उपेंद्र और दिनेश दोनों ही ग्रामीण परिवेश से आते थे, लेकिन उनमें बचपन से ही अनुशासन और सीखने की ललक थी। दोनों एक ही बेंच पर बैठते थे। आज भी मुझे जरूरत होती है, तो दोनों मेरी मदद के लिए तैयार रहते हैं। ये कहते हुए 79 साल के राधाकांत शुक्ला के चेहरे पर गर्व के भाव दिखते हैं। वह रीवा के सैनिक स्कूल से रिटायर्ड टीचर हैं। उन्हें 22 साल पहले 2003 में देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। जिस उपेंद्र और दिनेश का वह जिक्र कर रहे हैं, वो कोई और नहीं बल्कि देश के आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी और नेवी चीफ एडमिरल दिनेश त्रिपाठी हैं। दरअसल, राधाकांत शुक्ला ने दोनों को कक्षा छठवीं से 12वीं तक पढ़ाया है। आज उनके पढ़ाए दोनों स्टूडेंट सेना में सर्वोच्च पद पर हैं। वे कहते हैं एक गुरु के लिए इससे बड़ी गुरु दक्षिणा नहीं हो सकती। गुरु पूर्णिमा के मौके पर पढ़िए राधाकांत शुक्ला के अपने दोनों स्टूडेंट्स के साथ बिताए अनुभव। दोनों सेना प्रमुखों को पढ़ाया
राधाकांत शुक्ला ने रीवा के सैनिक स्कूल में 2008 तक अपनी सेवाएं दीं। इसी दौरान, कक्षा छठवीं से बारहवीं तक, उन्होंने आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी और नेवी चीफ दिनेश त्रिपाठी को पढ़ाया था। वे बताते हैं कि दोनों एक ही कक्षा में थे और अक्सर एक ही बेंच पर बैठकर पढ़ाई करते थे। वे याद करते हुए कहते हैं कि दोनों ही सामान्य परिवार और ग्रामीण परिवेश से आते थे, मगर उनमें बचपन से ही अनुशासन और सीखने की तीव्र इच्छा थी। वे स्कूल की सभी गतिविधियों में सक्रियता से भाग लेते थे और कई बार अपनी कक्षा में अव्वल भी रहे। सैनिक स्कूल में छात्रों को केवल एकेडमिक ज्ञान ही नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक और नैतिक रूप से भी सशक्त बनाया जाता है। ये सब कुछ दोनों सेना प्रमुखों के व्यक्तित्व निर्माण में सहायक साबित हुआ है। सेनाध्यक्ष बनने के बाद उपेंद्र ने पैर छुए तो भावुक हो गया
जनरल उपेंद्र द्विवेदी और एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने सेना के सर्वोच्च पदों पर पहुंचने के बाद भी अपने गुरु को नहीं भुलाया है। राधाकांत शुक्ला बताते हैं कि सेनाध्यक्ष बनने के बाद जब उपेंद्र द्विवेदी सैनिक स्कूल में एक कार्यक्रम में आए और उन्हें देखा, तो तुरंत पैर छूने के लिए झुके। मैंने उन्हें ऐसा करने से रोका, लेकिन उन्होंने कहा, ‘आपके और घरवालों के दिए संस्कार कैसे भूल सकता हूं।’ यह पल मेरे लिए बेहद भावुक करने वाला था। वे कहते हैं, ‘सेना के सर्वोच्च पद पर रहते हुए प्रोटोकॉल के बावजूद उन्होंने मुझे इतना सम्मान दिया। एक शिक्षक के लिए इससे बड़ा पुरस्कार और कुछ नहीं हो सकता।’ इसी तरह, एडमिरल दिनेश त्रिपाठी भी है जो माता-पिता और गुरुओं को सम्मान देने में पीछे नहीं रहते। मदद के लिए रहते हैं तत्पर
गुरु-शिष्य का यह रिश्ता केवल औपचारिक नहीं है, बल्कि एक गहरा पारिवारिक रिश्ता है। राधाकांत शुक्ला बताते हैं कि उनके कई अन्य छात्र सेना, चिकित्सा, शिक्षा समेत कई क्षेत्रों पर पदस्थ हैं। जब भी किसी भी प्रकार की मदद की आवश्यकता होती है तो, उसके लिए तत्पर रहते हैं। अभी 11 जुलाई को एक बार फिर दिल्ली जा रहा हूं। वहां जाकर कई शिष्यों से मुलाकात भी होगी। मुझे अपने शिष्यों से खूब सम्मान मिलता है। ऑपरेशन सिंदूर में कमाल का काम किया
