एक महिला दूसरी महिला से कहती है- वो हमारे घर के आंगन में खेलता था। एक दिन उसे थोड़ी सर्दी खांसी थी। मौसम बदलता है तो बच्चों को हो ही जाती है, फिर पता चला कि वो नागपुर में भर्ती है। उसके बाद तो वो जिंदा नहीं लौटा। हम तो हैरान थे। ये सुनकर दूसरी महिला कहती है, मेरे घर के पास भी एक बच्चे को उसके माता-पिता डॉक्टर के पास ले गए। सरकारी अस्पताल पर भरोसा नहीं है इसलिए प्राइवेट में 300 रुपए देकर बच्चे को दिखाया। डॉक्टर ने पर्चे में ऐसी दवा लिखी कि उसे उल्टी होने लगी। उसको वो नागपुर ले गए, फिर वो लौटा ही नहीं। ये बातचीत छिंदवाड़ा जिले के परासिया में एक शेयरिंग ऑटो में सवार दो महिलाओं के बीच की है। इस ऑटो में सवार बाकी महिलाओं के बीच बातचीत का टॉपिक भी बच्चों की मौत ही है। भास्कर रिपोर्टर भी इसी ऑटो में सवार है। दरअसल, इस समय परासिया में हर कोई केवल कफ सिरप पीने से हुई बच्चों की मौत की ही बात कर रहा है। सरकार ने इस पूरे मामले में जांच के आदेश दिए हैं। जिम्मेदारों पर कार्रवाई की है। इस पर राजनीति भी हो गई है, लेकिन बच्चों की मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। अब तक 19 बच्चों की मौत हो चुकी है। भास्कर ने छिंदवाड़ा के परासिया जाकर इनमें से 5 पीड़ित परिवारों से बात की तो एक मां ने भास्कर रिपोर्टर से उल्टा सवाल किया- मौत की दवा मेरे बच्चे के हिस्से में ही क्यों आई? इसका जवाब किसी भी जिम्मेदार के पास नहीं है। पढ़िए, रिपोर्ट… जानलेवा कोल्ड्रिफ से तीन दिन में हालत बिगड़ी
परासिया के पास न्यूटन में रहने वाले आमीन खान के 5 साल 8 महीने के बेटे अदनान को 21 अगस्त को बुखार आया था। उसी दिन उसे माता-पिता डॉ. प्रवीण सोनी के पास ले गए। डॉ. सोनी ने मौत की सिरप कोल्ड्रिफ प्रिस्क्राइब की। जिसने तीन दिन बाद ही अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। अदनान को 24 अगस्त को दोबारा बुखार आ गया था। बुखार उतरता न देख अदनान की मां को चिंता हुई। वह उसे 25 अगस्त को दोबारा डॉ. प्रवीण सोनी के पास ले गई, लेकिन 27 तारीख तक उसकी हालत बेहद खराब हो गई। उसे पेट दर्द और उल्टी होने लगी। इसके बाद तो परिजन घबरा गए और दोबारा डॉक्टर के पास गए। इस बार डॉक्टर ने पेशाब की जांच के लिए शीशी दी तो अदनान दो बूंद भी पेशाब नहीं कर पाया। इसके बाद परिजन अदनान को लेकर छिंदवाड़ा जिला अस्पताल से लेकर नागपुर के अस्पतालों में भटकते रहे। परिवार ने कर्ज लेकर उसके इलाज में 7 लाख रुपए खर्च कर दिए। एम्स में बेड पाने के लिए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की सिफारिशी चिट्ठी भी लिखवा ली लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। चाचा बोले- रात दो बजे मुझसे फ्रूटी मांगता था
