यदि आप कोई प्रॉपर्टी या सामान खरीदने-बेचने का एग्रीमेंट करते हैं या किरायानामा बनवाते हैं तो उसे कानूनी रूप देने के लिए स्टांप ड्यूटी चुकानी पड़ती है। इसके लिए एडहेसिव (चिपकाने वाले) स्टांप का इस्तेमाल होता है। ये डाक टिकट की तरह होते हैं। मगर, इसके लिए जो स्टांप खरीदे जाते हैं, क्या वह असली हैं? दैनिक भास्कर की पड़ताल में एक ऐसे घोटाले का पर्दाफाश हुआ है, जो आपकी जेब के साथ-साथ सरकारी खजाने को हर दिन लाखों का चूना लगा रहा है। यह घोटाला अब्दुल करीम तेलगी के महाघोटाले की याद दिलाता है, लेकिन इसका तरीका कहीं ज्यादा शातिराना है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक ऐसा ही गिरोह सक्रिय है, जो सरकारी दफ्तरों और बैंकों से चोरी किए गए पुराने दस्तावेजों से यूज्ड एडहेसिव स्टांप निकालकर उन्हें केमिकल से साफ करता है। फिर बिल्कुल नया बताकर बाजार में बेच देता है। इस खेल में शहर के कुछ नामी स्टांप वेंडर शामिल हैं, जो बैंककर्मियों और सरकारी बाबुओं की मिलीभगत से इस गोरखधंधे को अंजाम दे रहे हैं। दैनिक भास्कर ने इस पूरे रैकेट का खुलासा करने के लिए स्टिंग ऑपरेशन किए, रि-फिनिश किए गए स्टांप खरीदे और एक्सपर्ट से उनकी जांच कराई। पढ़िए, रिपोर्ट… जानिए, स्टांप ड्यूटी और एडहेसिव स्टांप के बारे में
स्टांप ड्यूटी एक प्रकार का टैक्स है, जो विभिन्न दस्तावेजों पर लगाया जाता है ताकि उन्हें कानूनी मान्यता मिले। भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 इस टैक्स की वसूली और उपयोग को नियंत्रित करता है। स्टांप ड्यूटी से संबंधित धारा 10, 11 और 12 प्रमुख होती हैं। इनके तहत ही स्टांप ड्यूटी का भुगतान, एडहेसिव स्टांप का इस्तेमाल और उसे रद्द करने की प्रक्रिया होती है। तेलगी के अंदाज में, लेकिन नए तरीके से घोटाला
90 के दशक में अब्दुल करीम तेलगी ने फर्जी स्टांप छापकर देश को 2000 करोड़ रुपए से ज्यादा का चूना लगाया था। तेलगी ने भी अपने घोटाले की शुरुआत पुराने दस्तावेजों से एडहेसिव स्टांप निकालकर ही की थी। तेलगी तो पकड़ा गया लेकिन उसकी कार्यप्रणाली ने प्रदेश में कई ‘छोटे तेलगी’ पैदा कर दिए हैं। ये गिरोह जिम्मेदारों की नाक के नीचे सरकारी राजस्व को पलीता लगा रहे हैं लेकिन किसी की नजर इन पर नहीं जा रही है। यह घोटाला इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि इसमें नकली स्टांप नहीं, बल्कि असली एडहेसिव स्टांप को ही अवैध रूप से रिसाइकिल किया जा रहा है, जिससे इन्हें पकड़ना लगभग नामुमकिन हो जाता है। हमारी टीम ऑफिस कर्मचारी बनकर मामा स्टांप वेंडर की दुकान पर पहुंची। दुकान पर एक अधेड़ व्यक्ति बीड़ी पी रहा था। रिपोर्टर: ऑफिस के लिए कुछ टिकट (एडहेसिव स्टांप) चाहिए। दुकानदार: (बीड़ी का कश लगाते हुए) कितने के? रिपोर्टर: 800 रुपए के। दुकानदार ने रिपोर्टर को ऊपर से नीचे तक घूरकर देखा और संदेह भरे लहजे में पूछा, ‘ले जाते रहते हो न? आपके साहब का ऑफिस कहां है?’ रिपोर्टर: हां ले जाता हूं। एमपी नगर में है। इस जवाब से संतुष्ट होने के बाद दुकानदार ने कहा, ‘ठीक है। कागज में रखकर दे देता हूं।’ उसने दराज से एक 500 रुपए और 100-100 रुपए के तीन स्टांप निकालकर कागज में लपेटे और कहा, ‘संभालकर रख लो।’ रिपोर्टर ने स्टांप लिए और वहां से निकल आया। पहली नजर में ये नए लग रहे थे, लेकिन असल में ये सरकारी सप्लाई के नहीं, बल्कि पुराने दस्तावेजों से चुराए गए एडहेसिव स्टांप थे। जिन्हें बाजार में पूरे दाम पर बेचा जा रहा था। दुकानदार की पूछताछ का मकसद सिर्फ यह जानना था कि ग्राहक कोई अनजान व्यक्ति तो नहीं है। इस बार रिपोर्टर एक किराएदार बनकर दुकान पर पहुंचा और पुराना किरायानामा रिन्यू कराने की बात कही। रिपोर्टर: यह एग्रीमेंट रिन्यू कराना है। दुकानदार: कितने के स्टांप पर करना है? रिपोर्टर: 1000 रुपए के। दुकानदार: ई-स्टांप पर या टिकट पर? रिपोर्टर: किसी पर भी कर दीजिए। बस रिन्यू कराना है। दुकानदार: ठीक है। 1300 रुपए में हो जाएगा। ऑपरेटर ने मैटर टाइप कर एग्रीमेंट तैयार किया और 100 रुपए के स्टांप पेपर पर प्रिंट निकालकर हस्ताक्षर कराए। इसके बाद एक लड़का स्टांप पेपर लेकर दुकान के अंदर गया और कुछ देर बाद 900 रुपए के एडहेसिव स्टांप लगाकर वापस ले आया। रिपोर्टर ने पेमेंट किया और वहां से निकल गया। कुछ दूर जाकर जब रिपोर्टर ने एग्रीमेंट पर लगे एडहेसिव स्टांप को ध्यान से देखा तो धोखाधड़ी साफ नजर आ गई। 100-100 रुपए के चार स्टांप तो नए थे, लेकिन 500 रुपए के जिस स्टांप पर नोटरी ने अपनी सील जोर से लगाई थी, वह पुराना था। उसके पीछे ‘कृते बैंक’ की एक पुरानी सील लगी हुई थी, जिसे मिटाने की कोशिश में ये फट गया था। वेंडर ने फटे हुए हिस्से को बड़ी चालाकी से अपनी सील के नीचे छिपा दिया था। इस तरह, वेंडर ने रद्दी के भाव खरीदे गए 500 रुपए के यूज्ड स्टांप का इस्तेमाल कर सीधे-सीधे 500 रुपए बचा लिए। कैसे काम करता है यह पूरा नेटवर्क? 1. सरकारी दफ्तरों और बैंकों से चोरी
भास्कर की पड़ताल में पता चला कि इस गिरोह के तार सरकारी कार्यालयों और बैंकों तक जुड़े हैं। इन संस्थानों में जमा होने वाले लाखों दस्तावेजों पर एडहेसिव स्टांप लगे होते हैं। कुछ साल बाद ये दस्तावेज अनुपयोगी मानकर स्टोर रूम में डाल दिए जाते हैं। यहीं से घोटाले का खेल शुरू होता है। गिरोह के सदस्य बाबुओं, स्टोर कीपर और चपरासियों से सांठगांठ कर इन दस्तावेजों को कौड़ियों के भाव खरीद लेते हैं। इसके लिए स्टांप की कीमत का महज 10 से 15 प्रतिशत ही चुकाया जाता है। 2. केमिकल एक्सपर्ट करते हैं सफाई
