राजस्थान में इस साल अच्छी बारिश होगी। अकाल की आशंका न के बराबर है। बाड़मेर में करीब 41 साल पुरानी परंपरा के अनुसार बुधवार को मौसम का पूर्वानुमान देसी तरीके से जाना गया। इसके तहत पानी में सफेद और काली रंग की रूई डाली गई। सफेद रंग की रूई डूब गई। इसको अच्छी बारिश का संकेत माना गया। दूसरी तरफ, बाड़मेर में पैदा होने वाले प्रमुख अनाज-तरबूज के बीज के भाव भी तय करने का खास तरीका है। कम मात्रा में अलग-अलग अनाज के ढेर बनाए जाते हैं। इसके ऊपर गुड़ के टुकड़े रख दिए जाते हैं। हर ढेर पर रेट लिखकर लगा दिया जाता है। जिस ढेर पर मक्खी बैठ जाती है, वही रेट तय माना जाता है। अनाज व्यापार संघ के अध्यक्ष हंसराज कोटड़िया का दावा है कि 75 प्रतिशत मौसम का अनुमान सटीक बैठता है। उन्होंने बताया- हर साल की भांति इस साल भी अनाज मंडी में बारिश व अनाज के भावों के शगुन देखे गए। पहले 3 तस्वीरों में तरीका समझिए कैसे लगाते हैं अनुमान, जानिए 1. मिट्टी का कुल्हड़ : एक परात में मिट्टी के 5 कुल्हड़ में बराबर पानी भरा जाता है। इन पांचों के नाम रखे जाते हैं। इनके नाम क्रमश: जेठ, आषाढ़, सावन, भादो, थम होता है। बुधवार को जेठ-आषाढ़ नाम के दोनों कुल्हड़ एक साथ फूट गए। इसका मतलब है कि दोनों माह में अच्छी बारिश होगी। उसके बाद थम का कुल्हड़ फूटा। ऐसा अनुमान लगाया कि हर माह बारिश होगी, चाहे हल्की हो या तेज। 2. काली और सफेद रूई : एक बर्तन के अंदर पानी भरा गया। उसमें सफेद और काली रंग की रूई डाली जाती है। बुधवार को निभाई गई परंपरा में सफेद रंग की रूई डूब गई। यह अच्छी बारिश का संकेत माना जाता है। अगर काली रंग की रूई डूब जाती तो अकाल आने की आशंका होती। 3. अनाज-फल के भाव पता किए : व्यापारियों ने तीसरे तरीके में अनाज-फल के भाव पता किए। बाड़मेर में मूंग, मोठ, ग्वार, तरबूज, बाजरा जैसे पांच प्रकार के अनाज-फल का उत्पादन प्रमुख रूप से होता है। इनके अलग-अलग ढेर बनाकर इसमें गुड़ रखा गया। इसके बाद व्यापारियों ने अपने हिसाब से पेपर पर भाव लिखे। जिस भाव के ढेर पर मक्खी बैठ जाती है, वही भाव तय कर दिए जाते हैं। बुधवार को भी ऐसा ही किया गया। इस बार मूंग के भाव 80, मोठ के 55 रुपए, तिल के 85, ग्वार के 50, तरबूज के बीज के 250 और बाजरी के भाव 27 रुपए प्रति किलो तय हुए हैं। अनुमान सटीक बैठने लगे तो शुरू हुई परंपरा
मंडी व्यापारी गौतम चमन का कहना है कि पहले बारिश का पूर्वानुमान लगाने के कोई यंत्र नहीं थे। तब बुजुर्ग इसी तरीके के जरिए पूर्वानुमान लगाते थे और शगुन देखते थे। जब कुल्हड़ के जरिए अनुमान सटीक बैठने लगे तो हर साल अक्षय तृतीया पर शगुन देखने की परंपरा शुरू हुई। बुजुर्ग लोग शगुन पर भरोसा ज्यादा करते थे। उसके अनुसार वो आगे की प्लानिंग करते थे।
