धूल का गुबार। हवा को चीरते हुए टी-90 भीष्म टैंकों की दहाड़… और उस शोर के बीच आसमान में राफेल की गड़गड़ाहट… यह कोई हॉलीवुड की फिल्म का सीन नहीं, बल्कि भारत की पश्चिमी इलाके की इंटरनेशनल बॉर्डर के पास चल रहा भारतीय सेना का सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन है। इसका नाम ‘ऑपरेशन त्रिशूल’ है। सदर्न (साउथ-इस्टर्न) कमांड की सुदर्शन चक्र कोर की ओर से शाहबाज डिवीजन के हजारों गैलेंट सैनिक इस युद्धाभ्यास में भाग ले रहे हैं। 30 अक्टूबर से थार के रेगिस्तानी सेक्टर में जैसलमेर से लगती पाकिस्तान सीमा के पास ‘अभ्यास मरु ज्वाला’ चल रहा है। यह महा-अभ्यास 10 नवंबर तक जारी रहेगा। आसमान में ड्रोन ने निगरानी करते हुए सैनिकों को दुश्मन के ठिकानों की जानकारी दी। सैनिकों ने बिना एक समय गंवाए आधुनिक हथियारों के साथ दुश्मन के ठिकानों को नष्ट कर दिया। अब भारतीय सेना युद्धाभ्यास में ड्रोन के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है। सेना में ड्रोन की मदद से तमाम काम किए जा रहे हैं। हथियार, रसद व अन्य कई तरह के काम में ड्रोन अपनी भूमिका निभा रहा है। इससे सैनिकों की जान-माल की भी सुरक्षा हो रही है। रात का सन्नाटा और डिजिटल अटैक की तैयारी
सरहद पर रात… तापमान तेजी से गिर चुका है। लेकिन कमान और नियंत्रण केंद्र में गर्मी है। यहां युद्ध के पारंपरिक नक्शे अब डिजिटल स्क्रीन में बदल चुके हैं। अधिकारियों की आंखें उपग्रहों, यूएवी (ड्रोन) और रडार से आ रहे रियल-टाइम डेटा पर टिकी हैं। जवान चिल्लाकर कहते हैं- यह अभ्यास ‘तकनीक की शक्ति से संचालित’ है। अब दुश्मनों के डिजिटल डोमेन में घुसकर मारने की तैयारी चल रही है। तभी स्क्रीन पर दुश्मन के एक काल्पनिक ठिकाने की लोकेशन फ्लैश होती है। कमांड सेंटर से तुरंत आदेश जारी होता है। यह ‘नेटवर्क्ड फायर’ का कमाल है। दुश्मनों के हलचल की जानकारी मिलते ही सीधे अटैक। T-90 ‘भीष्म’ की दहाड़, जमीन पर मोर्चा
सरहद पर रात के बाद सुबह ‘अभ्यास मरु ज्वाला’ शुरू होता है। सूरज की पहली किरण के साथ रेगिस्तान की धरती कांपने लगती है। टी-90 ‘भीष्म’ टैंकों का एक बेड़ा गर्जना करते हुए आगे बढ़ता है। ये सिर्फ टैंक नहीं, ये भारत की आक्रामक शक्ति के प्रतीक हैं। धूल के बड़े-बड़े गुबार हवा में उठते हैं, जिससे दुश्मन के लिए छिपना मुश्किल हो जाता है। सैनिक अपने टैंकों के अंदर हाई-इंटेंसिटी इंटीग्रेटेड मैन्यूवर्स कर रहे हैं। यानी चलते-चलते सटीक निशाना लगाना और दुश्मन के हमले से बचना। उनके पीछे-पीछे बख्तरबंद वाहनों में पैदल सेना भी आगे बढ़ रही है, जो संयुक्त युद्ध की नई रणनीति का हिस्सा है। ब्रह्मोस को तैनात किया
भारत की गौरव ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को उसके लॉन्च व्हीकल (TEL) पर तैनात किया गया। ब्रह्मोस की उपस्थिति ही सीमा पर तनाव बढ़ा देती है। यह दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइल है। इसकी तैनाती का मतलब है कि भारत लॉन्ग-रेंज डीप स्ट्राइक के लिए पूरी तरह तैयार है। आसमान से निगरानी और ड्रोन का राज