ऑपरेशन सिंदूर पर राधाकांत शुक्ला ने कहा, दोनों ने कमाल का काम किया है। हमारी सेनाओं की वजह से देश सुरक्षित महसूस कर रहा है। हम वसुधैव कुटुंबकम् के रास्ते पर चलते हैं, लेकिन जब बात स्वाभिमान की हो और दुश्मन ललकारने लगे, तो उसे सबक सिखाना जरूरी होता है। ऐसे दुश्मनों को नेस्तनाबूत कर मिट्टी में मिला देना चाहिए। गीता में कृष्ण ने यही उपदेश दिया है। पिता और पांच भाई-बहन सभी शिक्षक
राधाकांत शुक्ला का पूरा परिवार शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा रहा है। उनके पिता, सभी पांच भाई और बहन भी शिक्षक रहे हैं। वे मूल रूप से प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के मांडा गांव के निवासी हैं। प्राथमिक शिक्षा गांव से और उच्च शिक्षा प्रयागराज विश्वविद्यालय से हासिल करने के बाद वे रीवा सैनिक स्कूल में शिक्षक बने। साल 2008 में वे रिटायर हुए। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित
2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने राधाकांत शुक्ला को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया था। उनके घर की आलमारियों में मेडल और कई पुरस्कार रखे हुए हैं। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार लेने वाली तस्वीर की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, राष्ट्रपति कलाम से सम्मान पाना मेरे लिए सबसे यादगार पल रहा है। अब दूसरा मौका है जब दोनों शिष्य दो सेनाओं के प्रमुख बने हैं। गुरु और पिता हारकर भी सम्मानित महसूस करते हैं
शुक्ला कहते हैं कि संसार में दो ही लोग हैं जो हारकर भी अपने को सम्मानित महसूस करते हैं। एक पिता है, जिसकी यही कामना रहती है कि उसका बेटा उससे भी आगे बढ़े। वह बेटे को हमेशा जीतते देखना चाहता है और दूसरा शिक्षक जो अपने शिष्य को हमेशा बड़े पदों पर, आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है।
उपेंद्र और दिनेश दोनों ही ग्रामीण परिवेश से आते थे, लेकिन उनमें बचपन से ही अनुशासन और सीखने की ललक थी। दोनों एक ही बेंच पर बैठते थे। आज भी मुझे जरूरत होती है, तो दोनों मेरी मदद के लिए तैयार रहते हैं। ये कहते हुए 79 साल के राधाकांत शुक्ला के चेहरे पर गर्व के भाव दिखते हैं। वह रीवा के सैनिक स्कूल से रिटायर्ड टीचर हैं। उन्हें 22 साल पहले 2003 में देश के सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। जिस उपेंद्र और दिनेश का वह जिक्र कर रहे हैं, वो कोई और नहीं बल्कि देश के आर्मी चीफ जनरल उपेंद्र द्विवेदी और नेवी चीफ एडमिरल दिनेश त्रिपाठी हैं। दरअसल, राधाकांत शुक्ला ने दोनों को कक्षा छठवीं से 12वीं तक पढ़ाया है। आज उनके पढ़ाए दोनों स्टूडेंट सेना में सर्वोच्च पद पर हैं। वे कहते हैं एक गुरु के लिए इससे बड़ी गुरु दक्षिणा नहीं हो सकती। गुरु पूर्णिमा के मौके पर पढ़िए राधाकांत शुक्ला के अपने दोनों स्टूडेंट्स के साथ बिताए अनुभव। दोनों सेना प्रमुखों को पढ़ाया
राधाकांत शुक्ला ने रीवा के सैनिक स्कूल में 2008 तक अपनी सेवाएं दीं। इसी दौरान, कक्षा छठवीं से बारहवीं तक, उन्होंने आर्मी चीफ उपेंद्र द्विवेदी और नेवी चीफ दिनेश त्रिपाठी को पढ़ाया था। वे बताते हैं कि दोनों एक ही कक्षा में थे और अक्सर एक ही बेंच पर बैठकर पढ़ाई करते थे। वे याद करते हुए कहते हैं कि दोनों ही सामान्य परिवार और ग्रामीण परिवेश से आते थे, मगर उनमें बचपन से ही अनुशासन और सीखने की तीव्र इच्छा थी। वे स्कूल की सभी गतिविधियों में सक्रियता से भाग लेते थे और कई बार अपनी कक्षा में अव्वल भी रहे। सैनिक स्कूल में छात्रों को केवल एकेडमिक ज्ञान ही नहीं बल्कि शारीरिक, मानसिक और नैतिक रूप से भी सशक्त बनाया जाता है। ये सब कुछ दोनों सेना प्रमुखों के व्यक्तित्व निर्माण में सहायक साबित हुआ है। सेनाध्यक्ष बनने के बाद उपेंद्र ने पैर छुए तो भावुक हो गया