दस्तावेजों से टिकटें हासिल करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन पर लगी सील और स्याही को हटाना होता है। गिरोह में शामिल केमिकल एक्सपर्ट इन स्टांप को पहले दस्तावेजों से बेहद सफाई से निकालते हैं। इसके बाद एक खास तरह के केमिकल का उपयोग कर इन पर लगी सील, हस्ताक्षर और स्याही को साफ कर दिया जाता है। यह काम इतनी बारीकी से होता है कि ये बिल्कुल नए जैसे दिखने लगते हैं। फिर इन्हें सुखाकर और प्रेस करके बाजार में बेचने के लिए तैयार कर लिया जाता है। 3. वेंडर की सील से छिप जाती है हर कमी
जो एडहेसिव स्टांप सफाई के दौरान थोड़े खराब हो जाते हैं या जिन पर पुरानी सील के हल्के निशान रह जाते हैं, उन्हें सीधे बेचने की बजाय दस्तावेजों पर इस्तेमाल किया जाता है। जब कोई ग्राहक एग्रीमेंट या किरायानामा बनवाने आता है, तो वेंडर इन्हीं पुराने एडहेसिव स्टांप को चिपकाकर उन पर तुरंत अपनी नोटरी की सील लगा देता है। दो-तीन सीलें लगने के बाद यह पहचानना नामुमकिन हो जाता है कि स्टांप पुराना था या नया। एक्सपर्ट जांच में हुआ असली और नकली का पर्दाफाश
दैनिक भास्कर ने खरीदे गए स्टांप और किरायानामे की जांच हैंडराइटिंग और डॉक्यूमेंट एक्सपर्ट से कराई। जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए… 1. खुरदरी सतह और पुरानी सील: मामा नोटरी से खरीदे गए एडहेसिव स्टांप की सतह असली स्टांप की तरह चिकनी और चमकदार नहीं, बल्कि खुरदरी थी। एक स्टांप के किनारे पर पुरानी नीली सील का हल्का निशान बाकी था। 2. यूवी लाइट में चमका पुराना गोंद: टिकटों को जब यूवी लाइट में जांचा गया, तो उन पर पहले इस्तेमाल हुआ गोंद चमकने लगा। यह इस बात का सबूत था कि इन्हें किसी पुराने दस्तावेज से उखाड़ा गया है। 3. इंफ्रारेड लाइट में दिखी छिपी हुई सील: एएम नोटरी से बनवाए गए किरायानामे पर लगी 500 रुपए की टिकट को जब इंफ्रारेड लाइट फिल्टर से जांचा गया, तो ऊपर लगी नोटरी की नई सील की स्याही हल्की हो गई और उसके नीचे छिपी बैंक की पुरानी सील ‘कृते बैंक’ साफ-साफ उभर आई। इससे यह साबित हो गया कि टिकट का पहले इस्तेमाल हो चुका है। 4. 10 साल पुराने प्रिंटिंग ईयर: स्पेशल फिल्टर से जांचने पर टिकटों का प्रिंटिंग ईयर भी सामने आ गया। कुछ टिकटें 2015 और कुछ 2017 में छपी थीं। इसका मतलब है कि ये टिकटें लगभग 10 साल पुरानी हैं, जिन्हें अब दोबारा बेचा जा रहा है। खबर पर आप अपनी राय यहां दे सकते हैं… ये खबर भी पढे़ं… पुलिस हेडक्वार्टर में मेडिकल बिल घोटाला, 3 पुलिसकर्मियों ने पुलिसवालों के नाम पर ठगे 15 लाख मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय में मेडिकल शाखा के अधिकारियों ने फर्जी बिल बनाकर 15 लाख रुपए हड़प लिए। आरोपियों में प्रभारी- ASI हर्ष वानखेड़े, कैशियर- सूबेदार नीरज कुमार और सहायक स्टाफ- हेड कॉन्स्टेबल राजपाल ठाकुर शामिल हैं। एफआईआर दर्ज होते ही तीनों फरार हो गए हैं। पढ़ें पूरी खबर…
