17 साल की लड़की को रात को डरावने सपने आते थे। उसके पीरियड्स आने बंद हो गए थे।
MBBS स्टूडेंट को फेल होने का डर लगता था। चिड़चिड़ा हो गया। नींद में बोलने लगा था।
IIT इंजीनियर को नींद में सुसाइड के सपने आते थे। ये कुछ ऐसे केस हैं, जो सुनने में अजीब तो लगते हैं, पर 100 फीसदी सच हैं। मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने वाले लोगों के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। ये ऐसे लोग हैं, जो मोबाइल में इस तरह खोए कि दुनिया से कट गए। अजमेर संभाग के सबसे बड़े हॉस्पिटल (जवाहरलाल नेहरू अस्पताल) के मनोरोग विभाग के रिसर्च में यह सच्चाई सामने आई है। ऐसे केस सामने आ रहे हैं, जो चौंकाने वाले हैं। जवाहरलाल नेहरू हॉस्पिटल के मनोरोग विभाग के अध्यक्ष (HOD) डॉ. महेंद्र जैन की मानें तो 50 फीसदी केस तो मोबाइल एडिक्शन के आ रहे हैं। पिछले दिनों डॉ. जैन की टीम ने MBBS स्टूडेंट्स, नर्सिंग स्टूडेंट्स, कोचिंग सेंटर्स के करीब एक हजार स्टूडेंट्स पर एक महीने तक रिसर्च की गई। ये 15 से 25 एज ग्रुप के थे। अधिकतर स्टूडेंट्स में गंभीर लक्षण मिले। अधिक मोबाइल के इस्तेमाल के कारण इनमें नींद का नहीं आना, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई में मन नहीं लगना जैसे लक्षण आम हो गए थे। दैनिक भास्कर ने डॉ. जैन से बात कर मोबाइल एडिक्शन से होने वाली मानसिक बीमारी, उनके लक्षण और बचाव के बारे में जाना। पढ़िए यह रिपोर्ट… सबसे पहले इन तीन केस से समझिए कितना खतरनाक है मोबाइल केस 1- टॉपर लड़की के पीरिएड्स बंद हुए पढ़ाई से मन हटा
डॉ. महेंद्र जैन ने बताया- 17 साल की लड़की को उसके परिवार वाले हॉस्पिटल लेकर आए थे। लड़की हाई क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करती है। 10th क्लास की टॉपर भी रही है। अब वह 12th क्लास में पढ़ती थी। पिछले ढाई साल से उसे मोबाइल की ऐसी लत लगी कि छूट नहीं रही थी। वह सुबह 4 बजे तक यूट्यूब पर अलग-अलग कंटेंट देखा करती थी। इस कारण उसे नींद की कमी (स्लीप वीक साइकलिंग) हो गई थी। उसका माइंड डिस्टर्ब रहने लगा था। यहां तक कि उसके पीरियड्स भी बंद हो गए थे। वजन कम हो गया था। पढ़ाई से भी मन हट गया था। उसे डरावने सपने भी आने लगे थे। फेल होने और करियर खराब होने का डर सताने लगा था। वह चिड़चिड़ी हो गई थी। एक महीने की काउंसलिंग में 6 से 7 सेशन हुए। इस दौरान उसे मोबाइल से दूर रखा गया। ज्यादा मोबाइल देखने से होने वाली परेशानियों के बारे में बताया गया। अब वह ठीक है। केस 2- MBBS स्टूडेंट से मोबाइल लेते तो आक्रामक हो जाता था
डॉ. महेंद्र जैन ने बताया- एमबीबीएस सेकेंड ईयर के स्टूडेंट का भी केस आया था। मोबाइल के कारण उसने पढ़ाई से दूरी बना ली थी। फेल होने लग गया था। नींद कम आने की वजह से वह चिड़चिड़ा हो गया था। नींद में बड़बड़ाता था। उसे डरावने सपने आते थे। उसे सपने इस तरीके के आते थे, जैसे उसे कोई शूट कर रहा है। कोई उसे मार देगा या उसे सुसाइड के लिए उकसा रहा है। वह लड़का मोबाइल एडिक्ट था। अपने दोस्तों के साथ क्लासरूम में भी बैक बेंच पर जाकर पब्जी गेम खेलता था। एक पाकिस्तान के प्लेयर के साथ भी गेम खेलता था। उसे इतनी लत लग गई कि वह हर समय पब्जी गेम खेलता रहता था। काउंसलिंग सेशन के अलावा उसे दवाइयां भी दी गईं। परिवार को कहा गया था कि उसे मोबाइल से दूर रखें। परिवार के सदस्य उसका मोबाइल लेते थे तो वह लड़ाई-झगड़ा करने लगता था। इसे मेडिकल की भाषा में ‘नोमोफोबिया’ कहते हैं। केस 3- IIT इंजीनियर को सुसाइड के सपने आते थे
