अपनी छवि और राजनीति को करीने से साधने वाले नीतीश कुमार ने चुनावी साल में बोल्ड डिसीजन लिया है, जो चर्चा का विषय बन गया है। अब तक जानकारों का मानना था कि चुनावों के मद्देनजर JDU मुस्लिम वोटर्स को नाराज नहीं कर सकती, इसलिए वह ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ती, जहां उसे मुस्लिम वोटर्स को साधने की जरूरत महसूस होती है। बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव हैं। 2023 की जातीय गणना के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 17.7% मुस्लिम हैं। जिनका राज्य के करीब 47 सीटों पर प्रभाव है। ऐसे में नीतीश कुमार ने वक्फ बिल पर मोदी का साथ दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पार्टी अध्यक्ष ने अपने सांसदों को स्पष्ट संदेश दिया कि आप मुस्लिम वोटों की चिंता ना करें। सबसे पहले जानिए, भाजपा ने नीतीश को कैसे भरोसे में लिया अब 3 पॉइंट में जानिए, आखिर ऐसा क्या हुआ कि नीतीश कुमार का मुस्लिमों से मोह भंग हो गया? 1. मुस्लिमों के लिए काम किया, लेकिन उन्होंने साथ नहीं दिया 2013 में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के विरोध में 17 साल पुराना NDA का गठबंधन तोड़ दिया। 2014 लोकसभा चुनाव उन्होंने अपने दम पर लड़ा। उन्हें उम्मीद थी कि अपने कोर वोट बैंक के अलावा मुस्लिमों का भी साथ मिलेगा, लेकिन ये उनका भ्रम साबित हुआ। उन्होंने 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन मात्र 2 सीट ही जीत सके। इनमें एक नालंदा और एक पूर्णिया की सीट थी। बाकी 36 सीटों पर उनकी हार हो गई। JDU सूत्रों की मानें तो उसी साल से नीतीश कुमार का दिल टूट गया था। नीतीश कुमार ने वक्फ संशोधन बिल पर खुलकर सरकार को समर्थन करने की अपनी सहमति दे दी थी। उनका मानना था कि हम उनके लिए काम करते हैं, लेकिन वे हमारा सपोर्ट नहीं करते हैं। जदयू के एक नेता ने दैनिक भास्कर को बताया कि पॉलिटिक्स करने के लिए कपड़ा जरूरी है न। ऐसे में जो पार्टी हमें पद और कद दोनों दे रही है, हम उनके एजेंडे का विरोध क्यों करें। इसलिए हमारे नेतृत्व ने इस बिल पर सपोर्ट देने का निर्णय लिया। 2. JDU मान चुकी है उसे मुस्लिम वोट नहीं मिलने वाला JDU के एक बड़े नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि नीतीश कुमार ने 2005 से लेकर अब तक बहुत प्रयास किया कि उन्हें मुस्लिम वोट मिले। 2010 तक थोड़ा बहुत सपोर्ट मिला भी। इसके बाद मुस्लिम इनसे दूर होते चले गए। ऐसे में अब JDU की टॉप लीडरशिप ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि बिहार में मुस्लिम वोट एकतरफा है। ये कुछ भी कर लें, बीजेपी से अलग हो जाएं, आरजेडी के साथ आ जाएं। इन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिलने वाला है। ऐसे में इन्होंने बीजेपी को साथ देने का निर्णय लिया। CSDS-लोकनीति के पोस्ट-पोल सर्वे 2020 के मुताबिक, RJD और कांग्रेस के महागठबंधन को 75% मुस्लिम वोट मिले थे। वहीं, BJP और JDU वाले NDA को 5% और चिराग पासवान की पार्टी LJP (रामविलास) को 2% मुस्लिम वोट मिले। 3. कमजोर नीतीश को 2025 के लिए बीजेपी का साथ जरूरी 2020 विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी तीसरे नंबर की बन गई थी। 2005 विधानसभा चुनाव के बाद ऐसा पहली बार हो रहा था जब नीतीश कुमार को बीजेपी से भी कम सीटें हासिल हुई थीं। इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार चिराग पासवान को माना गया। 