ढोल और थाली की थाप के साथ महिला-पुरुषों की टोली अस्पताल के भीतर घुस रही है। महिलाएं गीत गा रही हैं। एक व्यक्ति तलवार लहरा रहा है। एक अन्य शख्स के सिर से खून निकल रहा है। उसके सिर पर कपड़ा बंधा है। हाथों में पूजा की थाली और नारियल है। एक महिला सिर पर लकड़ी की टोकरी उठाकर चल रही है। टोकरी में एक पत्थर रखा है। बुधवार शाम करीब 4 बजे रतलाम मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में जिसने भी यह नजारा देखा, वहीं रुक गया। मन में एक ही सवाल था कि आखिर यह क्या हो रहा है? पूछने पर पता चला कि गांव के एक शख्स की आकस्मिक मौत मेडिकल कॉलेज में हो गई थी। जिसके बाद परिजन और ग्रामीण, आदिवासी मान्यता के अनुसार उसकी आत्मा को लेने आए हैं। उसे देवता के रूप में गांव में ओटला बनाकर स्थापित करेंगे। ओटला बनाकर आत्मा को करते हैं स्थापित
ये टोली, झावनी झोड़िया गांव से आई है। इसमें शामिल नीता झोड़िया के हाथों में टोकरी है। जिसमें पत्थर रखा है। इसी टोकरी में पूजा की थाली भी है, इसमें अगरबत्ती, जलता दीपक और पूजा की दूसरी सामग्री रखी है। ये सभी बेधड़क मेडिकल कॉलेज की लिफ्ट में सवार होकर तीसरी मंजिल पर पहुंचते हैं। कुछ देर में वापस लौट आते हैं। इनके लौटते ही अस्पताल के गेट पर इंतजार कर रहे महिला-पुरुषों में चीख-पुकार शुरू हो जाती है। ढोल और थाली की थाप तेज हो जाती है। करीब एक घंटे तक यह नजारा मेडिकल कॉलेज में चलता रहा, लेकिन इसे रोकने वाला कोई नहीं था। टोली में शामिल एक शख्स ने बताया- आदिवासी समाज में आकस्मिक मौत होने पर परिजन उसी जगह जाते हैं, जहां परिवार के सदस्य की मौत हुई है। वहां जाकर आत्मा से अपने साथ चलने का आह्वान किया जाता है। उसे पत्थर, लकड़ी या अन्य रूप में अपने साथ लेकर गांव के किसी स्थान या खेत में ओटला बनाकर देवता के रूप में स्थापित किया जाता है। तीन महीने पहले हो चुकी मौत
झावनी झोड़िया गांव के ग्रामीण जिस मृतक की आत्मा को लेने आए थे, उसका नाम शांतिलाल झोड़िया था। कीटनाशक पीने से उसकी तीन माह पहले मौत हो गई थी। मृतक की बुआ नीता झोड़िया ने रस्म निभाई। नीता ने बताया- मेरे भतीजे शांतिलाल की मौत हो गई थी। अब वह बड़े भाई की बेटी के शरीर में आकर उसे परेशान कर रहा है। बोल रहा है कि मुझे मेडिकल कॉलेज से लेकर आओ, इसलिए हम सब उसे लेने आए हैं। पत्थर में उसकी आत्मा को लेकर जा रहे हैं। पत्थर भी बताया
नीता ने अपने साथ लेकर आए एक पत्थर को भी बताया। कहा कि इसी पत्थर में आत्मा को लेकर जाएंगे। मेडिकल कॉलेज की तीसरी मंजिल से लौटते ही बड़े भाई की बेटी को एक महिला पकड़कर चल रही थी। कुछ अन्य महिलाओं व पुरुषों की चीख पुकार भी मच गई। सभी मृतक शांतिलाल का नाम लेने लगे। पत्थर में लेकर जाएंगे
परिजनों के साथ भूरालाल नामक व्यक्ति भी गले में माला डाल साथ में खड़ा था। जब इनसे बात की तो कहा कि शांतिलाल की आत्मा को लेने आए है। पूछा कि कैसे लेकर जाएंगे तो कहा कि गांव से पत्थर में लेकर जाएंगे। आज पहली बार आए है। नीता ने बताया कि मृतक पत्नी व तीन बच्चे भी है। वह भी मेडिकल कॉलेज में आए है। उनको भी सारी बाते मालूम है। झूमते हुए निकले बाहर, किसी ने नहीं रोका
आत्मा को लेकर जब सब बाहर निकलने लगे तो वहां पहले से मौजूद आदिवासी ढोल व थाली लेकर आए कुछ लोग उन्हें बजाने लगे। हाथ में तलवार लहराते हुए चीखते-पुकारते सभी सदस्य ढोल व थाली की थाप पर झूमते हुए मेडिकल कॉलेज से बाहर निकल गए। मेडिकल कॉलेज में एक तरफ जहां गार्ड मरीजों के अटेंडर के अलावा किसी को बिल्डिंग में नहीं जाने देते। ऐसे में 8 से 10 लोग हाथों में नारियल व पूजा सामग्री लेकर बेधड़क अंदर जाते है और वापस आते है। इन्हें किसी ने भी नहीं रोका। सवाल यह है कि समाज के कुछ हिस्सों में आज भी अंधविश्वास का गहरा प्रभाव भी मौजूद है। यह घटनाक्रम न सिर्फ हैरान करता है, बल्कि आधुनिक युग में सोचने पर मजबूर करता है। इस प्रकार की घटनाएं पूर्व में आ चुकी है। लेकिन रतलाम के मेडिकल कॉलेज में पहली देखने में आई है।