एक केस IIT इंजीनियर, गुड़गांव का आया था। कुछ समय पहले उसकी जॉब चली गई थी, जिसके कारण वह देर रात तक मोबाइल देखने लगा था। दिन में सोता था। परिवार के सदस्यों के कुछ कहने पर गुस्सा करता था। वह चिड़चिड़ा हो गया था। उसका कॉन्फिडेंस लेवल पूरी तरह से खत्म हो गया था। उसे सुसाइड के सपने आते थे। वह इमरजेंसी में हमारे पास आया था। जांच में पता चला कि वह दिन में 10 से 12 घंटे मोबाइल का उपयोग करता था। दुनिया से वह कट चुका था। काउंसलिंग और दवाइयों के बाद वह अब ठीक है। मोबाइल एडिक्शन के 5 से 10 केस रोज आ रहे
मनोरोग विभाग के एचओडी डॉ. महेंद्र जैन ने बताया- स्टडी में सामने आया कि सोने से पहले ज्यादा देर तक मोबाइल देखने से डरावने सपने आने की आशंका रहती है। मोबाइल की लत से परेशान लोगों के 5 से 10 केस रोज आ रहे हैं। इसमें 15 से 25 साल तक के उम्र के लोग शामिल हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताते हैं। डॉ. ने बताया- कोरोना महामारी में सब अपने घरों में बंद हो गए थे। बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन शुरू हो गई थी। बच्चे लगातार 5 से 6 घंटे मोबाइल पर ही पढ़ाई कर रहे थे। कंपनियों में भी काम ऑनलाइन होने लगा। युवा ज्यादातर टाइम मोबाइल और लैपटॉप के सामने गुजारने लगा था। आज हर किसी के पास मोबाइल है और लाइफ का ज्यादातर टाइम उसी पर बिता रहे हैं। परिवार में चार लोग एक कमरे में बैठे हैं। इसके बाद भी आपस में बात नहीं करते। सभी अपने-अपने मोबाइल में ज्यादा वक्त बिताते हैं। ऐसे में इमोशनल लेवल के साथ ही आपसी कम्युनिकेशन में भी कमी आई है। रात के समय ज्यादा स्क्रीन टाइम से दिनचर्या गड़बड़ा जाने से साइड इफेक्ट देखने को मिलते है। सोने से 2 घंटे पहले मोबाइल बंद कर दें
मोबाइल एडिक्शन ज्यादा होने पर दवाइयों की मदद ली जाती है। इसके अलावा मरीज की काउंसलिंग की जाती है। काउंसलिंग में मोबाइल के दुष्प्रचार की जानकारी दी जाती है। रात को सोने से 2 घंटे पहले ही अपना मोबाइल बंद करने की हिदायत दी जाती है। इसके साथ ही खाना खाते वक्त मोबाइल अपने पास न रखें। कई केस में सामने आया है कि खाने की टेबल पर बच्चों के सामने पेरेंट्स मोबाइल में लगे रहते हैं। ऐसे में बच्चे उनका देखादेखी मोबाइल देखते हैं। इसलिए घरों में बड़े एक नियम बनाएं और खाना खाते वक्त मोबाइल न देखें। गैजेट्स का यूज टाइम 90% तक बढ़ा
एरिक्सन मोबिलिटी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लोगों का औसतन स्क्रीन टाइम चार से पांच घंटे तक हो गया है। अमेरिका में हुई एक स्टडी के मुताबिक ग्लोबल लेवल पर गैजेट का यूज टाइम 90% तक बढ़ गया है।रिपोर्ट के मुताबिक स्मार्टफोन का इस्तेमाल जहां पहले प्रति व्यक्ति औसतन 3 घंटे होता था, वो 5 घंटे तक पहुंच गया है। ब्रॉडबैंड या वाईफाई से जुड़े रहने के दौरान पहले एक व्यक्ति औसतन 2.5 घंटे स्क्रीन इस्तेमाल करता था, अब यह आंकड़ा 4.5 घंटे तक जा पहुंचा है।