2020 के चुनाव के बाद नीतीश कुमार भले सीएम बने रहे, लेकिन उन्हें दो बार पाला बदलना पड़ा। पहले बीजेपी का साथ छोड़कर वे राजद के साथ गए। इसके बाद दोबारा वे बीजेपी के साथ आए। बिहार में अगले 6 महीने में विधानसभा का चुनाव होना है। नीतीश कुमार की सेहत पर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं। जदयू को बिहार में अपनी स्थिति को मजबूत रखने के लिए एक पुराने और भरोसेमंद साथी की जरूरत है। ऐसे में बीजेपी से ज्यादा भरोसेमंद उनके लिए कोई और पार्टी नहीं हो सकती है। ग्राफिक्स के जरिए जानिए, भाजपा का साथ छोड़ने और आने पर नीतीश की पार्टी का क्या हुआ 2015 के बाद से मुस्लिमों का नीतीश कुमार से मोहभंग बात 2024 लोकसभा चुनाव की है। नीतीश कुमार NDA की एक मीटिंग में शामिल थे। यहां सीएम को कहना पड़ा, ‘मुसलमानों को जाकर बताइए, उनके लिए सरकार ने क्या-क्या काम किया है। RJD आ गई तो दंगा फसाद करेगी।’ इस बयान का संदेश साफ था। नीतीश कुमार भी ये मान चुके थे कि इस समाज का अब उनसे मोह भंग हो चुका है। 2024 के लोकसभा और 2020 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में नीतीश कुमार की पार्टी के एक भी मुस्लिम कैंडिडेट जीतने में सफल नहीं हो पाए थे। 2015 विधानसभा चुनाव में आखिरी बार JDU से 5 मुस्लिम विधायक जीते थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में JDU के एक भी मुस्लिम सांसद नहीं जीत पाए थे। 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू ने 11 मुस्लिम कैंडिडेट को मैदान में उतारा, लेकिन एक भी कैंडिडेट जीतने में सफल नहीं रहे। यही हाल 2024 के लोकसभा चुनाव में भी हुआ, जदयू के एक भी कैंडिडेट चुनाव नहीं जीत पाए। अब जानिए, नीतीश ने मुस्लिमों के लिए क्या किया JDU का दावा है कि 2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने मुस्लिमों की कई पुरानी डिमांड को एक-एक करके पूरा किया। पटना में हज भवन का निर्माण, अंजुमन इस्लामिया की मॉडर्न बिल्डिंग का निर्माण, मदरसा के शिक्षकों की सैलरी सरकारी स्कूल के शिक्षकों के बराबर करना, उर्दू शिक्षकों की बहाली, कब्रिस्तान की घेराबंदी या हर विधानसभा क्षेत्र में आवासीय स्कूल और छात्रावास का निर्माण, हायर एजुकेशन के लिए मुस्लिम छात्रों को स्कालरशिप जैसी कई योजनाएं 2005 से लेकर अब तक शुरू की गई हैं। दो बार BJP से अलग स्टैंड ले चुके हैं नीतीश 1. CAA को समर्थन लेकिन NRC का विरोध नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को समर्थन देने के बाद नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का विरोध किया था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार में एनआरसी (NRC) लागू नहीं होगा और वे एनपीआर (NPR) पर भी विरोध दर्ज करा चुके हैं। NPR पर नीतीश यह स्पष्ट कर चुके हैं कि 2010 की तर्ज पर ही राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर तैयार होना चाहिए। हालांकि नीतीश कुमार ने पहले सीएए (CAA) यानी नागरिकता संशोधन कानून का विरोध किया था, लेकिन बाद में लोकसभा में जेडीयू ने इस बिल का समर्थन दिया था। 2. धारा 370 हटाए जाने का भी जेडीयू ने किया था विरोध धारा 370 हटाए जाने को लेकर भी जेडीयू के अंदर इसी प्रकार का विरोधाभास देखने को मिला था। 5 अगस्त 2019 को धारा 370 हटाए जाने को लेकर वोटिंग के दौरान जनता दल यूनाइटेड के सभी सांसदों ने दोनों सदनों से वॉकआउट कर एक प्रकार से नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए इस बिल का विरोध ही किया था।