जनरल उपेंद्र द्विवेदी और एडमिरल दिनेश त्रिपाठी ने सेना के सर्वोच्च पदों पर पहुंचने के बाद भी अपने गुरु को नहीं भुलाया है। राधाकांत शुक्ला बताते हैं कि सेनाध्यक्ष बनने के बाद जब उपेंद्र द्विवेदी सैनिक स्कूल में एक कार्यक्रम में आए और उन्हें देखा, तो तुरंत पैर छूने के लिए झुके। मैंने उन्हें ऐसा करने से रोका, लेकिन उन्होंने कहा, ‘आपके और घरवालों के दिए संस्कार कैसे भूल सकता हूं।’ यह पल मेरे लिए बेहद भावुक करने वाला था। वे कहते हैं, ‘सेना के सर्वोच्च पद पर रहते हुए प्रोटोकॉल के बावजूद उन्होंने मुझे इतना सम्मान दिया। एक शिक्षक के लिए इससे बड़ा पुरस्कार और कुछ नहीं हो सकता।’ इसी तरह, एडमिरल दिनेश त्रिपाठी भी है जो माता-पिता और गुरुओं को सम्मान देने में पीछे नहीं रहते। मदद के लिए रहते हैं तत्पर
गुरु-शिष्य का यह रिश्ता केवल औपचारिक नहीं है, बल्कि एक गहरा पारिवारिक रिश्ता है। राधाकांत शुक्ला बताते हैं कि उनके कई अन्य छात्र सेना, चिकित्सा, शिक्षा समेत कई क्षेत्रों पर पदस्थ हैं। जब भी किसी भी प्रकार की मदद की आवश्यकता होती है तो, उसके लिए तत्पर रहते हैं। अभी 11 जुलाई को एक बार फिर दिल्ली जा रहा हूं। वहां जाकर कई शिष्यों से मुलाकात भी होगी। मुझे अपने शिष्यों से खूब सम्मान मिलता है। ऑपरेशन सिंदूर में कमाल का काम किया
ऑपरेशन सिंदूर पर राधाकांत शुक्ला ने कहा, दोनों ने कमाल का काम किया है। हमारी सेनाओं की वजह से देश सुरक्षित महसूस कर रहा है। हम वसुधैव कुटुंबकम् के रास्ते पर चलते हैं, लेकिन जब बात स्वाभिमान की हो और दुश्मन ललकारने लगे, तो उसे सबक सिखाना जरूरी होता है। ऐसे दुश्मनों को नेस्तनाबूत कर मिट्टी में मिला देना चाहिए। गीता में कृष्ण ने यही उपदेश दिया है। पिता और पांच भाई-बहन सभी शिक्षक
राधाकांत शुक्ला का पूरा परिवार शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा रहा है। उनके पिता, सभी पांच भाई और बहन भी शिक्षक रहे हैं। वे मूल रूप से प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के मांडा गांव के निवासी हैं। प्राथमिक शिक्षा गांव से और उच्च शिक्षा प्रयागराज विश्वविद्यालय से हासिल करने के बाद वे रीवा सैनिक स्कूल में शिक्षक बने। साल 2008 में वे रिटायर हुए। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित
2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने राधाकांत शुक्ला को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया था। उनके घर की आलमारियों में मेडल और कई पुरस्कार रखे हुए हैं। राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार लेने वाली तस्वीर की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, राष्ट्रपति कलाम से सम्मान पाना मेरे लिए सबसे यादगार पल रहा है। अब दूसरा मौका है जब दोनों शिष्य दो सेनाओं के प्रमुख बने हैं। गुरु और पिता हारकर भी सम्मानित महसूस करते हैं
शुक्ला कहते हैं कि संसार में दो ही लोग हैं जो हारकर भी अपने को सम्मानित महसूस करते हैं। एक पिता है, जिसकी यही कामना रहती है कि उसका बेटा उससे भी आगे बढ़े। वह बेटे को हमेशा जीतते देखना चाहता है और दूसरा शिक्षक जो अपने शिष्य को हमेशा बड़े पदों पर, आगे बढ़ते हुए देखना चाहता है।