मैं तो सरकारी स्कूल में पढ़ता था। हमारे स्कूल की तो खुद की बिल्डिंग भी नहीं थी। किराए का भवन था। घर से बैठने के लिए बोरा लेकर जाना पड़ता था। बारिश होती थी तो छुट्टी हो जाती थी। आधे पैर पानी में डूबे हुए घर लौटता था। मैं सोचता था कि जब बड़ा होकर इस व्यवस्था से जुड़ूंगा तो सारे स्कूलों को अच्छा करूंगा। एक प्रकार से शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार सबके लिए होना चाहिए। अब सांदीपनि अच्छा स्कूल हो गया। पहले तो सरकारी स्कूलों में खेल मैदान, गणवेश नहीं होती थी। खाने के लिए टिफिन नहीं ले जाते थे। प्राइवेट वाले बच्चे ये सब करते थे तो हमारे मन में भाव आता था कि ये बडे़ अच्छे लोग हैं। हमें तो ये मिलता नहीं। लेकिन, अब सरकारी स्कूल बहुत अच्छे हो गए हैं। अब मिड डे मील, साइकिल, लैपटॉप, स्कूटी भी मिल रही है। ये बात मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भोपाल में बाल दिवस के मौके पर स्कूली बच्चों के सवाल के जवाब में कही। मुख्यमंत्री निवास में दैनिक भास्कर द्वारा चुने गए बच्चों की बाल पंचायत में सीएम ने अपने बचपन से लेकर करियर और राजनीति को लेकर तमाम सवालों के खुलकर जवाब दिए। सिलसिलेवार पढ़ें सीएम और स्कूली बच्चों के बीच हुए रोचक सवाल-जवाब… सवाल: जब आप छोटे थे तब आपका पसंदीदा खेल या खिलौना क्या था? (अन्वी भार्गव, DPS कोलार, कक्षा- 7वीं) सीएम: खेल में मुझे स्विमिंग पसंद है। मैं रोज नदी में स्नान करने जाता था। स्विमिंग में मुझे आनंद आता था। सवाल: अगर कोई बच्चा आपसे पूछे कि मुझे राजनीति करनी है तो आप उसे क्या सलाह देंगे? (आर्या बाथम, सागर पब्लिक स्कूल द्वारका धाम, कक्षा- 9वीं) सीएम: जरूर करना चाहिए। क्योंकि, हमारे देश के लिए यह गौरव की बात है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इसको लंबे समय तक रखना है तो हमारे बच्चों को इसमें आगे बढ़कर अपनी भूमिका अदा करना चाहिए। क्योंकि देश की आजादी के पहले जब लोकतंत्र नहीं था, तब चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु बहुत कम उम्र में शहीद हुए। जलियांवाला बाग कांड का बदला लेने के लिए 20 साल से कम उम्र वाले ही बलिदान हुए। वे छोटी उम्र में इसलिए बलिदान हुए कि देश को आजाद होना चाहिए। तो फिर देश को अच्छा रखना हमारी जवाबदारी है। लोकतंत्र की यही तो खूबसूरती है नहीं तो पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे हाल होंगे। सवाल: आपने बचपन में कभी अपनी क्लास से बंक मारा है? (रिद्धिमा पवार, माउंट कार्मल स्कूल बागमुगलिया, कक्षा- 7वीं) सीएम: बेटा, ये तो कभी नहीं किया। मैं तो संडे के दिन भी शिक्षकों के घर चला जाता था। उनके घर के सदस्य की तरह रहता था। शिक्षकों से केवल क्लास तक के संबंध मत रखो। वे हमारे गार्जियन की तरह हैं। मेरे माता-पिता ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। इसलिए मुझे संवाद करने के लिए शिक्षकों से बात करती रहना पड़ती थी। हमारे यहां के कांग्रेस नेता बटुकशंकर जोशी के बडे़ भाई अनंत नारायण जोशी वैद्य थे। वो निशुल्क कोचिंग कराते थे। ऐसे कई शिक्षकों के पास जाकर मैं अलग से पढ़ता था। सवाल: जब आप हमारी उम्र के थे, तब आपको किस विषय से डर लगता था? आप कभी फेल हुए?
