सुप्रीम कोर्ट ने 20 दिन में दूसरी बार इलाहाबाद हाईकोर्ट को हिदायत दी कि उसे किसी भी केस में विवादित टिप्पणी करने से बचना चाहिए। हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल को रेप के आरोपी को जमानत देते वक्त कहा था, ‘पीड़ित लड़की ने खुद मुसीबत बुलाई, रेप के लिए वही जिम्मेदार है।’ दरअसल, सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट की 19 मार्च को की गई एक और टिप्पणी ”स्तन दबाना और पायजामे की डोरी तोड़ना रेप की कोशिश नहीं मानी जा सकती’ पर सुनवाई कर रहा था। इसी दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की 10 अप्रैल की टिप्पणी का जिक्र किया। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट जज को जमानत के बारे में फैसला केस से जुड़े फैक्ट्स के आधार पर करना चाहिए। पीड़ित लड़की के खिलाफ गैरजरूरी टिप्पणी से बचना चाहिए। जस्टिस गवई ने कहा- केस में जमानत दी जा सकती है, लेकिन यह क्या बात हुई कि पीड़ित ने खुद ही मुसीबत बुलाई। जज को ऐसी टिप्पणी करते वक्त सतर्क रहना चाहिए। इस पर SG तुषार मेहता ने कहा कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखाई भी देना चाहिए। इस तरह के आदेश को आम आदमी किस नजरिए से देखेगा, यह भी सोचना चाहिए। अब इन दोनों मामलों को विस्तार से पढ़िए… 1. पहला मामला; जिस पर 10 अप्रैल को हाईकोर्ट ने टिप्पणी की गौतमबुद्धनगर की एक यूनिवर्सिटी में MA की छात्रा ने 1 सितंबर 2024 को थाना सेक्टर 126 में रेप का केस दर्ज कराया था। छात्रा ने अपनी शिकायत में लिखा था कि वह नोएडा के सेक्टर 126 स्थित एक पीजी हॉस्टल (पेइंग गेस्ट) में रहकर पढ़ाई करती है। 21 सितंबर 2024 को वह अपनी दोस्तों के साथ दिल्ली घूमने गई थी। हौज खास में सभी ने पार्टी की, जहां उसकी तीन दोस्तों के साथ तीन लड़के भी आए थे। छात्रा ने बताया कि बार में निश्चल चांडक भी आया था। सबने शराब पी। पीड़ित छात्रा को काफी नशा हो गया था। रात के 3 बजे थे। निश्चल ने उसे अपने साथ चलने को कहा। उसके बार-बार कहने पर छात्रा साथ चलने के लिए तैयार हो गई। पीड़ित छात्रा ने आरोप लगाया कि आरोपी निश्चल रास्ते भर उसे गलत तरीके से छूता रहा। छात्रा ने नोएडा के एक घर में चलने को कहा था, लेकिन लड़का हरियाणा के गुरुग्राम स्थित अपने किसी रिश्तेदार के फ्लैट पर ले गया, जहां उसके साथ दो बार रेप किया। पुलिस ने केस दर्ज करने के बाद आरोपी निश्चल चांडक को 11 दिसंबर 2024 को गिरफ्तार किया था। 2. दूसरा मामला; जिस पर 19 मार्च को हाईकोर्ट ने टिप्पणी की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 मार्च को रेप से जुड़े एक मामले में कहा था, ‘स्तन दबाना और पायजामे की डोरी तोड़ना रेप की कोशिश नहीं मानी जा सकती।’ यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने की थी। जस्टिस मिश्रा ने 3 आरोपियों के खिलाफ दायर क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली थी। इस मामले का 26 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने स्वत:संज्ञान लिया था। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने सुनवाई की। बेंच ने कहा, “हाईकोर्ट के ऑर्डर में की गई कुछ टिप्पणियां पूरी तरह असंवेदनशील और अमानवीय नजरिया दिखाती हैं।” सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा- यह बहुत गंभीर मामला है और जिस जज ने यह फैसला दिया, उसकी तरफ से बहुत असंवेदनशीलता दिखाई गई। हमें यह कहते हुए बहुत दुख है कि फैसला लिखने वाले में संवेदनशीलता की पूरी तरह कमी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह मानवता और कानून दोनों के खिलाफ है। इस तरह की टिप्पणियां ‘संवेदनहीनता’ को दर्शाती हैं और कानून के मापदंडों से परे हैं। पढ़ें पूरी खबर…