राजस्थान में इस साल अच्छी बारिश होगी। अकाल की आशंका न के बराबर है। बाड़मेर में करीब 41 साल पुरानी परंपरा के अनुसार बुधवार को मौसम का पूर्वानुमान देसी तरीके से जाना गया। इसके तहत पानी में सफेद और काली रंग की रूई डाली गई। सफेद रंग की रूई डूब गई। इसको अच्छी बारिश का संकेत माना गया। दूसरी तरफ, बाड़मेर में पैदा होने वाले प्रमुख अनाज-तरबूज के बीज के भाव भी तय करने का खास तरीका है। कम मात्रा में अलग-अलग अनाज के ढेर बनाए जाते हैं। इसके ऊपर गुड़ के टुकड़े रख दिए जाते हैं। हर ढेर पर रेट लिखकर लगा दिया जाता है। जिस ढेर पर मक्खी बैठ जाती है, वही रेट तय माना जाता है। अनाज व्यापार संघ के अध्यक्ष हंसराज कोटड़िया का दावा है कि 75 प्रतिशत मौसम का अनुमान सटीक बैठता है। उन्होंने बताया- हर साल की भांति इस साल भी अनाज मंडी में बारिश व अनाज के भावों के शगुन देखे गए। पहले 3 तस्वीरों में तरीका समझिए कैसे लगाते हैं अनुमान, जानिए 1. मिट्टी का कुल्हड़ : एक परात में मिट्टी के 5 कुल्हड़ में बराबर पानी भरा जाता है। इन पांचों के नाम रखे जाते हैं। इनके नाम क्रमश: जेठ, आषाढ़, सावन, भादो, थम होता है। बुधवार को जेठ-आषाढ़ नाम के दोनों कुल्हड़ एक साथ फूट गए। इसका मतलब है कि दोनों माह में अच्छी बारिश होगी। उसके बाद थम का कुल्हड़ फूटा। ऐसा अनुमान लगाया कि हर माह बारिश होगी, चाहे हल्की हो या तेज। 2. काली और सफेद रूई : एक बर्तन के अंदर पानी भरा गया। उसमें सफेद और काली रंग की रूई डाली जाती है। बुधवार को निभाई गई परंपरा में सफेद रंग की रूई डूब गई। यह अच्छी बारिश का संकेत माना जाता है। अगर काली रंग की रूई डूब जाती तो अकाल आने की आशंका होती। 3. अनाज-फल के भाव पता किए : व्यापारियों ने तीसरे तरीके में अनाज-फल के भाव पता किए। बाड़मेर में मूंग, मोठ, ग्वार, तरबूज, बाजरा जैसे पांच प्रकार के अनाज-फल का उत्पादन प्रमुख रूप से होता है। इनके अलग-अलग ढेर बनाकर इसमें गुड़ रखा गया। इसके बाद व्यापारियों ने अपने हिसाब से पेपर पर भाव लिखे। जिस भाव के ढेर पर मक्खी बैठ जाती है, वही भाव तय कर दिए जाते हैं। बुधवार को भी ऐसा ही किया गया। इस बार मूंग के भाव 80, मोठ के 55 रुपए, तिल के 85, ग्वार के 50, तरबूज के बीज के 250 और बाजरी के भाव 27 रुपए प्रति किलो तय हुए हैं। अनुमान सटीक बैठने लगे तो शुरू हुई परंपरा
मंडी व्यापारी गौतम चमन का कहना है कि पहले बारिश का पूर्वानुमान लगाने के कोई यंत्र नहीं थे। तब बुजुर्ग इसी तरीके के जरिए पूर्वानुमान लगाते थे और शगुन देखते थे। जब कुल्हड़ के जरिए अनुमान सटीक बैठने लगे तो हर साल अक्षय तृतीया पर शगुन देखने की परंपरा शुरू हुई। बुजुर्ग लोग शगुन पर भरोसा ज्यादा करते थे। उसके अनुसार वो आगे की प्लानिंग करते थे।