अपनी छवि और राजनीति को करीने से साधने वाले नीतीश कुमार ने चुनावी साल में बोल्ड डिसीजन लिया है, जो चर्चा का विषय बन गया है। अब तक जानकारों का मानना था कि चुनावों के मद्देनजर JDU मुस्लिम वोटर्स को नाराज नहीं कर सकती, इसलिए वह ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ती, जहां उसे मुस्लिम वोटर्स को साधने की जरूरत महसूस होती है। बिहार में इसी साल विधानसभा चुनाव हैं। 2023 की जातीय गणना के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में 17.7% मुस्लिम हैं। जिनका राज्य के करीब 47 सीटों पर प्रभाव है। ऐसे में नीतीश कुमार ने वक्फ बिल पर मोदी का साथ दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पार्टी अध्यक्ष ने अपने सांसदों को स्पष्ट संदेश दिया कि आप मुस्लिम वोटों की चिंता ना करें। सबसे पहले जानिए, भाजपा ने नीतीश को कैसे भरोसे में लिया अब 3 पॉइंट में जानिए, आखिर ऐसा क्या हुआ कि नीतीश कुमार का मुस्लिमों से मोह भंग हो गया? 1. मुस्लिमों के लिए काम किया, लेकिन उन्होंने साथ नहीं दिया 2013 में नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी के विरोध में 17 साल पुराना NDA का गठबंधन तोड़ दिया। 2014 लोकसभा चुनाव उन्होंने अपने दम पर लड़ा। उन्हें उम्मीद थी कि अपने कोर वोट बैंक के अलावा मुस्लिमों का भी साथ मिलेगा, लेकिन ये उनका भ्रम साबित हुआ। उन्होंने 38 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन मात्र 2 सीट ही जीत सके। इनमें एक नालंदा और एक पूर्णिया की सीट थी। बाकी 36 सीटों पर उनकी हार हो गई। JDU सूत्रों की मानें तो उसी साल से नीतीश कुमार का दिल टूट गया था। नीतीश कुमार ने वक्फ संशोधन बिल पर खुलकर सरकार को समर्थन करने की अपनी सहमति दे दी थी। उनका मानना था कि हम उनके लिए काम करते हैं, लेकिन वे हमारा सपोर्ट नहीं करते हैं। जदयू के एक नेता ने दैनिक भास्कर को बताया कि पॉलिटिक्स करने के लिए कपड़ा जरूरी है न। ऐसे में जो पार्टी हमें पद और कद दोनों दे रही है, हम उनके एजेंडे का विरोध क्यों करें। इसलिए हमारे नेतृत्व ने इस बिल पर सपोर्ट देने का निर्णय लिया। 2. JDU मान चुकी है उसे मुस्लिम वोट नहीं मिलने वाला JDU के एक बड़े नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि नीतीश कुमार ने 2005 से लेकर अब तक बहुत प्रयास किया कि उन्हें मुस्लिम वोट मिले। 2010 तक थोड़ा बहुत सपोर्ट मिला भी। इसके बाद मुस्लिम इनसे दूर होते चले गए। ऐसे में अब JDU की टॉप लीडरशिप ने इस बात को स्वीकार कर लिया है कि बिहार में मुस्लिम वोट एकतरफा है। ये कुछ भी कर लें, बीजेपी से अलग हो जाएं, आरजेडी के साथ आ जाएं। इन्हें मुस्लिम वोट नहीं मिलने वाला है। ऐसे में इन्होंने बीजेपी को साथ देने का निर्णय लिया। CSDS-लोकनीति के पोस्ट-पोल सर्वे 2020 के मुताबिक, RJD और कांग्रेस के महागठबंधन को 75% मुस्लिम वोट मिले थे। वहीं, BJP और JDU वाले NDA को 5% और चिराग पासवान की पार्टी LJP (रामविलास) को 2% मुस्लिम वोट मिले। 3. कमजोर नीतीश को 2025 के लिए बीजेपी का साथ जरूरी 2020 विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी तीसरे नंबर की बन गई थी। 2005 विधानसभा चुनाव के बाद ऐसा पहली बार हो रहा था जब नीतीश कुमार को बीजेपी से भी कम सीटें हासिल हुई थीं। इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार चिराग पासवान को माना गया। 