17 साल की लड़की को रात को डरावने सपने आते थे। उसके पीरियड्स आने बंद हो गए थे।
MBBS स्टूडेंट को फेल होने का डर लगता था। चिड़चिड़ा हो गया। नींद में बोलने लगा था।
IIT इंजीनियर को नींद में सुसाइड के सपने आते थे। ये कुछ ऐसे केस हैं, जो सुनने में अजीब तो लगते हैं, पर 100 फीसदी सच हैं। मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने वाले लोगों के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। ये ऐसे लोग हैं, जो मोबाइल में इस तरह खोए कि दुनिया से कट गए। अजमेर संभाग के सबसे बड़े हॉस्पिटल (जवाहरलाल नेहरू अस्पताल) के मनोरोग विभाग के रिसर्च में यह सच्चाई सामने आई है। ऐसे केस सामने आ रहे हैं, जो चौंकाने वाले हैं। जवाहरलाल नेहरू हॉस्पिटल के मनोरोग विभाग के अध्यक्ष (HOD) डॉ. महेंद्र जैन की मानें तो 50 फीसदी केस तो मोबाइल एडिक्शन के आ रहे हैं। पिछले दिनों डॉ. जैन की टीम ने MBBS स्टूडेंट्स, नर्सिंग स्टूडेंट्स, कोचिंग सेंटर्स के करीब एक हजार स्टूडेंट्स पर एक महीने तक रिसर्च की गई। ये 15 से 25 एज ग्रुप के थे। अधिकतर स्टूडेंट्स में गंभीर लक्षण मिले। अधिक मोबाइल के इस्तेमाल के कारण इनमें नींद का नहीं आना, चिड़चिड़ापन, पढ़ाई में मन नहीं लगना जैसे लक्षण आम हो गए थे। दैनिक भास्कर ने डॉ. जैन से बात कर मोबाइल एडिक्शन से होने वाली मानसिक बीमारी, उनके लक्षण और बचाव के बारे में जाना। पढ़िए यह रिपोर्ट… सबसे पहले इन तीन केस से समझिए कितना खतरनाक है मोबाइल केस 1- टॉपर लड़की के पीरिएड्स बंद हुए पढ़ाई से मन हटा
डॉ. महेंद्र जैन ने बताया- 17 साल की लड़की को उसके परिवार वाले हॉस्पिटल लेकर आए थे। लड़की हाई क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करती है। 10th क्लास की टॉपर भी रही है। अब वह 12th क्लास में पढ़ती थी। पिछले ढाई साल से उसे मोबाइल की ऐसी लत लगी कि छूट नहीं रही थी। वह सुबह 4 बजे तक यूट्यूब पर अलग-अलग कंटेंट देखा करती थी। इस कारण उसे नींद की कमी (स्लीप वीक साइकलिंग) हो गई थी। उसका माइंड डिस्टर्ब रहने लगा था। यहां तक कि उसके पीरियड्स भी बंद हो गए थे। वजन कम हो गया था। पढ़ाई से भी मन हट गया था। उसे डरावने सपने भी आने लगे थे। फेल होने और करियर खराब होने का डर सताने लगा था। वह चिड़चिड़ी हो गई थी। एक महीने की काउंसलिंग में 6 से 7 सेशन हुए। इस दौरान उसे मोबाइल से दूर रखा गया। ज्यादा मोबाइल देखने से होने वाली परेशानियों के बारे में बताया गया। अब वह ठीक है। केस 2- MBBS स्टूडेंट से मोबाइल लेते तो आक्रामक हो जाता था
डॉ. महेंद्र जैन ने बताया- एमबीबीएस सेकेंड ईयर के स्टूडेंट का भी केस आया था। मोबाइल के कारण उसने पढ़ाई से दूरी बना ली थी। फेल होने लग गया था। नींद कम आने की वजह से वह चिड़चिड़ा हो गया था। नींद में बड़बड़ाता था। उसे डरावने सपने आते थे। उसे सपने इस तरीके के आते थे, जैसे उसे कोई शूट कर रहा है। कोई उसे मार देगा या उसे सुसाइड के लिए उकसा रहा है। वह लड़का मोबाइल एडिक्ट था। अपने दोस्तों के साथ क्लासरूम में भी बैक बेंच पर जाकर पब्जी गेम खेलता था। एक पाकिस्तान के प्लेयर के साथ भी गेम खेलता था। उसे इतनी लत लग गई कि वह हर समय पब्जी गेम खेलता रहता था। काउंसलिंग सेशन के अलावा उसे दवाइयां भी दी गईं। परिवार को कहा गया था कि उसे मोबाइल से दूर रखें। परिवार के सदस्य उसका मोबाइल लेते थे तो वह लड़ाई-झगड़ा करने लगता था। इसे मेडिकल की भाषा में ‘नोमोफोबिया’ कहते हैं। केस 3- IIT इंजीनियर को सुसाइड के सपने आते थे