(अन्वेष उपाध्याय, सागर पब्लिक स्कूल कटारा, कक्षा- 10वीं) सीएम: मैं फेल तो नहीं हुआ हूं। नंबर आने के लिए यह बात जरूर है कि मैं रटने में विश्वास नहीं करता। मेरा स्वभाव ये था कि एक बार पढ़ लिया, उससे जाकर परीक्षा दे आते थे। और नंबर भी ठीक ही आते थे। लेकिन पढ़ना मनोयोग से चाहिए। कभी-कभी हमारा उसमें ध्यान ही नहीं जाता कि लिखा क्या है। हमारा ध्यान एकाग्रता वाला होना चाहिए। हमें डर लगता है कि पढ़ना मतलब रटना, रटे हुए से परीक्षा देना। जब ये लोड लोगे तो जरूर भूल जाओगे फिर फेल भी होगे। इसलिए अगर समझ में न आए तो शिक्षक से पूछो कि मुझे फिर से समझा दो। अगर कोई बच्चा क्लास में प्रश्न नहीं पूछता तो पता ही नहीं चलता कि उसे समझ आया या नहीं। सवाल: आपके जीवन में शिक्षकों से जुड़ा कोई किस्सा या सीख हो, जो आपके जीवन में काम आई हो? (प्रांशु शर्मा, सागर पब्लिक स्कूल साकेत नगर, कक्षा- 11वीं) सीएम: मेरे तो बहुत सारे किस्से हैं। मेरे तो कॉलेज के समय में चुनाव होते थे। लेकिन, हमारे जीवन में जब गार्जियन का समावेश होता है तो हमारी कई अच्छी बातों को और अच्छे से कराने का प्रयास कराते हैं। जब मैं फर्स्ट ईयर में चुनाव लड़ा तो मेरी थोड़ी राजनीतिक क्षेत्र में भी रुचि थी। मेरे एक प्रोफेसर थे नवीन भटनागर जी, वो कहते थे बेटा तुम बीएससी करोगे आगे बढ़ोगे, अच्छी बात है। लेकिन तुम पढ़ाई के साथ राजनीति में भी दिमाग लगाना। वो मुझे आज तक समझ नहीं आया। वो 1982-83 यानी आज से लगभग 40 साल पहले की बात है, मैं सीएम तो दो साल पहले बना। वो तब कहते थे कि मुख्यमंत्री बनोगे। मैं ये आज तक नहीं समझ पाया कि उन्होंने क्या देखा। जो अच्छे शिक्षक होते हैं, वो हमें प्रेरित करते हैं। अनुभव से बहुत सारी चीजें आती हैं। सवाल: जब आप छोटे थे, तब फ्यूचर मध्य प्रदेश को लेकर क्या सपने थे? (मेघा श्रीवास्तव, सागर पब्लिक स्कूल गांधी नगर, कक्षा- 11वीं) सीएम: मैं सरकारी स्कूल में पढ़ता था। किराए का भवन था। बारिश होती थी तो छुट्टी हो जाती थी। पहले सरकारी स्कूलों में खेल मैदान, गणवेश नहीं होती थी। खाने के लिए टिफिन नहीं ले जाते थे। लेकिन, अब सरकारी स्कूल बहुत अच्छे हो गए हैं। अब मिड डे मील, साइकिल, लैपटॉप, स्कूटी मिल रही है। उज्जैन का एक नलवा हायर सेकेण्डरी स्कूल है। वहां के बोर्ड एग्जाम में बच्चे फर्स्ट क्लास आए। मैंने उन्हें प्रमोट किया। सरकारी स्कूलों से निकले बच्चे खुद को मेधावी बना देते हैं। अभी, एमपीपीएससी, यूपीएससी जैसे एग्जाम में सरकारी स्कूलों के बच्चे सिलेक्ट हो रहे हैं। ये बड़ी बात है। सवाल: आप पहलवान हैं, डॉक्टर भी हैं, प्रोफेसर हैं और आप मुख्यमंत्री भी हैं। आपका फेवरेट प्रोफेशन क्या है? (इशांत पटेल, सांदीपनि स्कूल गोविंदपुरा) सीएम: मैं प्रोफेसर नहीं हूं। मुझे लिखना-पढ़ना बहुत पसंद है। जब भी समय मिलता है, अच्छी पुस्तक पढ़ता हूं। मैं डायरी भी लिखता हूं। हमें अपनी बात को लंबे समय तक स्मरण रखना हो तो डायरी में लिख लेना चाहिए। हमारे मन में रोज विचार आते हैं। अपनी डायरी