सुप्रीम कोर्ट ने 20 दिन में दूसरी बार इलाहाबाद हाईकोर्ट को हिदायत दी कि उसे किसी भी केस में विवादित टिप्पणी करने से बचना चाहिए। हाईकोर्ट ने 10 अप्रैल को रेप के आरोपी को जमानत देते वक्त कहा था, ‘पीड़ित लड़की ने खुद मुसीबत बुलाई, रेप के लिए वही जिम्मेदार है।’ दरअसल, सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट की 19 मार्च को की गई एक और टिप्पणी ”स्तन दबाना और पायजामे की डोरी तोड़ना रेप की कोशिश नहीं मानी जा सकती’ पर सुनवाई कर रहा था। इसी दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की 10 अप्रैल की टिप्पणी का जिक्र किया। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट जज को जमानत के बारे में फैसला केस से जुड़े फैक्ट्स के आधार पर करना चाहिए। पीड़ित लड़की के खिलाफ गैरजरूरी टिप्पणी से बचना चाहिए। जस्टिस गवई ने कहा- केस में जमानत दी जा सकती है, लेकिन यह क्या बात हुई कि पीड़ित ने खुद ही मुसीबत बुलाई। जज को ऐसी टिप्पणी करते वक्त सतर्क रहना चाहिए। इस पर SG तुषार मेहता ने कहा कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखाई भी देना चाहिए। इस तरह के आदेश को आम आदमी किस नजरिए से देखेगा, यह भी सोचना चाहिए। अब इन दोनों मामलों को विस्तार से पढ़िए… 1. पहला मामला; जिस पर 10 अप्रैल को हाईकोर्ट ने टिप्पणी की गौतमबुद्धनगर की एक यूनिवर्सिटी में MA की छात्रा ने 1 सितंबर 2024 को थाना सेक्टर 126 में रेप का केस दर्ज कराया था। छात्रा ने अपनी शिकायत में लिखा था कि वह नोएडा के सेक्टर 126 स्थित एक पीजी हॉस्टल (पेइंग गेस्ट) में रहकर पढ़ाई करती है। 21 सितंबर 2024 को वह अपनी दोस्तों के साथ दिल्ली घूमने गई थी। हौज खास में सभी ने पार्टी की, जहां उसकी तीन दोस्तों के साथ तीन लड़के भी आए थे। छात्रा ने बताया कि बार में निश्चल चांडक भी आया था। सबने शराब पी। पीड़ित छात्रा को काफी नशा हो गया था। रात के 3 बजे थे। निश्चल ने उसे अपने साथ चलने को कहा। उसके बार-बार कहने पर छात्रा साथ चलने के लिए तैयार हो गई। पीड़ित छात्रा ने आरोप लगाया कि आरोपी निश्चल रास्ते भर उसे गलत तरीके से छूता रहा। छात्रा ने नोएडा के एक घर में चलने को कहा था, लेकिन लड़का हरियाणा के गुरुग्राम स्थित अपने किसी रिश्तेदार के फ्लैट पर ले गया, जहां उसके साथ दो बार रेप किया। पुलिस ने केस दर्ज करने के बाद आरोपी निश्चल चांडक को 11 दिसंबर 2024 को गिरफ्तार किया था। 2. दूसरा मामला; जिस पर 19 मार्च को हाईकोर्ट ने टिप्पणी की इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 मार्च को रेप से जुड़े एक मामले में कहा था, ‘स्तन दबाना और पायजामे की डोरी तोड़ना रेप की कोशिश नहीं मानी जा सकती।’ यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने की थी। जस्टिस मिश्रा ने 3 आरोपियों के खिलाफ दायर क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली थी। इस मामले का 26 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने स्वत:संज्ञान लिया था। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने सुनवाई की। बेंच ने कहा, “हाईकोर्ट के ऑर्डर में की गई कुछ टिप्पणियां पूरी तरह असंवेदनशील और अमानवीय नजरिया दिखाती हैं।” सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा- यह बहुत गंभीर मामला है और जिस जज ने यह फैसला दिया, उसकी तरफ से बहुत असंवेदनशीलता दिखाई गई। हमें यह कहते हुए बहुत दुख है कि फैसला लिखने वाले में संवेदनशीलता की पूरी तरह कमी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह मानवता और कानून दोनों के खिलाफ है। इस तरह की टिप्पणियां ‘संवेदनहीनता’ को दर्शाती हैं और कानून के मापदंडों से परे हैं। पढ़ें पूरी खबर…