राज्य आंदोलन में घायल होकर पिछले 30 साल से व्हीलचेयर पर जीवन बिता रहे अमित ओबेरॉय और प्रकाश कांति के इलाज को लेकर सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज घोषणा की कि अब दोनों का पूरा इलाज राज्य सरकार उठाएगी। इससे पहले बीते कल ही दैनिक भास्कर ऐप ने इन दोनों आंदोलनकारियों की मौजूदा स्थिति को दिखाया था, साथ ही खुलासा किया था कि लंबे समय से अमित ओबेरॉय और प्रकाश कांति की पेंशन उनके रोजमर्रा के खर्च और देखभाल में ही खर्च हो रही है। साथ ही ये भी खुलासा किया था कि आंदोलनकारियों ने बार बार मदद की गुहार लगाई थी लेकिन कोई मदद नहीं मिल रही थी। अमित ओबेरॉय 1995 में मात्र 16 साल की उम्र में राज्य आंदोलन में शामिल हुए थे और पुलिस लाठीचार्ज के दौरान रिस्पना पुल से गिर गए थे, जिससे उनकी रीढ़ की हड्डी गंभीर रूप से चोटिल हो गई। वहीं प्रकाश कांति को 1994 में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोली थी, जिससे उनके शरीर में कमर से नीचे का हिस्सा पैरालाइज हो गया और तब से वह व्हीलचेयर पर जीवन यापन कर रहे हैं। सीएम की घोषणा के बाद आंदोलनकारी और उनके परिजनों का रिएक्शन अब पढ़िए अमित की पूरी कहानी…. 2 अक्टूबर 1995 मूल रूप से देहरादून के ही रहने वाले अमित बताते हैं कि 1995 के उस दौर में देहरादून में अलग राज्य की मांग को लेकर कई प्रदर्शन हो रहे थे, चूंकी 2 अक्टूबर को छुट्टी थी इसलिए उन्होंने भी एक प्रदर्शन में शामिल होने का मन बनाया, प्रदर्शन रिस्पना पुल के आसपास होना था। अमित की उम्र उस समय महज 16 साल की थी, लेकिन मन में अलग राज्य का सपना था, घर से निकलते वक्त अमित की मां ने उन्हें काफी समझाया और इस आंदोलन में शामिल नहीं होने का सुझाव दिया लेकिन अमित ने मां की बात नहीं सुनी और वो घर से निकल गए। अचानक उग्र हुआ आंदोलन, पुलिस ने लाठियां चलाई अमित ओबेरॉय आगे बताते हैं, प्रदर्शन शांतिपूर्वक चल रहा था लेकिन जैसे ही आंदोलनकारियों का काफिला शाम आठ बजे के करीब देहरादून के रिस्पना पुल के पास पहुंचा तो भीड़ उग्र हो गई, जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया, भगदड़ मची तो सब पुल की तरफ से पीछे की तरफ दौड़ने लगे इसी बीच पुलिस ने अमित पर भी खूब लाठी बरसाईं, भगदड़ और बचने की कोशिस में ही अमित फिर पुल से नीचे गिर गए, और सीधा वह पुल के नीचे पड़े पत्थरों पर जा टकराए। इलाज के लिए भी नहीं थे पैसे अमित ओबेरॉय इस पूरी घटना के बारे में बताते हुए कहते हैं- जब मैं गिरा तो 3-4 घंटे तक वहीं दर्द में पड़ा रहा, सब लोग अपनी जान बचाकर भाग रहे थे लेकिन मैं अपने शरीर का कोई हिस्सा हिला तक नहीं पा रहा था हालांकि, कुछ देर बाद कुछ पुलिस वाले आए और उन्होंने ही अमित को उठाकर देहरादून के कोरोनेशन अस्पताल में पहुंचाया। यहां पता चला की उनकी रीढ़ की हड्डी में गहरी चोट लगी है, डॉक्टरों ने फौरन उन्हें चंडीगढ़ के लिए रेफर कर दिया जहां उनके साथ 19 दिनों तक एक पुलिसकर्मी भी साथ रहे। वहीं, अमित की मां