एक केस IIT इंजीनियर, गुड़गांव का आया था। कुछ समय पहले उसकी जॉब चली गई थी, जिसके कारण वह देर रात तक मोबाइल देखने लगा था। दिन में सोता था। परिवार के सदस्यों के कुछ कहने पर गुस्सा करता था। वह चिड़चिड़ा हो गया था। उसका कॉन्फिडेंस लेवल पूरी तरह से खत्म हो गया था। उसे सुसाइड के सपने आते थे। वह इमरजेंसी में हमारे पास आया था। जांच में पता चला कि वह दिन में 10 से 12 घंटे मोबाइल का उपयोग करता था। दुनिया से वह कट चुका था। काउंसलिंग और दवाइयों के बाद वह अब ठीक है। मोबाइल एडिक्शन के 5 से 10 केस रोज आ रहे
मनोरोग विभाग के एचओडी डॉ. महेंद्र जैन ने बताया- स्टडी में सामने आया कि सोने से पहले ज्यादा देर तक मोबाइल देखने से डरावने सपने आने की आशंका रहती है। मोबाइल की लत से परेशान लोगों के 5 से 10 केस रोज आ रहे हैं। इसमें 15 से 25 साल तक के उम्र के लोग शामिल हैं। ये ऐसे लोग हैं, जो मोबाइल स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताते हैं। डॉ. ने बताया- कोरोना महामारी में सब अपने घरों में बंद हो गए थे। बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन शुरू हो गई थी। बच्चे लगातार 5 से 6 घंटे मोबाइल पर ही पढ़ाई कर रहे थे। कंपनियों में भी काम ऑनलाइन होने लगा। युवा ज्यादातर टाइम मोबाइल और लैपटॉप के सामने गुजारने लगा था। आज हर किसी के पास मोबाइल है और लाइफ का ज्यादातर टाइम उसी पर बिता रहे हैं। परिवार में चार लोग एक कमरे में बैठे हैं। इसके बाद भी आपस में बात नहीं करते। सभी अपने-अपने मोबाइल में ज्यादा वक्त बिताते हैं। ऐसे में इमोशनल लेवल के साथ ही आपसी कम्युनिकेशन में भी कमी आई है। रात के समय ज्यादा स्क्रीन टाइम से दिनचर्या गड़बड़ा जाने से साइड इफेक्ट देखने को मिलते है। सोने से 2 घंटे पहले मोबाइल बंद कर दें
मोबाइल एडिक्शन ज्यादा होने पर दवाइयों की मदद ली जाती है। इसके अलावा मरीज की काउंसलिंग की जाती है। काउंसलिंग में मोबाइल के दुष्प्रचार की जानकारी दी जाती है। रात को सोने से 2 घंटे पहले ही अपना मोबाइल बंद करने की हिदायत दी जाती है। इसके साथ ही खाना खाते वक्त मोबाइल अपने पास न रखें। कई केस में सामने आया है कि खाने की टेबल पर बच्चों के सामने पेरेंट्स मोबाइल में लगे रहते हैं। ऐसे में बच्चे उनका देखादेखी मोबाइल देखते हैं। इसलिए घरों में बड़े एक नियम बनाएं और खाना खाते वक्त मोबाइल न देखें। गैजेट्स का यूज टाइम 90% तक बढ़ा
एरिक्सन मोबिलिटी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लोगों का औसतन स्क्रीन टाइम चार से पांच घंटे तक हो गया है। अमेरिका में हुई एक स्टडी के मुताबिक ग्लोबल लेवल पर गैजेट का यूज टाइम 90% तक बढ़ गया है।रिपोर्ट के मुताबिक स्मार्टफोन का इस्तेमाल जहां पहले प्रति व्यक्ति औसतन 3 घंटे होता था, वो 5 घंटे तक पहुंच गया है। ब्रॉडबैंड या वाईफाई से जुड़े रहने के दौरान पहले एक व्यक्ति औसतन 2.5 घंटे स्क्रीन इस्तेमाल करता था, अब यह आंकड़ा 4.5 घंटे तक जा पहुंचा है।