2020 के चुनाव के बाद नीतीश कुमार भले सीएम बने रहे, लेकिन उन्हें दो बार पाला बदलना पड़ा। पहले बीजेपी का साथ छोड़कर वे राजद के साथ गए। इसके बाद दोबारा वे बीजेपी के साथ आए। बिहार में अगले 6 महीने में विधानसभा का चुनाव होना है। नीतीश कुमार की सेहत पर पहले से ही सवाल उठ रहे हैं। जदयू को बिहार में अपनी स्थिति को मजबूत रखने के लिए एक पुराने और भरोसेमंद साथी की जरूरत है। ऐसे में बीजेपी से ज्यादा भरोसेमंद उनके लिए कोई और पार्टी नहीं हो सकती है। ग्राफिक्स के जरिए जानिए, भाजपा का साथ छोड़ने और आने पर नीतीश की पार्टी का क्या हुआ 2015 के बाद से मुस्लिमों का नीतीश कुमार से मोहभंग बात 2024 लोकसभा चुनाव की है। नीतीश कुमार NDA की एक मीटिंग में शामिल थे। यहां सीएम को कहना पड़ा, ‘मुसलमानों को जाकर बताइए, उनके लिए सरकार ने क्या-क्या काम किया है। RJD आ गई तो दंगा फसाद करेगी।’ इस बयान का संदेश साफ था। नीतीश कुमार भी ये मान चुके थे कि इस समाज का अब उनसे मोह भंग हो चुका है। 2024 के लोकसभा और 2020 के विधानसभा चुनाव के नतीजों में नीतीश कुमार की पार्टी के एक भी मुस्लिम कैंडिडेट जीतने में सफल नहीं हो पाए थे। 2015 विधानसभा चुनाव में आखिरी बार JDU से 5 मुस्लिम विधायक जीते थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में JDU के एक भी मुस्लिम सांसद नहीं जीत पाए थे। 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू ने 11 मुस्लिम कैंडिडेट को मैदान में उतारा, लेकिन एक भी कैंडिडेट जीतने में सफल नहीं रहे। यही हाल 2024 के लोकसभा चुनाव में भी हुआ, जदयू के एक भी कैंडिडेट चुनाव नहीं जीत पाए। अब जानिए, नीतीश ने मुस्लिमों के लिए क्या किया JDU का दावा है कि 2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने मुस्लिमों की कई पुरानी डिमांड को एक-एक करके पूरा किया। पटना में हज भवन का निर्माण, अंजुमन इस्लामिया की मॉडर्न बिल्डिंग का निर्माण, मदरसा के शिक्षकों की सैलरी सरकारी स्कूल के शिक्षकों के बराबर करना, उर्दू शिक्षकों की बहाली, कब्रिस्तान की घेराबंदी या हर विधानसभा क्षेत्र में आवासीय स्कूल और छात्रावास का निर्माण, हायर एजुकेशन के लिए मुस्लिम छात्रों को स्कालरशिप जैसी कई योजनाएं 2005 से लेकर अब तक शुरू की गई हैं। दो बार BJP से अलग स्टैंड ले चुके हैं नीतीश 1. CAA को समर्थन लेकिन NRC का विरोध नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को समर्थन देने के बाद नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का विरोध किया था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार में एनआरसी (NRC) लागू नहीं होगा और वे एनपीआर (NPR) पर भी विरोध दर्ज करा चुके हैं। NPR पर नीतीश यह स्पष्ट कर चुके हैं कि 2010 की तर्ज पर ही राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर तैयार होना चाहिए। हालांकि नीतीश कुमार ने पहले सीएए (CAA) यानी नागरिकता संशोधन कानून का विरोध किया था, लेकिन बाद में लोकसभा में जेडीयू ने इस बिल का समर्थन दिया था। 2. धारा 370 हटाए जाने का भी जेडीयू ने किया था विरोध धारा 370 हटाए जाने को लेकर भी जेडीयू के अंदर इसी प्रकार का विरोधाभास देखने को मिला था। 5 अगस्त 2019 को धारा 370 हटाए जाने को लेकर वोटिंग के दौरान जनता दल यूनाइटेड के सभी सांसदों ने दोनों सदनों से वॉकआउट कर एक प्रकार से नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए इस बिल का विरोध ही किया था।