अदनान के चाचा तहसीन खान कहते हैं, ‘मैं पूरे 11 दिन भतीजे के साथ अस्पताल में रहा। रात दो बजे वो मुझसे कहता कि मुझे फ्रूटी पीनी है। मैं कहता कि सुबह दुकान खुलेगी तो पीएंगे। मैं उसे दो घूंट पानी पिला देता था। 7 सितंबर को जिस दिन उसने आखिरी सांस ली, मैं वहीं पर मौजूद था। मैं उसके जिस्म से जुड़े उस मॉनिटर को देख रहा था। उसकी सांसें उखड़ रही थीं और मॉनिटर तेजी से आवाज करने लगा था। मैं तत्काल ही डॉक्टरों के पास गया। डॉक्टरों ने मुझे बाहर भेज दिया और उसे सीपीआर (कार्डियो-पल्मोनरी रिससिटेशन) देने लगे, यानी उसके हार्ट ने काम करना बंद कर दिया था। मैं सबकुछ देख रहा था। अपने बच्चे को तड़पते देखा है मैंने। डॉक्टरों ने खूब कोशिश की, लेकिन थोड़ी देर बाद बाहर आए और बोले- अदनान नहीं रहा। आईसीयू में भर्ती रहा, लेकिन हालत नहीं सुधरी
परासिया के ही न्यूटन में रहने वाला 4 साल का उसेद नर्सरी में पढ़ता था। उसे 25 अगस्त को बुखार आया। परिजन उसे परासिया के ही डॉ. अमन सिद्दीकी के पास ले गए। डॉ. अमन एमबीबीएस डॉक्टर हैं और डॉ. प्रवीण सोनी के ही क्लिनिक में मरीजों को देखते हैं। डॉ. सिद्दीकी ने उसेद के लिए दवाएं लिखीं, उसमें खांसी के लिए कोल्ड्रिफ सिरप भी लिखा था। परिजन दवाएं लेकर घर आ गए। उसेद का बुखार तो उतर गया लेकिन चेहरे और पैरों पर सूजन आ गई। परिजन बताते हैं कि 6 सितंबर को उसकी पेशाब भी रुक गई। उसे पहले परासिया सिविल अस्पताल ले गए। वहां से जब कोई राहत नहीं मिली तो उसे छिंदवाड़ा जिला अस्पताल ले गए। वहां वो आईसीयू में भर्ती रहा, लेकिन उसके बाद भी उसकी हालत में सुधार नहीं आया। जिला अस्पताल के डॉक्टरों ने उसे नागपुर रेफर किया। पिता ने बेटे के इलाज के लिए ऑटो बेचा
नागपुर के मेट्रो अस्पताल में उसेद की सोनोग्राफी हुई। जिसमें पता चला कि उसकी दोनों किडनियां ही फेल हो चुकी हैं। उसका 3 बार डायलिसिस किया गया। इसी के साथ उसके ब्रेन की नसों में भी सूजन आ गई। डॉक्टर इलाज करते रहे, लेकिन 13 सितंबर को उसेद की उम्मीदों ने दम तोड़ दिया। वह परिजन को रोता-बिलखता इस दुनिया से रुखसत हो गया। पिता यासीन ने बेटे के इलाज के लिए लोन पर लिया अपना ऑटो बेच दिया। जब वे बेटे के साथ नागपुर में थे तो उनके घर में पानी भर गया। पूरा सामान खराब हो गया था। 3 साल की विधि मां से कहती रही- मुझे घर ले चलो
विधि परासिया के बेलगांव के रहने वाले महेश और नमिता डहेरिया की इकलौती बेटी थी। विधि को भी सर्दी-खांसी की शिकायत हुई। 1 सितंबर को उसे डॉ. प्रवीण सोनी को दिखाया। डॉ. सोनी ने वही जानलेवा कफ सिरप प्रिस्क्राइब की, जो वो सभी मरीजों को कर रहे थे। मां नमिता बताती हैं कि उसे दिन में चार बार ये दवा देने के लिए कहा था। मैंने डॉक्टर के मुताबिक ही उसे दवा का डोज दिया। विधि पर दवा का असर बेहद तेजी से हुआ। मां नमिता बताती हैं कि दवा देने के दूसरे-तीसरे दिन उसने पेशाब करना बंद कर दिया था। उसकी ऐसी हालत को देखते हुए हम लोग फिर डॉक्टर के पास गए तो उन्होंने उसे डॉ. नाहर के पास जाने को कहा। डॉ. नाहर ने कहा कि नागपुर लेकर जाओ। हमारा इतना बजट नहीं था कि उसे नागपुर ले जाते। उसे हम जिला अस्पताल ले गए। पिता बोले- मैंने बच्ची को बचाने की पूरी कोशिश की