इस अभ्यास का सबसे खास और नाटकीय तत्व है मानव रहित प्लेटफॉर्म (Unmanned Platforms) यानी ड्रोन। रेतीले टीलों की ओट से हेरॉन और अन्य स्वदेशी यूएवी उड़कर दुश्मन के काल्पनिक इलाके में घुसपैठ करते हैं। ये बिना किसी सैनिक को जोखिम में डाले, दुश्मन के ठिकानों, जमावड़े और रडार सिग्नल को स्कैन करती हैं। एंटी-ड्रोन सिस्टम का ट्रायल
यूएवी द्वारा भेजी गई थर्मल इमेजिंग और हाई-रिजोल्यूशन तस्वीरें सीधे कमांड सेंटर की डिजिटल स्क्रीन पर आती हैं। यह खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) की हाईटेक क्षमता है। साथ ही, सेना अपनी खुद की सुरक्षा के लिए काउंटर-ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉर प्रणालियों का भी ट्रायल कर रही है। ये प्रणालियां दुश्मन के ड्रोनों या संचार को जाम करने (Jam) और उन्हें मार गिराने की क्षमता रखती हैं। तीनों सेनाओं का ‘डिजिटल त्रिशूल’
इस अभ्यास की सफलता का मूलमंत्र है ‘जॉइंटनेस’। थल सेना अकेले नहीं लड़ रही। अभ्यास के दौरान राफेल और सुखोई-30 MKI जैसे लड़ाकू जेट्स ने बहुत कम ऊंचाई पर उड़ान भरकर क्लोज एयर सपोर्ट दिया। ये जेट्स, जमीनी सैनिकों से सीधे संपर्क में रहकर, दुश्मन के ठिकानों को हवाई हमलों से नष्ट कर रहे थे। थल सेना के पैरा कमांडो, नौसेना के मार्कोस और वायु सेना के गरुड़ कमांडो ने मिलकर अंदरूनी घुसपैठ और टारगेट को नष्ट करने का अभ्यास किया। डिजिटल नेटवर्क को मजबूत करने का प्रयास
यह ‘त्रिशूल’ युद्धाभ्यास सिर्फ गोलीबारी का प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारत की रक्षा नीति में बड़े सुधारों का सबूत है। सेना ने खुद को नई तकनीक अपनाने के लिए तैयार किया है। इस अभ्यास से सीमा पर तैनात हर सैनिक को यह संदेश मिल गया है कि वह डिजिटल नेटवर्क से जुड़ा है और उसके पीछे तीनों सेनाओं की अखंड शक्ति खड़ी है। अभ्यास में इस्तेमाल हो रहे हथियार, वाहन और तकनीक
‘त्रिशूल’ युद्धाभ्यास सिर्फ सैनिकों के तालमेल का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह भारत की सैन्य इन्वेंट्री की हाईटेक क्षमता का लाइव ट्रायल है। इस अभ्यास में सदर्न कमांड जिन प्रमुख हथियारों, वाहनों और तकनीकों का उपयोग कर रही है। इन फोटोज में देखिए युद्धाभ्यास की झलकियां… रणभूमि के डिजिटल नेत्र: युद्धाभ्यास में इस्तेमाल हो रहे प्रमुख UAV
भारतीय सेना, वायु सेना और नौसेना द्वारा ‘त्रिशूल’ जैसे युद्धाभ्यास में खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) मिशन के लिए इन मानव रहित प्लेटफार्मों पर बहुत अधिक निर्भरता दिखाई देती है। प्रमुख स्वदेशी यूएवी