खोलकर देखेंगे तो उससे हम मदद ले सकते हैं। सवाल: जब आप हमारी उम्र के थे, तब आपका मुख्यमंत्री बनने का सपना था? या कोई और सपना था? (जान्हवी विश्वकर्मा, सांदीपनि स्कूल गोविंदपुरा, कक्षा- 10वीं) सीएम: मैंने कभी सोचा भी नहीं था। मुझसे मेरे सर भी कहते थे तो मैं आश्चर्य करता था कि ये क्या कह रहे हैं। मुझे तो पल्ले ही नहीं पड़ रहा। मेरे घर में कोई सांसद विधायक तो था नहीं। घर में चुनाव का माहौल तो था नहीं। ऐसा लगता था कि ये बड़ी बात हो गई। मुझे विधायक के लिए भी भरोसा नहीं होता था। जब मैं हायर सेकेण्डरी में था तो अपने एक दोस्त के गांव जाना था। हम रोडवेज की बस में बैठे। विधायक क्या होता है, उस समय मैं ये भी नहीं जानता था। उस समय हमारे यहां उदय सिंह पंड्या विधायक थे। उस बस में वे भी बैठे तो उन्होंने कहा तुम चार बच्चों में से दो लोग टिकट मत लेना। हमने कहा कि ये कौन से सर हैं, जो कह रहे हैं कि टिकट मत लो। हम उनके साथ बैठ गए। हमारे पीछे जो बच्चे बैठे थे, उनके टिकट के पैसे लग गए। कंडक्टर हमारी सीट पर आया तो हम जेब में से पैसे निकालने लगे तो पंड्या जी ने रोक दिया और अपनी जेब में से पास निकाला। कंडक्टर ने उस पास में से कुछ नोट किया और चला गया। हम बस से उतरे तो पूछा कि आपने क्या दिखाया? तब उन्होंने बताया कि मैं विधायक हूं और मुझे दो आदमी को रोडवेज में ले साथ ले जाने की छूट है। तब हमको समझ आया कि विधायक ऐसा भी होता है। सवाल: जब आप हमारी उम्र में थे, तब आपका कोई पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर था? क्या उसे अब भी देखना पसंद करेंगे?
(अन्वी भार्गव, डीपीएस कोलार, कक्षा- 7वीं) सीएम: कार्टून तो नहीं लेकिन हमारे समय में रामलीला, रामायण जैसे कार्यक्रम चलते थे। गणेशोत्सव के समय अपने टैलेंट को दिखाने का प्रयास चलता था। मैं भी जादू सीखने गया था। उस समय जादू वाला खेल आनंद के लिए करते थे। सवाल: आपको एक दिन की छुट्टी मिले तो आप क्या करेंगे? सीएम: छुट्टी का तो मुझे कुछ नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि हम रोज काम करने के लिए ही हैं। मेरे घर से कोई यहां (सीएम हाउस) रहता तो है नहीं। एक बेटा हॉस्टल में रहकर पढ़ता है। एक बेटा उज्जैन में रहता है। बेटी ससुराल चली गई। अब घर में कोई नहीं है। यहां सुबह से शाम तक अगर छुट्टी मनाएंगे तो करेंगे क्या? काम ही करना है तो मोदी जी का आदर्श उदाहरण हैं। उन्होंने 24-25 साल में एक भी छुट्टी नहीं ली। हमारे लिए अच्छी बात है। हम जैसे खाना-पीना, सोना रोजाना करते हैं। तो काम भी करते रहिए। थोड़े दिन ज्यादा-थोड़े दिन कम होता है। सवाल: आपको पूरे दिन में सबसे अच्छी चीज कौन सी लगती है, जो आप रोजाना करते हैं? सीएम: बच्चों से मिलते हैं तो आनंद आ जाता है। मैं जहां जाता हूं तो बच्चों से मिलता हूं।
