सुंदरकांड; सीता ने रावण से कहा- जैसे तुम्हारी स्त्रियां तुमसे संरक्षण पाती हैं, वैसे ही दूसरों की स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए… मैं प्राण दे दूंगी, पर तुम्हें नहीं स्वीकारूंगी संवाद-1 : रावण-सीता { अशोकवाटिका में सीताजी को धमकाने पहुंचे रावण ने कहा- परायी स्रियों के पास जाना या बलात् उन्हें हर लाना राक्षसों का सदा ही धर्म रहा है। { सीता ने कहा- रावण! जैसे तुम्हारी स्रियां तुमसे संरक्षण पाती हैं, उसी तरह तुम्हें दूसरों की स्रियों की भी रक्षा करनी चाहिए। परायी स्रियां चपल पुरुष को विनाश तक पहुंचा देती हैं। { रावण ने कहा- यदि दो महीने में आपने मुझे पति नहीं स्वीकारा तो मृत्युदंड दे दूंगा। { सीता ने कहा- भले मेरे प्राण चले जाएं, पर यह मुझे स्वीकार्य नहीं। चुनौती: जब कोई पुरुष या महिला बलपूर्वक मर्यादा का उल्लंघन करने लगे। सीख: जो गलत है, उसके सामने किसी भी दबाव में न झुकें। सत्य और संयम, सत्ता और भय से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। मर्यादा की रक्षा ही धर्म है। संवाद-2 : हनुमान-सीता { सीताजी की खोज में लंका पहुंचे हनुमानजी उन्हें घर-घर खोजने लगे। अंत में अशोकवाटिका में सीताजी के दर्शन हुए। { हनुमान ने कहा- माता! मैं प्रभु श्रीराम का दूत हूं। {सीता बोलीं- रावण का संहार करके मेरे पति मुझे कब देखेंगे? इस वर्ष का यह 10वां महीना है, वर्ष पूरा होने तक वे न आए तो मैं प्राण त्याग दूंगी। { हनुमान ने कहा- देवी! आप आज्ञा दें तो अभी पीठ पर बिठाकर आकाश मार्ग से ले जाता हूं। {सीता बोलीं- आप शीघ्र से शीघ्र मेरे प्रभु को ले आएं। चुनौती: जिंदगी में कठिन दौर या पहाड़ सी मुश्किल में धैर्य डगमगाने लगता है। सीख: जितनी बड़ी चुनौती, उतना बड़ा धैर्य और संयम ही वांछित फल देता है। सुरक्षित रास्ता भी वही होता है जो विवेक से लिया गया हो, न कि जल्दबाजी में। संवाद-3 : रावण-हनुमान { मेघनाद ब्रह्मास्त्र में बांधकर हनुमानजी को रावण के दरबार में लाए। {रावण ने पूछा- आप कौन हैं, क्यों आए हैं? {हनुमान ने कहा- मैं माता सीता की खोज में आया हूं। सीताहरणरूपी अधर्म का फल आपको शीघ्र मिलेगा। अपने भाइयों, पुत्रों, मित्रों समेत पूरी लंका को मौत के मुंह में न झोंकें। { क्रोधित रावण बोला- इस वानर का वध कर दो। { विभीषण ने कहा- श्रेष्ठ राजा दूत का वध नहीं करते। दूतों के लिए अंग-भंग करने, कोड़े से पीटने, सिर मुड़वाने व चिह्न दागने जैसे दंड उचित हैं। चुनौती: धन बल, शक्ति या पद के मद में सत्य या खरी बात सुनने-समझने का संकट। सीख: हर राय में सुधार का बीज होता है। संवाद से हल निकलता है, क्रोध से नहीं। वक्त रहते चिंतन से आगे के बारे में सोच पाएं तो नुकसान से बचेंगे। संवाद-4 : श्रीराम-हनुमान { लंकादहन करके हनुमानजी किष्किंधा लौटे तो सीताजी का समाचार श्रीराम को सुनाया। { हनुमान ने कहा- प्रभु! मैं माता सीता से मिला। वे आपके वियोग में अत्यंत दुखी हैं। जब मैंने आपकी मुद्रिका उन्हें दी, तो उनकी आंखें चमक उठीं। { श्रीराम ने कहा- हनुमान! आपने असंभव को संभव कर दिया। अकेले सौ योजन लंबा समुद्र लांघकर लंका पहुंचना, सीता से मिलना और उनका समाचार लाना, यह कार्य देवताओं के लिए भी कठिन है। आपकी कीर्ति इस जगत में युगों-युगों तक रहेगी। चुनौती: कार्य सौंपने से पूर्व किसी की क्षमता का सही आकलन कर पाना आसान नहीं होता। सीख: आपके सच्चे सहयोगी चमत्कार कर सकते हैं, बशर्ते भावनात्मक जुड़ाव और भरोसा रहे। आपका विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी ऊर्जा बन जाता है। (कल पढ़िए …. लंकाकांड। इसमें विभीषण के शरण में आने से लेकर रावण वध तक के प्रसंग …)