बताती हैं कि जब डॉक्टरों ने बेटे को चंडीगढ़ रेफर किया तो उनके पास इलाज तक के पैसे नहीं थे, फिर पड़ोसियों ने 35 हजार रुपए इकट्ठा करके परिवार को दिए। क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित हैं अमित ओबराय डॉक्टरों ने चंडीगढ़ में बहुत कोशिश की लेकिन वो अमित तो फिर से खड़ा नहीं कर पाए, अमित को क्वाड्रिप्लेजिया बिमारी हो चुकी थी, यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें रीढ़ की हड्डी या तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचने के कारण पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो जाता है। उस दिन के बाद आज का दिन है अमित बिस्तर ने ना तो खुद उठ सकते हैं और ना ही अपने हाथों से खाना खा सकते हैं। राज्य अलग बना तो अमित की मां तो उम्मीद हुई की उन्हें सरकार की तरफ से कोई मदद मिलेगी। लेकिन कुछ हुआ नहीं। अमित से मिलने जरूर कई बड़े नेता पहुंचे लेकिन सबसे सिर्फ आश्वासन ही दिया। अमित की मां बताती हैं कि उनके बेटे को 20 हजार रुपए जो पेंशन मिलती है उससे ज्यादा तो उसके इलाज में खर्च हो जाती है। अब अमित की कहानी, जिन्होंने खाई गोली अमित ओबेरॉय के अलावा जो दूसरे शख्स हैं वह हरिद्वार जिले के रुड़की के निवासी प्रकाश कांती हैं जिन्हें 1994 में प्रदर्शन के दौरान रीढ़ की हड्डी में पुलिस की गोली लगी। जिसके कारण उनका कमर से नीचे तक का हिस्सा पैरालाइज हो गया और वह आज तक व्हीलचेयर पर ही अपना जीवन बिता रहे हैं।
राज्य आंदोलन में घायल होकर पिछले 30 साल से व्हीलचेयर पर जीवन बिता रहे अमित ओबेरॉय और प्रकाश कांति के इलाज को लेकर सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज घोषणा की कि अब दोनों का पूरा इलाज राज्य सरकार उठाएगी। इससे पहले बीते कल ही दैनिक भास्कर ऐप ने इन दोनों आंदोलनकारियों की मौजूदा स्थिति को दिखाया था, साथ ही खुलासा किया था कि लंबे समय से अमित ओबेरॉय और प्रकाश कांति की पेंशन उनके रोजमर्रा के खर्च और देखभाल में ही खर्च हो रही है। साथ ही ये भी खुलासा किया था कि आंदोलनकारियों ने बार बार मदद की गुहार लगाई थी लेकिन कोई मदद नहीं मिल रही थी। अमित ओबेरॉय 1995 में मात्र 16 साल की उम्र में राज्य आंदोलन में शामिल हुए थे और पुलिस लाठीचार्ज के दौरान रिस्पना पुल से गिर गए थे, जिससे उनकी रीढ़ की हड्डी गंभीर रूप से चोटिल हो गई। वहीं प्रकाश कांति को 1994 में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोली थी, जिससे उनके शरीर में कमर से नीचे का हिस्सा पैरालाइज हो गया और तब से वह व्हीलचेयर पर जीवन यापन कर रहे हैं। सीएम की घोषणा के बाद आंदोलनकारी और उनके परिजनों का रिएक्शन अब पढ़िए अमित की पूरी कहानी…. 