मैं तो सरकारी स्कूल में पढ़ता था। हमारे स्कूल की तो खुद की बिल्डिंग भी नहीं थी। किराए का भवन था। घर से बैठने के लिए बोरा लेकर जाना पड़ता था। बारिश होती थी तो छुट्टी हो जाती थी। आधे पैर पानी में डूबे हुए घर लौटता था। मैं सोचता था कि जब बड़ा होकर इस व्यवस्था से जुड़ूंगा तो सारे स्कूलों को अच्छा करूंगा। एक प्रकार से शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार सबके लिए होना चाहिए। अब सांदीपनि अच्छा स्कूल हो गया। पहले तो सरकारी स्कूलों में खेल मैदान, गणवेश नहीं होती थी। खाने के लिए टिफिन नहीं ले जाते थे। प्राइवेट वाले बच्चे ये सब करते थे तो हमारे मन में भाव आता था कि ये बडे़ अच्छे लोग हैं। हमें तो ये मिलता नहीं। लेकिन, अब सरकारी स्कूल बहुत अच्छे हो गए हैं। अब मिड डे मील, साइकिल, लैपटॉप, स्कूटी भी मिल रही है। ये बात मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भोपाल में बाल दिवस के मौके पर स्कूली बच्चों के सवाल के जवाब में कही। मुख्यमंत्री निवास में दैनिक भास्कर द्वारा चुने गए बच्चों की बाल पंचायत में सीएम ने अपने बचपन से लेकर करियर और राजनीति को लेकर तमाम सवालों के खुलकर जवाब दिए। सिलसिलेवार पढ़ें सीएम और स्कूली बच्चों के बीच हुए रोचक सवाल-जवाब… सवाल: जब आप छोटे थे तब आपका पसंदीदा खेल या खिलौना क्या था? (अन्वी भार्गव, DPS कोलार, कक्षा- 7वीं) सीएम: खेल में मुझे स्विमिंग पसंद है। मैं रोज नदी में स्नान करने जाता था। स्विमिंग में मुझे आनंद आता था। सवाल: अगर कोई बच्चा आपसे पूछे कि मुझे राजनीति करनी है तो आप उसे क्या सलाह देंगे? (आर्या बाथम, सागर पब्लिक स्कूल द्वारका धाम, कक्षा- 9वीं) सीएम: जरूर करना चाहिए। क्योंकि, हमारे देश के लिए यह गौरव की बात है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इसको लंबे समय तक रखना है तो हमारे बच्चों को इसमें आगे बढ़कर अपनी भूमिका अदा करना चाहिए। क्योंकि देश की आजादी के पहले जब लोकतंत्र नहीं था, तब चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु बहुत कम उम्र में शहीद हुए। जलियांवाला बाग कांड का बदला लेने के लिए 20 साल से कम उम्र वाले ही बलिदान हुए। वे छोटी उम्र में इसलिए बलिदान हुए कि देश को आजाद होना चाहिए। तो फिर देश को अच्छा रखना हमारी जवाबदारी है। लोकतंत्र की यही तो खूबसूरती है नहीं तो पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे हाल होंगे। सवाल: आपने बचपन में कभी अपनी क्लास से बंक मारा है? (रिद्धिमा पवार, माउंट कार्मल स्कूल बागमुगलिया, कक्षा- 7वीं) सीएम: बेटा, ये तो कभी नहीं किया। मैं तो संडे के दिन भी शिक्षकों के घर चला जाता था। उनके घर के सदस्य की तरह रहता था। शिक्षकों से केवल क्लास तक के संबंध मत रखो। वे हमारे गार्जियन की तरह हैं। मेरे माता-पिता ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। इसलिए मुझे संवाद करने के लिए शिक्षकों से बात करती रहना पड़ती थी। हमारे यहां के कांग्रेस नेता बटुकशंकर जोशी के बडे़ भाई अनंत नारायण जोशी वैद्य थे। वो निशुल्क कोचिंग कराते थे। ऐसे कई शिक्षकों के पास जाकर मैं अलग से पढ़ता था। सवाल: जब आप हमारी उम्र के थे, तब आपको किस विषय से डर लगता था? आप कभी फेल हुए?