सुंदरकांड; सीता ने रावण से कहा- जैसे तुम्हारी स्त्रियां तुमसे संरक्षण पाती हैं, वैसे ही दूसरों की स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए… मैं प्राण दे दूंगी, पर तुम्हें नहीं स्वीकारूंगी संवाद-1 : रावण-सीता { अशोकवाटिका में सीताजी को धमकाने पहुंचे रावण ने कहा- परायी स्रियों के पास जाना या बलात् उन्हें हर लाना राक्षसों का सदा ही धर्म रहा है। { सीता ने कहा- रावण! जैसे तुम्हारी स्रियां तुमसे संरक्षण पाती हैं, उसी तरह तुम्हें दूसरों की स्रियों की भी रक्षा करनी चाहिए। परायी स्रियां चपल पुरुष को विनाश तक पहुंचा देती हैं। { रावण ने कहा- यदि दो महीने में आपने मुझे पति नहीं स्वीकारा तो मृत्युदंड दे दूंगा। { सीता ने कहा- भले मेरे प्राण चले जाएं, पर यह मुझे स्वीकार्य नहीं। चुनौती: जब कोई पुरुष या महिला बलपूर्वक मर्यादा का उल्लंघन करने लगे। सीख: जो गलत है, उसके सामने किसी भी दबाव में न झुकें। सत्य और संयम, सत्ता और भय से कहीं अधिक शक्तिशाली हैं। मर्यादा की रक्षा ही धर्म है। संवाद-2 : हनुमान-सीता { सीताजी की खोज में लंका पहुंचे हनुमानजी उन्हें घर-घर खोजने लगे। अंत में अशोकवाटिका में सीताजी के दर्शन हुए। { हनुमान ने कहा- माता! मैं प्रभु श्रीराम का दूत हूं। {सीता बोलीं- रावण का संहार करके मेरे पति मुझे कब देखेंगे? इस वर्ष का यह 10वां महीना है, वर्ष पूरा होने तक वे न आए तो मैं प्राण त्याग दूंगी। { हनुमान ने कहा- देवी! आप आज्ञा दें तो अभी पीठ पर बिठाकर आकाश मार्ग से ले जाता हूं। {सीता बोलीं- आप शीघ्र से शीघ्र मेरे प्रभु को ले आएं। चुनौती: जिंदगी में कठिन दौर या पहाड़ सी मुश्किल में धैर्य डगमगाने लगता है। सीख: जितनी बड़ी चुनौती, उतना बड़ा धैर्य और संयम ही वांछित फल देता है। सुरक्षित रास्ता भी वही होता है जो विवेक से लिया गया हो, न कि जल्दबाजी में। संवाद-3 : रावण-हनुमान { मेघनाद ब्रह्मास्त्र में बांधकर हनुमानजी को रावण के दरबार में लाए। {रावण ने पूछा- आप कौन हैं, क्यों आए हैं? {हनुमान ने कहा- मैं माता सीता की खोज में आया हूं। सीताहरणरूपी अधर्म का फल आपको शीघ्र मिलेगा। अपने भाइयों, पुत्रों, मित्रों समेत पूरी लंका को मौत के मुंह में न झोंकें। { क्रोधित रावण बोला- इस वानर का वध कर दो। { विभीषण ने कहा- श्रेष्ठ राजा दूत का वध नहीं करते। दूतों के लिए अंग-भंग करने, कोड़े से पीटने, सिर मुड़वाने व चिह्न दागने जैसे दंड उचित हैं। चुनौती: धन बल, शक्ति या पद के मद में सत्य या खरी बात सुनने-समझने का संकट। सीख: हर राय में सुधार का बीज होता है। संवाद से हल निकलता है, क्रोध से नहीं। वक्त रहते चिंतन से आगे के बारे में सोच पाएं तो नुकसान से बचेंगे। संवाद-4 : श्रीराम-हनुमान { लंकादहन करके हनुमानजी किष्किंधा लौटे तो सीताजी का समाचार श्रीराम को सुनाया। { हनुमान ने कहा- प्रभु! मैं माता सीता से मिला। वे आपके वियोग में अत्यंत दुखी हैं। जब मैंने आपकी मुद्रिका उन्हें दी, तो उनकी आंखें चमक उठीं। { श्रीराम ने कहा- हनुमान! आपने असंभव को संभव कर दिया। अकेले सौ योजन लंबा समुद्र लांघकर लंका पहुंचना, सीता से मिलना और उनका समाचार लाना, यह कार्य देवताओं के लिए भी कठिन है। आपकी कीर्ति इस जगत में युगों-युगों तक रहेगी। चुनौती: कार्य सौंपने से पूर्व किसी की क्षमता का सही आकलन कर पाना आसान नहीं होता। सीख: आपके सच्चे सहयोगी चमत्कार कर सकते हैं, बशर्ते भावनात्मक जुड़ाव और भरोसा रहे। आपका विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी ऊर्जा बन जाता है। (कल पढ़िए …. लंकाकांड। इसमें विभीषण के शरण में आने से लेकर रावण वध तक के प्रसंग …)