2 अक्टूबर 1995 मूल रूप से देहरादून के ही रहने वाले अमित बताते हैं कि 1995 के उस दौर में देहरादून में अलग राज्य की मांग को लेकर कई प्रदर्शन हो रहे थे, चूंकी 2 अक्टूबर को छुट्टी थी इसलिए उन्होंने भी एक प्रदर्शन में शामिल होने का मन बनाया, प्रदर्शन रिस्पना पुल के आसपास होना था। अमित की उम्र उस समय महज 16 साल की थी, लेकिन मन में अलग राज्य का सपना था, घर से निकलते वक्त अमित की मां ने उन्हें काफी समझाया और इस आंदोलन में शामिल नहीं होने का सुझाव दिया लेकिन अमित ने मां की बात नहीं सुनी और वो घर से निकल गए। अचानक उग्र हुआ आंदोलन, पुलिस ने लाठियां चलाई अमित ओबेरॉय आगे बताते हैं, प्रदर्शन शांतिपूर्वक चल रहा था लेकिन जैसे ही आंदोलनकारियों का काफिला शाम आठ बजे के करीब देहरादून के रिस्पना पुल के पास पहुंचा तो भीड़ उग्र हो गई, जिसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया, भगदड़ मची तो सब पुल की तरफ से पीछे की तरफ दौड़ने लगे इसी बीच पुलिस ने अमित पर भी खूब लाठी बरसाईं, भगदड़ और बचने की कोशिस में ही अमित फिर पुल से नीचे गिर गए, और सीधा वह पुल के नीचे पड़े पत्थरों पर जा टकराए। इलाज के लिए भी नहीं थे पैसे अमित ओबेरॉय इस पूरी घटना के बारे में बताते हुए कहते हैं- जब मैं गिरा तो 3-4 घंटे तक वहीं दर्द में पड़ा रहा, सब लोग अपनी जान बचाकर भाग रहे थे लेकिन मैं अपने शरीर का कोई हिस्सा हिला तक नहीं पा रहा था हालांकि, कुछ देर बाद कुछ पुलिस वाले आए और उन्होंने ही अमित को उठाकर देहरादून के कोरोनेशन अस्पताल में पहुंचाया। यहां पता चला की उनकी रीढ़ की हड्डी में गहरी चोट लगी है, डॉक्टरों ने फौरन उन्हें चंडीगढ़ के लिए रेफर कर दिया जहां उनके साथ 19 दिनों तक एक पुलिसकर्मी भी साथ रहे। वहीं, अमित की मां बताती हैं कि जब डॉक्टरों ने बेटे को चंडीगढ़ रेफर किया तो उनके पास इलाज तक के पैसे नहीं थे, फिर पड़ोसियों ने 35 हजार रुपए इकट्ठा करके परिवार को दिए। क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित हैं अमित ओबराय डॉक्टरों ने चंडीगढ़ में बहुत कोशिश की लेकिन वो अमित तो फिर से खड़ा नहीं कर पाए, अमित को क्वाड्रिप्लेजिया बिमारी हो चुकी थी, यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें रीढ़ की हड्डी या तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचने के कारण पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो जाता है। उस दिन के बाद आज का दिन है अमित बिस्तर ने ना तो खुद उठ सकते हैं और ना ही अपने हाथों से खाना खा सकते हैं। राज्य अलग बना तो अमित की मां तो उम्मीद हुई की उन्हें सरकार की तरफ से कोई मदद मिलेगी। लेकिन कुछ हुआ नहीं। अमित से मिलने जरूर कई बड़े नेता पहुंचे लेकिन सबसे सिर्फ आश्वासन ही दिया। अमित की मां बताती हैं कि उनके बेटे को 20 हजार रुपए जो पेंशन मिलती है उससे ज्यादा तो उसके इलाज में खर्च हो जाती है। अब अमित की कहानी, जिन्होंने खाई गोली अमित ओबेरॉय के अलावा जो दूसरे शख्स हैं वह हरिद्वार जिले के रुड़की के निवासी प्रकाश कांती हैं जिन्हें 1994 में प्रदर्शन के दौरान रीढ़ की हड्डी में पुलिस की गोली लगी। जिसके कारण उनका कमर से नीचे तक का हिस्सा पैरालाइज हो गया और वह आज तक व्हीलचेयर पर ही अपना जीवन बिता रहे हैं।