(अन्वेष उपाध्याय, सागर पब्लिक स्कूल कटारा, कक्षा- 10वीं) सीएम: मैं फेल तो नहीं हुआ हूं। नंबर आने के लिए यह बात जरूर है कि मैं रटने में विश्वास नहीं करता। मेरा स्वभाव ये था कि एक बार पढ़ लिया, उससे जाकर परीक्षा दे आते थे। और नंबर भी ठीक ही आते थे। लेकिन पढ़ना मनोयोग से चाहिए। कभी-कभी हमारा उसमें ध्यान ही नहीं जाता कि लिखा क्या है। हमारा ध्यान एकाग्रता वाला होना चाहिए। हमें डर लगता है कि पढ़ना मतलब रटना, रटे हुए से परीक्षा देना। जब ये लोड लोगे तो जरूर भूल जाओगे फिर फेल भी होगे। इसलिए अगर समझ में न आए तो शिक्षक से पूछो कि मुझे फिर से समझा दो। अगर कोई बच्चा क्लास में प्रश्न नहीं पूछता तो पता ही नहीं चलता कि उसे समझ आया या नहीं। सवाल: आपके जीवन में शिक्षकों से जुड़ा कोई किस्सा या सीख हो, जो आपके जीवन में काम आई हो? (प्रांशु शर्मा, सागर पब्लिक स्कूल साकेत नगर, कक्षा- 11वीं) सीएम: मेरे तो बहुत सारे किस्से हैं। मेरे तो कॉलेज के समय में चुनाव होते थे। लेकिन, हमारे जीवन में जब गार्जियन का समावेश होता है तो हमारी कई अच्छी बातों को और अच्छे से कराने का प्रयास कराते हैं। जब मैं फर्स्ट ईयर में चुनाव लड़ा तो मेरी थोड़ी राजनीतिक क्षेत्र में भी रुचि थी। मेरे एक प्रोफेसर थे नवीन भटनागर जी, वो कहते थे बेटा तुम बीएससी करोगे आगे बढ़ोगे, अच्छी बात है। लेकिन तुम पढ़ाई के साथ राजनीति में भी दिमाग लगाना। वो मुझे आज तक समझ नहीं आया। वो 1982-83 यानी आज से लगभग 40 साल पहले की बात है, मैं सीएम तो दो साल पहले बना। वो तब कहते थे कि मुख्यमंत्री बनोगे। मैं ये आज तक नहीं समझ पाया कि उन्होंने क्या देखा। जो अच्छे शिक्षक होते हैं, वो हमें प्रेरित करते हैं। अनुभव से बहुत सारी चीजें आती हैं। सवाल: जब आप छोटे थे, तब फ्यूचर मध्य प्रदेश को लेकर क्या सपने थे? (मेघा श्रीवास्तव, सागर पब्लिक स्कूल गांधी नगर, कक्षा- 11वीं) सीएम: मैं सरकारी स्कूल में पढ़ता था। किराए का भवन था। बारिश होती थी तो छुट्टी हो जाती थी। पहले सरकारी स्कूलों में खेल मैदान, गणवेश नहीं होती थी। खाने के लिए टिफिन नहीं ले जाते थे। लेकिन, अब सरकारी स्कूल बहुत अच्छे हो गए हैं। अब मिड डे मील, साइकिल, लैपटॉप, स्कूटी मिल रही है। उज्जैन का एक नलवा हायर सेकेण्डरी स्कूल है। वहां के बोर्ड एग्जाम में बच्चे फर्स्ट क्लास आए। मैंने उन्हें प्रमोट किया। सरकारी स्कूलों से निकले बच्चे खुद को मेधावी बना देते हैं। अभी, एमपीपीएससी, यूपीएससी जैसे एग्जाम में सरकारी स्कूलों के बच्चे सिलेक्ट हो रहे हैं। ये बड़ी बात है। सवाल: आप पहलवान हैं, डॉक्टर भी हैं, प्रोफेसर हैं और आप मुख्यमंत्री भी हैं। आपका फेवरेट प्रोफेशन क्या है? (इशांत पटेल, सांदीपनि स्कूल गोविंदपुरा) सीएम: मैं प्रोफेसर नहीं हूं। मुझे लिखना-पढ़ना बहुत पसंद है। जब भी समय मिलता है, अच्छी पुस्तक पढ़ता हूं। मैं डायरी भी लिखता हूं। हमें अपनी बात को लंबे