पीएम मोदी ने सोमवार को लोकसभा में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर चर्चा की शुरुआत की। उन्होंने कहा, वंदे मातरम् अंग्रेजों को करारा जवाब था, ये नारा आज भी प्रेरणा दे रहा। आजादी के समय महात्मा गांधी को भी यह पसंद था। उन्हें यह गीत नेशनल एंथन के रूप में दिखता था। पीएम ने कहा, उनके लिए इस गीत की ताकत बड़ी थी। पिछली सदी में इसके साथ इतना अन्याय क्यों हुआ। वंदे मातरम् के साथ विश्वासघात क्यों हुआ। वो कौन सी ताकत थी, जिसकी इच्छा कुछ पुज्य बापू की भावनाओं पर भी भारी पड़ी। उन्होंने कहा कि मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्टूबर 1936 को वंदे मातरम् के खिलाफ नारा बुलंद किया। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा। बजाय इसके कि नेहरू मुस्लिम लीग के आधारहीन बयानों को करारा जबाब देते, उसकी निंदा करते, लेकिन उल्टा हुआ। उन्होंने वंदे मातरम् की ही पड़ताल शुरू कर दी। बंकिम चंद्र ने 1875 में लिखा था, आनंदमठ में छपा था भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के पावन अवसर पर लिखा था। यह 1882 में पहली बार उनकी पत्रिका बंगदर्शन में उनके उपन्यास आनंदमठ के हिस्से के रूप में छपा था। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने मंच पर वंदे मातरम् गाया। यह पहला मौका था जब यह गीत सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर गाया गया। सभा में मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम थीं।
—————————– ये खबरें भी पढ़ें क्या ‘वंदे मातरम् ’ में मुसलमानों को मारने का आव्हान:गांधी ने अल्लाहू अकबर से तुलना की थी, क्या नेहरू ने राष्ट्रीय गीत के टुकड़े किए ‘वंदे मातरम् ‘ लिखने वाले बंकिमचंद्र को क्यों भूली ममता सरकार:वंशज बोले- जिसे धरोहर बनाया वो जर्जर, हमें कोई पूछने वाला नहीं लोकसभा में वंदे मातरम् से जुड़ी पल-पल की अपडेंट्स के लिए नीचे के ब्लॉग से गुजर जाएं…
पीएम मोदी ने सोमवार को लोकसभा में वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर चर्चा की शुरुआत की। उन्होंने कहा, वंदे मातरम् अंग्रेजों को करारा जवाब था, ये नारा आज भी प्रेरणा दे रहा। आजादी के समय महात्मा गांधी को भी यह पसंद था। उन्हें यह गीत नेशनल एंथन के रूप में दिखता था। पीएम ने कहा, उनके लिए इस गीत की ताकत बड़ी थी। पिछली सदी में इसके साथ इतना अन्याय क्यों हुआ। वंदे मातरम् के साथ विश्वासघात क्यों हुआ। वो कौन सी ताकत थी, जिसकी इच्छा कुछ पुज्य बापू की भावनाओं पर भी भारी पड़ी। उन्होंने कहा कि मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्टूबर 1936 को वंदे मातरम् के खिलाफ नारा बुलंद किया। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा। बजाय इसके कि नेहरू मुस्लिम लीग के आधारहीन बयानों को करारा जबाब देते, उसकी निंदा करते, लेकिन उल्टा हुआ। उन्होंने वंदे मातरम् की ही पड़ताल शुरू कर दी। बंकिम चंद्र ने 1875 में लिखा था, आनंदमठ में छपा था भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम् को बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के पावन अवसर पर लिखा था। यह 1882 में पहली बार उनकी पत्रिका बंगदर्शन में उनके उपन्यास आनंदमठ के हिस्से के रूप में छपा था। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने मंच पर वंदे मातरम् गाया। यह पहला मौका था जब यह गीत सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय स्तर पर गाया गया। सभा में मौजूद हजारों लोगों की आंखें नम थीं।
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