विधि के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। वे कहते हैं कि विधि को जिला अस्पताल ले गए तो वहां से उसे नागपुर मेडिकल कॉलेज रेफर किया। तब मैंने अपने भाइयों से पैसे लेकर नागपुर जाने का इंतजाम किया। लेकिन नागपुर पहुंचने तक उसकी हालत बहुत ही ज्यादा खराब हो चुकी थी। 5 सितंबर को उसने नागपुर मेडिकल कॉलेज में दम तोड़ दिया। उनसे पूछा कि विधि के इलाज में कितना पैसा खर्च हुआ? तो पति-पत्नी ने बहुत ही साफ मन से कहा कि हमारे पास ज्यादा पैसे नहीं थे। हम अपनी बच्ची को बचाने के लिए जितनी कोशिश कर सकते थे, उतनी कोशिश हमने की। हमारे रिश्तेदारों ने जितना पैसा हमें दिया था, उतना पैसा ही हम खर्च कर सके। दिव्यांश का सात बार डायलिसिस हुआ
परासिया से 18 किलोमीटर दूर दुड्डी गांव का रहने वाला दिव्यांश मां-पिता का इकलौता बेटा था। तीसरी क्लास में पढ़ता था। पिता प्रकाश कहते हैं कि 16 अगस्त को बुखार आया तो उसे 17 तारीख को डॉ. प्रवीण सोनी के यहां लेकर आए। उन्होंने सिरप-टैबलेट दी, लेकिन कोई आराम नहीं हुआ। 20 तारीख को फिर डॉ. सोनी को दिखाया। उन्होंने 20 अगस्त को फिर से कोल्ड्रिफ सिरप दी और इसका डोज बढ़ाने को बोला। हमने 21 और 22 अगस्त को को दिन तक उसे दवा पिलाई। इसके बाद रात 12 बजे से वह उल्टियां करने लगा। हम लोग 23 अगस्त को उसे सीधे छिंदवाड़ा लेकर गए। यहां विवांता अस्पताल में भर्ती कर दिया। रात भर इलाज चला। बॉटल लगी, इंजेक्शन लगे। 24 अगस्त की सुबह से उसने पेशाब करना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने हमे बताया कि उसकी किडनी में इन्फेक्शन हो सकता है। उन्होंने नागपुर रेफर कर दिया। वहां के कलर्स अस्पताल में उसे एडमिट किया। डॉक्टरों ने सोनोग्राफी की और बताया कि दोनों किडनी ने काम करना बंद कर दिया है। वह चार दिन तक होश में रहा। इस दौरान सात बार उसका डायलिसिस हुआ। मां ने बेटे के इलाज में सारे जेवर बेच दिए
दिव्यांश की मां लीमा ने कहा- इसके बाद वह बेहोश हुआ तो उसे वेंटिलेटर पर रखा। हमारा जब पूरा पैसा खर्च हो गया तो कलर्स अस्पताल वालों ने सरकारी मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। वहां पहुंचने से पहले ही दिव्यांश की सांसें थम गईं। 1 सितंबर को उसकी मौत हो गई। हम उसे वापस लाए और 3 सितंबर को उसका अंतिम संस्कार कर दिया। लीमा अपने सूने कान दिखाते हुए कहती हैं कि बेटे के इलाज के लिए शादी में मिले पूरे जेवर बेच दिए। रिश्तेदारों के जेवर गिरवी रख दिए। बच्चा बच जाए इसलिए सारी कोशिश की, लेकिन हम उसे बचा नहीं पाए। इसके बाद वह रोने लगती हैं। कहती हैं कि मेरा बच्चा इस मौत की सिरप का सबसे पहला शिकार है। हम लोगों को न्यूज देखकर पता चला कि कोल्ड्रिफ सिरप से ही बच्चों की जान गई है। दिव्यांश का नाम छिंदवाड़ा प्रशासन की उस लिस्ट में शामिल नहीं था, जिसमें कफ सिरप से मरने वाले बच्चों को मुआवजा दिया जा रहा है। हेतांश को पेशाब हुई लेकिन वो कोमा में चला गया
उमरेठ में रहने वाले 4 साल के हेतांश के पिता अमित सोनी कहते हैं कि 29 अगस्त को उसे बुखार आया था। मैं उसे उसी दिन डॉ. प्रवीण सोनी के पास ले गया। उन्होंने दवाएं दीं। 30 अगस्त को उसे उल्टी होने लगी। उसी दिन मैं फिर डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने उसे पेशाब करने की सिरप भी दी। डॉक्टर ने पूछा कि पेशाब कैसी हो रही है? हमने इस तरफ ध्यान नहीं दिया था। जब हमने देखा कि उसने रात तक पेशाब नहीं की तो हम सीधे ही उसे नागपुर लेकर गए। हमें किसी ने बताया नहीं था और न ही रेफर किया था। वहां न्यू एरा चाइल्ड अस्पताल में उसे एडमिट कराया। वह 2 सितंबर से 18 सितंबर तक उसी अस्पताल में भर्ती रहा। 