समय तक स्मरण रखना हो तो डायरी में लिख लेना चाहिए। हमारे मन में रोज विचार आते हैं। अपनी डायरी खोलकर देखेंगे तो उससे हम मदद ले सकते हैं। सवाल: जब आप हमारी उम्र के थे, तब आपका मुख्यमंत्री बनने का सपना था? या कोई और सपना था? (जान्हवी विश्वकर्मा, सांदीपनि स्कूल गोविंदपुरा, कक्षा- 10वीं) सीएम: मैंने कभी सोचा भी नहीं था। मुझसे मेरे सर भी कहते थे तो मैं आश्चर्य करता था कि ये क्या कह रहे हैं। मुझे तो पल्ले ही नहीं पड़ रहा। मेरे घर में कोई सांसद विधायक तो था नहीं। घर में चुनाव का माहौल तो था नहीं। ऐसा लगता था कि ये बड़ी बात हो गई। मुझे विधायक के लिए भी भरोसा नहीं होता था। जब मैं हायर सेकेण्डरी में था तो अपने एक दोस्त के गांव जाना था। हम रोडवेज की बस में बैठे। विधायक क्या होता है, उस समय मैं ये भी नहीं जानता था। उस समय हमारे यहां उदय सिंह पंड्या विधायक थे। उस बस में वे भी बैठे तो उन्होंने कहा तुम चार बच्चों में से दो लोग टिकट मत लेना। हमने कहा कि ये कौन से सर हैं, जो कह रहे हैं कि टिकट मत लो। हम उनके साथ बैठ गए। हमारे पीछे जो बच्चे बैठे थे, उनके टिकट के पैसे लग गए। कंडक्टर हमारी सीट पर आया तो हम जेब में से पैसे निकालने लगे तो पंड्या जी ने रोक दिया और अपनी जेब में से पास निकाला। कंडक्टर ने उस पास में से कुछ नोट किया और चला गया। हम बस से उतरे तो पूछा कि आपने क्या दिखाया? तब उन्होंने बताया कि मैं विधायक हूं और मुझे दो आदमी को रोडवेज में ले साथ ले जाने की छूट है। तब हमको समझ आया कि विधायक ऐसा भी होता है। सवाल: जब आप हमारी उम्र में थे, तब आपका कोई पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर था? क्या उसे अब भी देखना पसंद करेंगे?
(अन्वी भार्गव, डीपीएस कोलार, कक्षा- 7वीं) सीएम: कार्टून तो नहीं लेकिन हमारे समय में रामलीला, रामायण जैसे कार्यक्रम चलते थे। गणेशोत्सव के समय अपने टैलेंट को दिखाने का प्रयास चलता था। मैं भी जादू सीखने गया था। उस समय जादू वाला खेल आनंद के लिए करते थे। सवाल: आपको एक दिन की छुट्टी मिले तो आप क्या करेंगे? सीएम: छुट्टी का तो मुझे कुछ नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि हम रोज काम करने के लिए ही हैं। मेरे घर से कोई यहां (सीएम हाउस) रहता तो है नहीं। एक बेटा हॉस्टल में रहकर पढ़ता है। एक बेटा उज्जैन में रहता है। बेटी ससुराल चली गई। अब घर में कोई नहीं है। यहां सुबह से शाम तक अगर छुट्टी मनाएंगे तो करेंगे क्या? काम ही करना है तो मोदी जी का आदर्श उदाहरण हैं। उन्होंने 24-25 साल में एक भी छुट्टी नहीं ली। हमारे लिए अच्छी बात है। हम जैसे खाना-पीना, सोना रोजाना करते हैं। तो काम भी करते रहिए। थोड़े दिन ज्यादा-थोड़े दिन कम होता है। सवाल: आपको पूरे दिन में सबसे अच्छी चीज कौन सी लगती है, जो आप रोजाना करते हैं? सीएम: बच्चों से मिलते हैं तो आनंद आ जाता है। मैं जहां जाता हूं तो बच्चों से मिलता हूं।