‘त्रिशूल’ जैसे अभ्यासों में, भारतीय सेना डीआरडीओ (DRDO) द्वारा विकसित स्वदेशी प्लेटफार्मों का परीक्षण करती है, जो आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस अभ्यास में जिन प्रमुख ड्रोन का उपयोग किया गया है, उनमें हेरॉन मार्क-2, हेरॉन टीपी, तपस-BH, नेट्रा शामिल हैं। ‘त्रिशूल’ में UAVs की भूमिका (Digital Warfare) ‘त्रिशूल’ में इन UAVs का उपयोग केवल जासूसी तक सीमित नहीं था। ये ‘नेटवर्क्ड फायर’ (Networked Fires) की नई रणनीति में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं: हेरॉन ने उन्नत विदेशी तकनीक दिखाई, जबकि तपस और नेट्रा जैसे स्वदेशी प्लेटफार्मों ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत भारत की बढ़ती घरेलू क्षमताओं को दर्शाया। — सेना के युद्धाभ्यास से जुड़ीं ये खबरें भी पढ़िए…
1. राजस्थान में 28000 फीट की ऊंचाई से मिसाइलें दागीं:रेत के धोरों में गरज रहे टैंक, आर्मी-नेवी और एयरफोर्स ने दुश्मनों के ठिकानों को नेस्तनाबूद किया रेत के धोरों में टैंक गरज रहे हैं। 28 हजार फीट तक की ऊंचाई से लड़ाकू विमानों ने मिसाइलें दागीं। सेना के जांबाज चुन-चुनकर दुश्मन के ठिकानों को नेस्तनाबूद कर रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद तीनों सेनाओं की ये सबसे बड़ी एक्सरसाइज है। पढ़िए पूरी खबर 2. पाकिस्तान बॉर्डर पर आज से गरजेगा ‘त्रिशूल’:भारत की तीनों सेनाओं का सबसे बड़ा संयुक्त युद्धाभ्यास शुरू, पाकिस्तान में नोटम पाकिस्तान से सटी भारत की पश्चिमी सीमा पर युद्ध जैसे हालात का अभ्यास करने के लिए भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने गुरुवार 30 अक्टूबर से 11 नवंबर तक 13 दिवसीय मेगा युद्धाभ्यास ‘त्रिशूल’ शुरू कर दिया है। पढ़ें पूरी खबर
धूल का गुबार। हवा को चीरते हुए टी-90 भीष्म टैंकों की दहाड़… और उस शोर के बीच आसमान में राफेल की गड़गड़ाहट… यह कोई हॉलीवुड की फिल्म का सीन नहीं, बल्कि भारत की पश्चिमी इलाके की इंटरनेशनल बॉर्डर के पास चल रहा भारतीय सेना का सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन है। इसका नाम ‘ऑपरेशन त्रिशूल’ है। सदर्न (साउथ-इस्टर्न) कमांड की सुदर्शन चक्र कोर की ओर से शाहबाज डिवीजन के हजारों गैलेंट सैनिक इस युद्धाभ्यास में भाग ले रहे हैं। 30 अक्टूबर से थार के रेगिस्तानी सेक्टर में जैसलमेर से लगती पाकिस्तान सीमा के पास ‘अभ्यास मरु ज्वाला’ चल रहा है। यह महा-अभ्यास 10 नवंबर तक जारी रहेगा। आसमान में ड्रोन ने निगरानी करते हुए सैनिकों को दुश्मन के ठिकानों की जानकारी दी। सैनिकों ने बिना एक समय गंवाए आधुनिक हथियारों के साथ दुश्मन के ठिकानों को नष्ट कर दिया। अब भारतीय सेना युद्धाभ्यास में ड्रोन के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है। सेना में ड्रोन की मदद से तमाम काम किए जा रहे हैं। हथियार, रसद व अन्य कई तरह के काम में ड्रोन अपनी भूमिका निभा रहा है। इससे सैनिकों की जान-माल की भी सुरक्षा हो रही है। रात का सन्नाटा और डिजिटल अटैक की तैयारी
