सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के खिलाफ विवादित बयान देने के बाद भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने रविवार को पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी पर निशाना साधा। भाजपा सांसद ने कहा, ‘वे चुनाव आयुक्त नहीं बल्कि मुस्लिम आयुक्त थे।’ निशिकांत का यह बयान कुरैशी के वक्फ कानून की आलोचना करने वाली एक पोस्ट के जवाब में आया। कुरैशी ने 17 अप्रैल को X पर एक पोस्ट में लिखा था, ‘वक्फ संशोधन मुसलमानों की जमीन हड़पने की सरकार की भयानक और शैतानी चाल है।’ इससे पहले, 19 अप्रैल को भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जा रहा है। अगर हर किसी को सारे मामलों के लिए सर्वोच्च अदालत जाना पड़े तो संसद और विधानसभा बंद कर देनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था, ‘संसद इस देश के कानून बनाती है। क्या आप उस संसद को निर्देश देंगे। देश में गृह युद्ध के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया संजीव खन्ना जिम्मेदार हैं। वहीं धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है।’ निशिकांत ने कुरैशी पर लगाए आरोप निशिकांत ने कुरैशी पर आरोप लगाते हुए कहा, ‘आपके कार्यकाल में झारखंड के संथाल परगना में सबसे ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठियों को मतदाता बनाया गया। उनके गांव विक्रमशिला को 1189 में बख्तियार खिलजी ने जला दिया था और विक्रमशिला विश्वविद्यालय ने दुनिया को आतिश दीपांकर के रूप में पहला कुलपति दिया।’ कुरैशी पूर्व 30 जुलाई 2010 से 10 जून 2012 तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे। निशिकांत 4 बार से झारखंड के गोड्डा से लोकसभा सांसद हैं। दुबे के बयानों से भाजपा ने किनारा किया सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के खिलाफ निशिकांत दुबे के बयान से भाजपा ने किनारा कर लिया। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने X पोस्ट में लिखा- भाजपा ऐसे बयानों से न तो कोई इत्तफाक रखती है और न ही कभी ऐसे बयानों का समर्थन करती है। भाजपा इन बयान को सिरे से खारिज करती है। पार्टी ने सदैव ही न्यायपालिका का सम्मान किया है, उनके आदेशों और सुझावों को सहर्ष स्वीकार किया है, क्योंकि एक पार्टी के नाते हमारा मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय समेत देश की सभी अदालतें हमारे लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं। संविधान के संरक्षण का मजबूत आधारस्तंभ हैं। मैंने इन दोनों को और सभी को ऐसे बयान ना देने के लिए निर्देशित किया है। अटॉर्नी जनरल से अवमानना की कार्यवाही की मांग वक्फ कानून के केस में पैरवी कर रहे एडवोकेट अनस तनवीर ने रविवार को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को चिट्ठी लिखकर निशिकांत दुबे के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की सहमति मांगी है। अनस ने लेटर में लिखा है कि दुबे ने सर्वोच्च अदालत की गरिमा को कम करने के मकसद से टिप्पणी की थी। दुबे की यह टिप्पणी बेहद अपमानजनक और खतरनाक रूप से भड़काऊ है। विवाद पर अब तक क्या हुआ… 8 अप्रैल: विवाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शुरू हुआ सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के केस में गवर्नर के अधिकार की सीमा तय कर दी थी। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा था, ‘राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है।’ सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के 10 जरूरी बिलों को राज्यपाल की ओर से रोके जाने को अवैध भी बताया था। इसी फैसले के दौरान अदालत ने राज्यपालों की ओर से राष्ट्रपति को भेजे गए बिल पर भी स्थिति स्पष्ट की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल की तरफ से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। यह ऑर्डर 11 अप्रैल को सार्वजनिक किया गया। पूरी खबर पढ़ें… 17 अप्रैल: धनखड़ बोले- अदालतें राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ 17 अप्रैल को राज्यसभा इंटर्न के एक ग्रुप को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस सलाह पर आपत्ति जताई, जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपालों को बिलों को मंजूरी देने की समय सीमा तय की थी। धनखड़ ने कहा था- “अदालतें राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट को मिला विशेष अधिकार लोकतांत्रिक शक्तियों के खिलाफ 24×7 उपलब्ध न्यूक्लियर मिसाइल बन गया है। जज सुपर पार्लियामेंट की तरह काम कर रहे हैं।” पूरी खबर पढ़ें… 18 अप्रैल: सिब्बल बोले- भारत में राष्ट्रपति नाममात्र का मुखिया राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कि जब कार्यपालिका काम नहीं करेगी तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा। भारत में राष्ट्रपति नाममात्र का मुखिया है। राष्ट्रपति-राज्यपाल को सरकारों की सलाह पर काम करना होता है। मैं उपराष्ट्रपति की बात सुनकर हैरान हूं, दुखी भी हूं। उन्हें किसी पार्टी की तरफदारी करने वाली बात नहीं करनी चाहिए।’ सिब्बल ने 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा- ‘लोगों को याद होगा जब इंदिरा गांधी के चुनाव को लेकर फैसला आया था, तब केवल एक जज, जस्टिस कृष्ण अय्यर ने फैसला सुनाया था। उस वक्त इंदिरा को सांसदी गंवानी पड़ी थी। तब धनखड़ जी को यह मंजूर था। लेकिन अब सरकार के खिलाफ दो जजों की बेंच के फैसले पर सवाल उठाए जा रहे हैं।’ पूरी खबर पढ़ें…
सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के खिलाफ विवादित बयान देने के बाद भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने रविवार को पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी पर निशाना साधा। भाजपा सांसद ने कहा, ‘वे चुनाव आयुक्त नहीं बल्कि मुस्लिम आयुक्त थे।’ निशिकांत का यह बयान कुरैशी के वक्फ कानून की आलोचना करने वाली एक पोस्ट के जवाब में आया। कुरैशी ने 17 अप्रैल को X पर एक पोस्ट में लिखा था, ‘वक्फ संशोधन मुसलमानों की जमीन हड़पने की सरकार की भयानक और शैतानी चाल है।’ इससे पहले, 19 अप्रैल को भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं से बाहर जा रहा है। अगर हर किसी को सारे मामलों के लिए सर्वोच्च अदालत जाना पड़े तो संसद और विधानसभा बंद कर देनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था, ‘संसद इस देश के कानून बनाती है। क्या आप उस संसद को निर्देश देंगे। देश में गृह युद्ध के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया संजीव खन्ना जिम्मेदार हैं। वहीं धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए सुप्रीम कोर्ट जिम्मेदार है।’ निशिकांत ने कुरैशी पर लगाए आरोप निशिकांत ने कुरैशी पर आरोप लगाते हुए कहा, ‘आपके कार्यकाल में झारखंड के संथाल परगना में सबसे ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठियों को मतदाता बनाया गया। उनके गांव विक्रमशिला को 1189 में बख्तियार खिलजी ने जला दिया था और विक्रमशिला विश्वविद्यालय ने दुनिया को आतिश दीपांकर के रूप में पहला कुलपति दिया।’ कुरैशी पूर्व 30 जुलाई 2010 से 10 जून 2012 तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त रहे। निशिकांत 4 बार से झारखंड के गोड्डा से लोकसभा सांसद हैं। दुबे के बयानों से भाजपा ने किनारा किया सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के खिलाफ निशिकांत दुबे के बयान से भाजपा ने किनारा कर लिया। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने X पोस्ट में लिखा- भाजपा ऐसे बयानों से न तो कोई इत्तफाक रखती है और न ही कभी ऐसे बयानों का समर्थन करती है। भाजपा इन बयान को सिरे से खारिज करती है। पार्टी ने सदैव ही न्यायपालिका का सम्मान किया है, उनके आदेशों और सुझावों को सहर्ष स्वीकार किया है, क्योंकि एक पार्टी के नाते हमारा मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय समेत देश की सभी अदालतें हमारे लोकतंत्र का अभिन्न अंग हैं। संविधान के संरक्षण का मजबूत आधारस्तंभ हैं। मैंने इन दोनों को और सभी को ऐसे बयान ना देने के लिए निर्देशित किया है। अटॉर्नी जनरल से अवमानना की कार्यवाही की मांग वक्फ कानून के केस में पैरवी कर रहे एडवोकेट अनस तनवीर ने रविवार को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को चिट्ठी लिखकर निशिकांत दुबे के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की सहमति मांगी है। अनस ने लेटर में लिखा है कि दुबे ने सर्वोच्च अदालत की गरिमा को कम करने के मकसद से टिप्पणी की थी। दुबे की यह टिप्पणी बेहद अपमानजनक और खतरनाक रूप से भड़काऊ है। विवाद पर अब तक क्या हुआ… 8 अप्रैल: विवाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शुरू हुआ सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को तमिलनाडु गवर्नर और राज्य सरकार के केस में गवर्नर के अधिकार की सीमा तय कर दी थी। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा था, ‘राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं है।’ सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के 10 जरूरी बिलों को राज्यपाल की ओर से रोके जाने को अवैध भी बताया था। इसी फैसले के दौरान अदालत ने राज्यपालों की ओर से राष्ट्रपति को भेजे गए बिल पर भी स्थिति स्पष्ट की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यपाल की तरफ से भेजे गए बिल पर राष्ट्रपति को 3 महीने के भीतर फैसला लेना होगा। यह ऑर्डर 11 अप्रैल को सार्वजनिक किया गया। पूरी खबर पढ़ें… 17 अप्रैल: धनखड़ बोले- अदालतें राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ 17 अप्रैल को राज्यसभा इंटर्न के एक ग्रुप को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस सलाह पर आपत्ति जताई, जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपालों को बिलों को मंजूरी देने की समय सीमा तय की थी। धनखड़ ने कहा था- “अदालतें राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट को मिला विशेष अधिकार लोकतांत्रिक शक्तियों के खिलाफ 24×7 उपलब्ध न्यूक्लियर मिसाइल बन गया है। जज सुपर पार्लियामेंट की तरह काम कर रहे हैं।” पूरी खबर पढ़ें… 18 अप्रैल: सिब्बल बोले- भारत में राष्ट्रपति नाममात्र का मुखिया राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने कि जब कार्यपालिका काम नहीं करेगी तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा। भारत में राष्ट्रपति नाममात्र का मुखिया है। राष्ट्रपति-राज्यपाल को सरकारों की सलाह पर काम करना होता है। मैं उपराष्ट्रपति की बात सुनकर हैरान हूं, दुखी भी हूं। उन्हें किसी पार्टी की तरफदारी करने वाली बात नहीं करनी चाहिए।’ सिब्बल ने 24 जून 1975 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का जिक्र करते हुए कहा- ‘लोगों को याद होगा जब इंदिरा गांधी के चुनाव को लेकर फैसला आया था, तब केवल एक जज, जस्टिस कृष्ण अय्यर ने फैसला सुनाया था। उस वक्त इंदिरा को सांसदी गंवानी पड़ी थी। तब धनखड़ जी को यह मंजूर था। लेकिन अब सरकार के खिलाफ दो जजों की बेंच के फैसले पर सवाल उठाए जा रहे हैं।’ पूरी खबर पढ़ें…