यदि आप कोई प्रॉपर्टी या सामान खरीदने-बेचने का एग्रीमेंट करते हैं या किरायानामा बनवाते हैं तो उसे कानूनी रूप देने के लिए स्टांप ड्यूटी चुकानी पड़ती है। इसके लिए एडहेसिव (चिपकाने वाले) स्टांप का इस्तेमाल होता है। ये डाक टिकट की तरह होते हैं। मगर, इसके लिए जो स्टांप खरीदे जाते हैं, क्या वह असली हैं? दैनिक भास्कर की पड़ताल में एक ऐसे घोटाले का पर्दाफाश हुआ है, जो आपकी जेब के साथ-साथ सरकारी खजाने को हर दिन लाखों का चूना लगा रहा है। यह घोटाला अब्दुल करीम तेलगी के महाघोटाले की याद दिलाता है, लेकिन इसका तरीका कहीं ज्यादा शातिराना है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक ऐसा ही गिरोह सक्रिय है, जो सरकारी दफ्तरों और बैंकों से चोरी किए गए पुराने दस्तावेजों से यूज्ड एडहेसिव स्टांप निकालकर उन्हें केमिकल से साफ करता है। फिर बिल्कुल नया बताकर बाजार में बेच देता है। इस खेल में शहर के कुछ नामी स्टांप वेंडर शामिल हैं, जो बैंककर्मियों और सरकारी बाबुओं की मिलीभगत से इस गोरखधंधे को अंजाम दे रहे हैं। दैनिक भास्कर ने इस पूरे रैकेट का खुलासा करने के लिए स्टिंग ऑपरेशन किए, रि-फिनिश किए गए स्टांप खरीदे और एक्सपर्ट से उनकी जांच कराई। पढ़िए, रिपोर्ट… जानिए, स्टांप ड्यूटी और एडहेसिव स्टांप के बारे में
स्टांप ड्यूटी एक प्रकार का टैक्स है, जो विभिन्न दस्तावेजों पर लगाया जाता है ताकि उन्हें कानूनी मान्यता मिले। भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 इस टैक्स की वसूली और उपयोग को नियंत्रित करता है। स्टांप ड्यूटी से संबंधित धारा 10, 11 और 12 प्रमुख होती हैं। इनके तहत ही स्टांप ड्यूटी का भुगतान, एडहेसिव स्टांप का इस्तेमाल और उसे रद्द करने की प्रक्रिया होती है। तेलगी के अंदाज में, लेकिन नए तरीके से घोटाला
90 के दशक में अब्दुल करीम तेलगी ने फर्जी स्टांप छापकर देश को 2000 करोड़ रुपए से ज्यादा का चूना लगाया था। तेलगी ने भी अपने घोटाले की शुरुआत पुराने दस्तावेजों से एडहेसिव स्टांप निकालकर ही की थी। तेलगी तो पकड़ा गया लेकिन उसकी कार्यप्रणाली ने प्रदेश में कई ‘छोटे तेलगी’ पैदा कर दिए हैं। ये गिरोह जिम्मेदारों की नाक के नीचे सरकारी राजस्व को पलीता लगा रहे हैं लेकिन किसी की नजर इन पर नहीं जा रही है। यह घोटाला इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि इसमें नकली स्टांप नहीं, बल्कि असली एडहेसिव स्टांप को ही अवैध रूप से रिसाइकिल किया जा रहा है, जिससे इन्हें पकड़ना लगभग नामुमकिन हो जाता है। हमारी टीम ऑफिस कर्मचारी बनकर मामा स्टांप वेंडर की दुकान पर पहुंची। दुकान पर एक अधेड़ व्यक्ति बीड़ी पी रहा था। रिपोर्टर: ऑफिस के लिए कुछ टिकट (एडहेसिव स्टांप) चाहिए। दुकानदार: (बीड़ी का कश लगाते हुए) कितने के? रिपोर्टर: 800 रुपए के। दुकानदार ने रिपोर्टर को ऊपर से नीचे तक घूरकर देखा और संदेह भरे लहजे में पूछा, ‘ले जाते रहते हो न? आपके साहब का ऑफिस कहां है?’ रिपोर्टर: हां ले जाता हूं। एमपी नगर में है। इस जवाब से संतुष्ट होने के बाद दुकानदार ने कहा, ‘ठीक है। कागज में रखकर दे देता हूं।’ उसने दराज से एक 500 रुपए और 100-100 रुपए के तीन स्टांप निकालकर कागज में लपेटे और कहा, ‘संभालकर रख लो।’ रिपोर्टर ने स्टांप लिए और वहां से निकल आया। पहली नजर में ये नए लग रहे थे, लेकिन असल में ये सरकारी सप्लाई के नहीं, बल्कि पुराने दस्तावेजों से चुराए गए एडहेसिव स्टांप थे। जिन्हें बाजार में पूरे दाम पर बेचा जा रहा था। दुकानदार की पूछताछ का मकसद सिर्फ यह जानना था कि ग्राहक कोई अनजान व्यक्ति तो नहीं है। इस बार रिपोर्टर एक किराएदार बनकर दुकान पर पहुंचा और पुराना किरायानामा रिन्यू कराने की बात कही। रिपोर्टर: यह एग्रीमेंट रिन्यू कराना है। दुकानदार: कितने के स्टांप पर करना है? रिपोर्टर: 1000 रुपए के। दुकानदार: ई-स्टांप पर या टिकट पर? रिपोर्टर: किसी पर भी कर दीजिए। बस रिन्यू कराना है। दुकानदार: ठीक है। 1300 रुपए में हो जाएगा। ऑपरेटर ने मैटर टाइप कर एग्रीमेंट तैयार किया और 100 रुपए के स्टांप पेपर पर प्रिंट निकालकर हस्ताक्षर कराए। इसके बाद एक लड़का स्टांप पेपर लेकर दुकान के अंदर गया और कुछ देर बाद 900 रुपए के एडहेसिव स्टांप लगाकर वापस ले आया। रिपोर्टर ने पेमेंट किया और वहां से निकल गया। कुछ दूर जाकर जब रिपोर्टर ने एग्रीमेंट पर लगे एडहेसिव स्टांप को ध्यान से देखा तो धोखाधड़ी साफ नजर आ गई। 100-100 रुपए के चार स्टांप तो नए थे, लेकिन 500 रुपए के जिस स्टांप पर नोटरी ने अपनी सील जोर से लगाई थी, वह पुराना था। उसके पीछे ‘कृते बैंक’ की एक पुरानी सील लगी हुई थी, जिसे मिटाने की कोशिश में ये फट गया था। वेंडर ने फटे हुए हिस्से को बड़ी चालाकी से अपनी सील के नीचे छिपा दिया था। इस तरह, वेंडर ने रद्दी के भाव खरीदे गए 500 रुपए के यूज्ड स्टांप का इस्तेमाल कर सीधे-सीधे 500 रुपए बचा लिए। कैसे काम करता है यह पूरा नेटवर्क? 1. सरकारी दफ्तरों और बैंकों से चोरी
भास्कर की पड़ताल में पता चला कि इस गिरोह के तार सरकारी कार्यालयों और बैंकों तक जुड़े हैं। इन संस्थानों में जमा होने वाले लाखों दस्तावेजों पर एडहेसिव स्टांप लगे होते हैं। कुछ साल बाद ये दस्तावेज अनुपयोगी मानकर स्टोर रूम में डाल दिए जाते हैं। यहीं से घोटाले का खेल शुरू होता है। गिरोह के सदस्य बाबुओं, स्टोर कीपर और चपरासियों से सांठगांठ कर इन दस्तावेजों को कौड़ियों के भाव खरीद लेते हैं। इसके लिए स्टांप की कीमत का महज 10 से 15 प्रतिशत ही चुकाया जाता है। 2. केमिकल एक्सपर्ट करते हैं सफाई