सरहद पर रात… तापमान तेजी से गिर चुका है। लेकिन कमान और नियंत्रण केंद्र में गर्मी है। यहां युद्ध के पारंपरिक नक्शे अब डिजिटल स्क्रीन में बदल चुके हैं। अधिकारियों की आंखें उपग्रहों, यूएवी (ड्रोन) और रडार से आ रहे रियल-टाइम डेटा पर टिकी हैं। जवान चिल्लाकर कहते हैं- यह अभ्यास ‘तकनीक की शक्ति से संचालित’ है। अब दुश्मनों के डिजिटल डोमेन में घुसकर मारने की तैयारी चल रही है। तभी स्क्रीन पर दुश्मन के एक काल्पनिक ठिकाने की लोकेशन फ्लैश होती है। कमांड सेंटर से तुरंत आदेश जारी होता है। यह ‘नेटवर्क्ड फायर’ का कमाल है। दुश्मनों के हलचल की जानकारी मिलते ही सीधे अटैक। T-90 ‘भीष्म’ की दहाड़, जमीन पर मोर्चा
सरहद पर रात के बाद सुबह ‘अभ्यास मरु ज्वाला’ शुरू होता है। सूरज की पहली किरण के साथ रेगिस्तान की धरती कांपने लगती है। टी-90 ‘भीष्म’ टैंकों का एक बेड़ा गर्जना करते हुए आगे बढ़ता है। ये सिर्फ टैंक नहीं, ये भारत की आक्रामक शक्ति के प्रतीक हैं। धूल के बड़े-बड़े गुबार हवा में उठते हैं, जिससे दुश्मन के लिए छिपना मुश्किल हो जाता है। सैनिक अपने टैंकों के अंदर हाई-इंटेंसिटी इंटीग्रेटेड मैन्यूवर्स कर रहे हैं। यानी चलते-चलते सटीक निशाना लगाना और दुश्मन के हमले से बचना। उनके पीछे-पीछे बख्तरबंद वाहनों में पैदल सेना भी आगे बढ़ रही है, जो संयुक्त युद्ध की नई रणनीति का हिस्सा है। ब्रह्मोस को तैनात किया
भारत की गौरव ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को उसके लॉन्च व्हीकल (TEL) पर तैनात किया गया। ब्रह्मोस की उपस्थिति ही सीमा पर तनाव बढ़ा देती है। यह दुनिया की सबसे तेज क्रूज मिसाइल है। इसकी तैनाती का मतलब है कि भारत लॉन्ग-रेंज डीप स्ट्राइक के लिए पूरी तरह तैयार है। आसमान से निगरानी और ड्रोन का राज
इस अभ्यास का सबसे खास और नाटकीय तत्व है मानव रहित प्लेटफॉर्म (Unmanned Platforms) यानी ड्रोन। रेतीले टीलों की ओट से हेरॉन और अन्य स्वदेशी यूएवी उड़कर दुश्मन के काल्पनिक इलाके में घुसपैठ करते हैं। ये बिना किसी सैनिक को जोखिम में डाले, दुश्मन के ठिकानों, जमावड़े और रडार सिग्नल को स्कैन करती हैं। एंटी-ड्रोन सिस्टम का ट्रायल
यूएवी द्वारा भेजी गई थर्मल इमेजिंग और हाई-रिजोल्यूशन तस्वीरें सीधे कमांड सेंटर की डिजिटल स्क्रीन पर आती हैं। यह खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) की हाईटेक क्षमता है। साथ ही, सेना अपनी खुद की सुरक्षा के लिए काउंटर-ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक वॉर प्रणालियों का भी ट्रायल कर रही है। ये प्रणालियां दुश्मन के ड्रोनों या संचार को जाम करने (Jam) और उन्हें मार गिराने की क्षमता रखती हैं। तीनों सेनाओं का ‘डिजिटल त्रिशूल’
इस अभ्यास की सफलता का मूलमंत्र है ‘जॉइंटनेस’। थल सेना अकेले नहीं लड़ रही। अभ्यास के दौरान राफेल और सुखोई-30 MKI जैसे लड़ाकू जेट्स ने बहुत कम ऊंचाई पर उड़ान भरकर क्लोज एयर सपोर्ट दिया। ये जेट्स, जमीनी सैनिकों से सीधे संपर्क में रहकर, दुश्मन के ठिकानों को हवाई हमलों से नष्ट कर रहे थे। थल सेना के पैरा कमांडो, नौसेना के मार्कोस और वायु सेना के गरुड़ कमांडो ने मिलकर अंदरूनी घुसपैठ और टारगेट को नष्ट करने का अभ्यास किया। डिजिटल नेटवर्क को मजबूत करने का प्रयास
