से बैलगाड़ी दौड़ शामिल की गई। साल 1950 में महिलाओं के लिए खेल आयोजनों की शुरुआत हुई, जो साल 1953 में औपचारिक रूप से शामिल किए गए। दुनियाभर को दिखाई जाती है पंजाब की विरासत
इंदर सिंह ग्रेवाल के प्रयासों के कारण, यह खेलें त्योहार की तरह बन गईं और हर साल आयोजित होने लगीं। अब ये खेलें दुनिया भर से लोगों को आकर्षित करती हैं। यह न केवल एक खेल आयोजन है, बल्कि एक सांस्कृतिक उत्सव भी है जो पंजाब की समृद्ध विरासत को दुनियाभर में दिखाता है। लाखों रुपए कीमत के बैल लेते हैं हिस्सा, देसी घी से पाले जाते हैं
बैलगाड़ी दौड़ में हिस्सा लेने वाले बैलों की कीमत लाखों रुपए तक होती है और उनकी देखभाल बच्चों की तरह की जाती है। पंजाब के बलकार सिंह जैसे अनुभवी पशुपालक बताते हैं कि वे अपने बैलों को देसी घी, चुनिंदा अनाज और पोषक आहार खिलाकर उन्हें ताकतवर बनाते हैं। कई मेलों में उनके बैल इनाम भी जीत चुके हैं। इनको दौड़ाने के लिए प्रशिक्षित जॉकी रखे जाते हैं। अब जानें क्यों लगा बैलों की दौड़ पर प्रतिबंध जीत के लिए बैलों को नशे की गोलियां खिलाने के लगे आरोप
साल 1933 से शुरू इन खेलों में बैल दौड़ पर सवाल उठने शुरू हो गए। कुई पशु प्रेमियों ने पशु क्रूरता को लेकर कोर्ट का रुख किया। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि कुछ मालिक अपने बैलों को दौड़ के दौरान तेज भगाने के लिए नशे की गोलियां खिलाते हैं और लोहे की नुकीली ‘क्रिच’ से मारते हैं, जिससे बैल दर्द से भागने लगता है। एनिमल वेलफेयर बोर्ड ने निगरानी शुरू की
आरोपों के चलते एनिमल वेलफेयर बोर्ड की टीमों ने किला रायपुर की खेलों में बैल दौड़ के आयोजन की निगरानी शुरू की। आयोजकों ने भी कुछ साल तक पशुओं के प्रति क्रूरता रोकने के प्रयास किए, लेकिन फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया और बैल दौड़ पर साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पंजाब हाईकोर्ट ने रोक लगा दी। यह फैसला “पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960” के तहत दिया गया था। 2014 के बाद से फीका पड़ा खेल उत्सव
साल 2014 के आदेश और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश के बाद कानूनी रूप से बैल दौड़ पर बैन लगने के बाद किला रायपुर में खलों का आकर्षण फीका पड़ने लगा। धीरे-धीरे यहां आने वाले लोगों की संख्या भी कम होने लगी। विवादों से भी जुड़ा किला रायपुर ग्रामीण ओलिंपिक
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की रोक के आदेश को 11 साल बीत चुके हैं और कभी भी यहां बैल दौड़ देखने को नहीं मिली। बैल दौड़ के जाने के बाद यहां और भी विवाद पैदा हुए और ये खेल आयोजन कुछ सालों में ही बंद हो गया। विवाद उस समय और गहरा गया जब आयोजन स्थल की जमीन को लेकर कानूनी मसला खड़ा हो गया, जिससे साल 2018 के बाद खेल आयोजन पूरी तरह रुक गया। साल 2023 में गांव के पट्टी सुहाविया गुट के पक्ष में फैसला आने के बाद आयोजन को दोबारा शुरू करने की राह साफ हुई। साल 2024 से पंजाब सरकार ने खेलों के आयोजन की जिम्मेदारी अपने हाथ में ली। पहले भी इसे शुरू करने के दो प्रयास हो चुके
पंजाब सरकार ने 2019 में विधानसभा में एक संशोधन विधेयक पारित किया था, जिससे बैल दौड़ को कानूनी मान्यता मिल सके। इसके तहत पशुओं की देखभाल और सुरक्षा से जुड़े विशेष प्रावधानों के साथ पारंपरिक खेल को संरक्षित करने की बात कही गई थी। 2024 में भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी से मुलाकात कर इस खेल को दोबारा शुरू कराने की मांग भी की थी। अब 2025 में राज्य सरकार ने इस दिशा में अंतिम कदम बढ़ा दिया है। पंजाब विधानसभा ने सर्वसम्मति से विधेयक को पारित कर दिया है। राज्यपाल की मंजूरी मिलते ही बैल दौड़ को कानूनी दर्जा मिल जाएगा। बैल दौड़ के अलावा ये मुकाबले भी फेमस
बैल दौड़ के अलावा इस आयोजन में पुरुष और महिला हॉकी, अंडर-14 और अंडर-17 बालिकाओं के लिए कबड्डी, 60 मीटर तथा 100 मीटर दौड़, 1500 मीटर महिला-पुरुष रेस, 400 मीटर की हीट और फाइनल, खो-खो, पुरुष वॉलीबॉल, शूटिंग और पारंपरिक ग्रामीण खेलों की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। इतना ही नहीं, शाम को मशहूर पंजाबी गायक गीतों से समा बांधते हैं। म्यूजिक इंडस्ट्री के अलावा पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री के कलाकारों को भी यहां मंच दिया जाता है। हॉकी में जीत की हैट्रिक वाली टीम को मिलती है 1 किलो सोने की ट्रॉफी
बात साल 1956 की है, पाकिस्तान की टीम ने पहली बार किला रायपुर की खेलों में कबड्डी कर में भाग लिया। ग्रामीण खेलों में भाग लेने के वाली ये पहली विदेश की टीम बनी। इसके बाद नारंगवाल के प्रह्लाद सिंह गरेवाल ने अपने बेटे की भगवंत सिंह की याद में 100 तोले (1 किलो) सोने का कप दिया। तब से “भगवंत गोल्ड कप” हॉकी टूर्नामेंट शुरू हुआ। खेलों के वक्त ही बैंक लॉकर से निकाली जाती है ट्रॉफी
ग्रेवाल स्पोर्ट्स एसोसिएशन के पास दो बेशकीमती ट्रॉफी हैं, एक 100 तोले शुद्ध सोने का कप और दूसरा 50 तोले चांदी का कप। इन दोनों ट्राफियों को वर्षभर बैंक के लॉकर में सुरक्षित रखा जाता है और केवल पुरस्कार वितरण के दिन ही इन्हें बाहर निकाला जाता है।