दस्तावेजों से टिकटें हासिल करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती उन पर लगी सील और स्याही को हटाना होता है। गिरोह में शामिल केमिकल एक्सपर्ट इन स्टांप को पहले दस्तावेजों से बेहद सफाई से निकालते हैं। इसके बाद एक खास तरह के केमिकल का उपयोग कर इन पर लगी सील, हस्ताक्षर और स्याही को साफ कर दिया जाता है। यह काम इतनी बारीकी से होता है कि ये बिल्कुल नए जैसे दिखने लगते हैं। फिर इन्हें सुखाकर और प्रेस करके बाजार में बेचने के लिए तैयार कर लिया जाता है। 3. वेंडर की सील से छिप जाती है हर कमी
जो एडहेसिव स्टांप सफाई के दौरान थोड़े खराब हो जाते हैं या जिन पर पुरानी सील के हल्के निशान रह जाते हैं, उन्हें सीधे बेचने की बजाय दस्तावेजों पर इस्तेमाल किया जाता है। जब कोई ग्राहक एग्रीमेंट या किरायानामा बनवाने आता है, तो वेंडर इन्हीं पुराने एडहेसिव स्टांप को चिपकाकर उन पर तुरंत अपनी नोटरी की सील लगा देता है। दो-तीन सीलें लगने के बाद यह पहचानना नामुमकिन हो जाता है कि स्टांप पुराना था या नया। एक्सपर्ट जांच में हुआ असली और नकली का पर्दाफाश
दैनिक भास्कर ने खरीदे गए स्टांप और किरायानामे की जांच हैंडराइटिंग और डॉक्यूमेंट एक्सपर्ट से कराई। जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए… 1. खुरदरी सतह और पुरानी सील: मामा नोटरी से खरीदे गए एडहेसिव स्टांप की सतह असली स्टांप की तरह चिकनी और चमकदार नहीं, बल्कि खुरदरी थी। एक स्टांप के किनारे पर पुरानी नीली सील का हल्का निशान बाकी था। 2. यूवी लाइट में चमका पुराना गोंद: टिकटों को जब यूवी लाइट में जांचा गया, तो उन पर पहले इस्तेमाल हुआ गोंद चमकने लगा। यह इस बात का सबूत था कि इन्हें किसी पुराने दस्तावेज से उखाड़ा गया है। 3. इंफ्रारेड लाइट में दिखी छिपी हुई सील: एएम नोटरी से बनवाए गए किरायानामे पर लगी 500 रुपए की टिकट को जब इंफ्रारेड लाइट फिल्टर से जांचा गया, तो ऊपर लगी नोटरी की नई सील की स्याही हल्की हो गई और उसके नीचे छिपी बैंक की पुरानी सील ‘कृते बैंक’ साफ-साफ उभर आई। इससे यह साबित हो गया कि टिकट का पहले इस्तेमाल हो चुका है। 4. 10 साल पुराने प्रिंटिंग ईयर: स्पेशल फिल्टर से जांचने पर टिकटों का प्रिंटिंग ईयर भी सामने आ गया। कुछ टिकटें 2015 और कुछ 2017 में छपी थीं। इसका मतलब है कि ये टिकटें लगभग 10 साल पुरानी हैं, जिन्हें अब दोबारा बेचा जा रहा है। खबर पर आप अपनी राय यहां दे सकते हैं… ये खबर भी पढे़ं… पुलिस हेडक्वार्टर में मेडिकल बिल घोटाला, 3 पुलिसकर्मियों ने पुलिसवालों के नाम पर ठगे 15 लाख मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय में मेडिकल शाखा के अधिकारियों ने फर्जी बिल बनाकर 15 लाख रुपए हड़प लिए। आरोपियों में प्रभारी- ASI हर्ष वानखेड़े, कैशियर- सूबेदार नीरज कुमार और सहायक स्टाफ- हेड कॉन्स्टेबल राजपाल ठाकुर शामिल हैं। एफआईआर दर्ज होते ही तीनों फरार हो गए हैं। पढ़ें पूरी खबर…