यह ‘त्रिशूल’ युद्धाभ्यास सिर्फ गोलीबारी का प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारत की रक्षा नीति में बड़े सुधारों का सबूत है। सेना ने खुद को नई तकनीक अपनाने के लिए तैयार किया है। इस अभ्यास से सीमा पर तैनात हर सैनिक को यह संदेश मिल गया है कि वह डिजिटल नेटवर्क से जुड़ा है और उसके पीछे तीनों सेनाओं की अखंड शक्ति खड़ी है। अभ्यास में इस्तेमाल हो रहे हथियार, वाहन और तकनीक
‘त्रिशूल’ युद्धाभ्यास सिर्फ सैनिकों के तालमेल का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह भारत की सैन्य इन्वेंट्री की हाईटेक क्षमता का लाइव ट्रायल है। इस अभ्यास में सदर्न कमांड जिन प्रमुख हथियारों, वाहनों और तकनीकों का उपयोग कर रही है। इन फोटोज में देखिए युद्धाभ्यास की झलकियां… रणभूमि के डिजिटल नेत्र: युद्धाभ्यास में इस्तेमाल हो रहे प्रमुख UAV
भारतीय सेना, वायु सेना और नौसेना द्वारा ‘त्रिशूल’ जैसे युद्धाभ्यास में खुफिया, निगरानी और टोही (ISR) मिशन के लिए इन मानव रहित प्लेटफार्मों पर बहुत अधिक निर्भरता दिखाई देती है। प्रमुख स्वदेशी यूएवी
‘त्रिशूल’ जैसे अभ्यासों में, भारतीय सेना डीआरडीओ (DRDO) द्वारा विकसित स्वदेशी प्लेटफार्मों का परीक्षण करती है, जो आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। इस अभ्यास में जिन प्रमुख ड्रोन का उपयोग किया गया है, उनमें हेरॉन मार्क-2, हेरॉन टीपी, तपस-BH, नेट्रा शामिल हैं। ‘त्रिशूल’ में UAVs की भूमिका (Digital Warfare) ‘त्रिशूल’ में इन UAVs का उपयोग केवल जासूसी तक सीमित नहीं था। ये ‘नेटवर्क्ड फायर’ (Networked Fires) की नई रणनीति में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं: हेरॉन ने उन्नत विदेशी तकनीक दिखाई, जबकि तपस और नेट्रा जैसे स्वदेशी प्लेटफार्मों ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत भारत की बढ़ती घरेलू क्षमताओं को दर्शाया। — सेना के युद्धाभ्यास से जुड़ीं ये खबरें भी पढ़िए…
1. राजस्थान में 28000 फीट की ऊंचाई से मिसाइलें दागीं:रेत के धोरों में गरज रहे टैंक, आर्मी-नेवी और एयरफोर्स ने दुश्मनों के ठिकानों को नेस्तनाबूद किया रेत के धोरों में टैंक गरज रहे हैं। 28 हजार फीट तक की ऊंचाई से लड़ाकू विमानों ने मिसाइलें दागीं। सेना के जांबाज चुन-चुनकर दुश्मन के ठिकानों को नेस्तनाबूद कर रहे हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद तीनों सेनाओं की ये सबसे बड़ी एक्सरसाइज है। पढ़िए पूरी खबर 2. पाकिस्तान बॉर्डर पर आज से गरजेगा ‘त्रिशूल’:भारत की तीनों सेनाओं का सबसे बड़ा संयुक्त युद्धाभ्यास शुरू, पाकिस्तान में नोटम पाकिस्तान से सटी भारत की पश्चिमी सीमा पर युद्ध जैसे हालात का अभ्यास करने के लिए भारतीय सशस्त्र सेनाओं ने गुरुवार 30 अक्टूबर से 11 नवंबर तक 13 दिवसीय मेगा युद्धाभ्यास ‘त्रिशूल’ शुरू कर दिया है। पढ़ें पूरी खबर