ढोल और थाली की थाप के साथ महिला-पुरुषों की टोली अस्पताल के भीतर घुस रही है। महिलाएं गीत गा रही हैं। एक व्यक्ति तलवार लहरा रहा है। एक अन्य शख्स के सिर से खून निकल रहा है। उसके सिर पर कपड़ा बंधा है। हाथों में पूजा की थाली और नारियल है। एक महिला सिर पर लकड़ी की टोकरी उठाकर चल रही है। टोकरी में एक पत्थर रखा है। बुधवार शाम करीब 4 बजे रतलाम मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में जिसने भी यह नजारा देखा, वहीं रुक गया। मन में एक ही सवाल था कि आखिर यह क्या हो रहा है? पूछने पर पता चला कि गांव के एक शख्स की आकस्मिक मौत मेडिकल कॉलेज में हो गई थी। जिसके बाद परिजन और ग्रामीण, आदिवासी मान्यता के अनुसार उसकी आत्मा को लेने आए हैं। उसे देवता के रूप में गांव में ओटला बनाकर स्थापित करेंगे। ओटला बनाकर आत्मा को करते हैं स्थापित
ये टोली, झावनी झोड़िया गांव से आई है। इसमें शामिल नीता झोड़िया के हाथों में टोकरी है। जिसमें पत्थर रखा है। इसी टोकरी में पूजा की थाली भी है, इसमें अगरबत्ती, जलता दीपक और पूजा की दूसरी सामग्री रखी है। ये सभी बेधड़क मेडिकल कॉलेज की लिफ्ट में सवार होकर तीसरी मंजिल पर पहुंचते हैं। कुछ देर में वापस लौट आते हैं। इनके लौटते ही अस्पताल के गेट पर इंतजार कर रहे महिला-पुरुषों में चीख-पुकार शुरू हो जाती है। ढोल और थाली की थाप तेज हो जाती है। करीब एक घंटे तक यह नजारा मेडिकल कॉलेज में चलता रहा, लेकिन इसे रोकने वाला कोई नहीं था। टोली में शामिल एक शख्स ने बताया- आदिवासी समाज में आकस्मिक मौत होने पर परिजन उसी जगह जाते हैं, जहां परिवार के सदस्य की मौत हुई है। वहां जाकर आत्मा से अपने साथ चलने का आह्वान किया जाता है। उसे पत्थर, लकड़ी या अन्य रूप में अपने साथ लेकर गांव के किसी स्थान या खेत में ओटला बनाकर देवता के रूप में स्थापित किया जाता है। तीन महीने पहले हो चुकी मौत
झावनी झोड़िया गांव के ग्रामीण जिस मृतक की आत्मा को लेने आए थे, उसका नाम शांतिलाल झोड़िया था। कीटनाशक पीने से उसकी तीन माह पहले मौत हो गई थी। मृतक की बुआ नीता झोड़िया ने रस्म निभाई। नीता ने बताया- मेरे भतीजे शांतिलाल की मौत हो गई थी। अब वह बड़े भाई की बेटी के शरीर में आकर उसे परेशान कर रहा है। बोल रहा है कि मुझे मेडिकल कॉलेज से लेकर आओ, इसलिए हम सब उसे लेने आए हैं। पत्थर में उसकी आत्मा को लेकर जा रहे हैं। पत्थर भी बताया
नीता ने अपने साथ लेकर आए एक पत्थर को भी बताया। कहा कि इसी पत्थर में आत्मा को लेकर जाएंगे। मेडिकल कॉलेज की तीसरी मंजिल से लौटते ही बड़े भाई की बेटी को एक महिला पकड़कर चल रही थी। कुछ अन्य महिलाओं व पुरुषों की चीख पुकार भी मच गई। सभी मृतक शांतिलाल का नाम लेने लगे। पत्थर में लेकर जाएंगे
परिजनों के साथ भूरालाल नामक व्यक्ति भी गले में माला डाल साथ में खड़ा था। जब इनसे बात की तो कहा कि शांतिलाल की आत्मा को लेने आए है। पूछा कि कैसे लेकर जाएंगे तो कहा कि गांव से पत्थर में लेकर जाएंगे। आज पहली बार आए है। नीता ने बताया कि मृतक पत्नी व तीन बच्चे भी है। वह भी मेडिकल कॉलेज में आए है। उनको भी सारी बाते मालूम है। झूमते हुए निकले बाहर, किसी ने नहीं रोका
आत्मा को लेकर जब सब बाहर निकलने लगे तो वहां पहले से मौजूद आदिवासी ढोल व थाली लेकर आए कुछ लोग उन्हें बजाने लगे। हाथ में तलवार लहराते हुए चीखते-पुकारते सभी सदस्य ढोल व थाली की थाप पर झूमते हुए मेडिकल कॉलेज से बाहर निकल गए। मेडिकल कॉलेज में एक तरफ जहां गार्ड मरीजों के अटेंडर के अलावा किसी को बिल्डिंग में नहीं जाने देते। ऐसे में 8 से 10 लोग हाथों में नारियल व पूजा सामग्री लेकर बेधड़क अंदर जाते है और वापस आते है। इन्हें किसी ने भी नहीं रोका। सवाल यह है कि समाज के कुछ हिस्सों में आज भी अंधविश्वास का गहरा प्रभाव भी मौजूद है। यह घटनाक्रम न सिर्फ हैरान करता है, बल्कि आधुनिक युग में सोचने पर मजबूर करता है। इस प्रकार की घटनाएं पूर्व में आ चुकी है। लेकिन रतलाम के मेडिकल कॉलेज में पहली देखने में आई है।