13-14 बार उसका डायलिसिस हुआ। इस दौरान वो ठीक होने लगा था। उसने फिर से पेशाब करना शुरू कर दिया था। 13 तारीख तक वो रिस्पॉन्स दे रहा था, लेकिन उसके बाद उसने रिस्पॉन्स देना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने कहा कि उसके ब्रेन में सूजन है। इसके बाद वो कोमा में चला गया और फिर वापस नहीं लौटा। —————————– ये खबर भी पढ़ें… तमिलनाडु की कंपनी ने खरीदा था 100kg जहरीला केमिकल मध्यप्रदेश में कफ सिरप से छिंदवाड़ा, बैतूल, नागपुर और पांढुर्णा में अब तक 19 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस बीच कोल्ड्रिफ सिरप की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। तमिलनाडु डायरेक्टर ऑफ ड्रग्स कंट्रोल की रिपोर्ट में सामने आया है कि यह सिरप नॉन फार्मास्यूटिकल ग्रेड केमिकल से तैयार किया गया था। पढ़ें पूरी खबर…
एक महिला दूसरी महिला से कहती है- वो हमारे घर के आंगन में खेलता था। एक दिन उसे थोड़ी सर्दी खांसी थी। मौसम बदलता है तो बच्चों को हो ही जाती है, फिर पता चला कि वो नागपुर में भर्ती है। उसके बाद तो वो जिंदा नहीं लौटा। हम तो हैरान थे। ये सुनकर दूसरी महिला कहती है, मेरे घर के पास भी एक बच्चे को उसके माता-पिता डॉक्टर के पास ले गए। सरकारी अस्पताल पर भरोसा नहीं है इसलिए प्राइवेट में 300 रुपए देकर बच्चे को दिखाया। डॉक्टर ने पर्चे में ऐसी दवा लिखी कि उसे उल्टी होने लगी। उसको वो नागपुर ले गए, फिर वो लौटा ही नहीं। ये बातचीत छिंदवाड़ा जिले के परासिया में एक शेयरिंग ऑटो में सवार दो महिलाओं के बीच की है। इस ऑटो में सवार बाकी महिलाओं के बीच बातचीत का टॉपिक भी बच्चों की मौत ही है। भास्कर रिपोर्टर भी इसी ऑटो में सवार है। दरअसल, इस समय परासिया में हर कोई केवल कफ सिरप पीने से हुई बच्चों की मौत की ही बात कर रहा है। सरकार ने इस पूरे मामले में जांच के आदेश दिए हैं। जिम्मेदारों पर कार्रवाई की है। इस पर राजनीति भी हो गई है, लेकिन बच्चों की मौत का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। अब तक 19 बच्चों की मौत हो चुकी है। भास्कर ने छिंदवाड़ा के परासिया जाकर इनमें से 5 पीड़ित परिवारों से बात की तो एक मां ने भास्कर रिपोर्टर से उल्टा सवाल किया- मौत की दवा मेरे बच्चे के हिस्से में ही क्यों आई? इसका जवाब किसी भी जिम्मेदार के पास नहीं है। पढ़िए, रिपोर्ट… जानलेवा कोल्ड्रिफ से तीन दिन में हालत बिगड़ी
परासिया के पास न्यूटन में रहने वाले आमीन खान के 5 साल 8 महीने के बेटे अदनान को 21 अगस्त को बुखार आया था। उसी दिन उसे माता-पिता डॉ. प्रवीण सोनी के पास ले गए। डॉ. सोनी ने मौत की सिरप कोल्ड्रिफ प्रिस्क्राइब की। जिसने तीन दिन बाद ही अपना असर दिखाना शुरू कर दिया। अदनान को 24 अगस्त को दोबारा बुखार आ गया था। बुखार उतरता न देख अदनान की मां को चिंता हुई। वह उसे 25 अगस्त को दोबारा डॉ. प्रवीण सोनी के पास ले गई, लेकिन 27 तारीख तक उसकी हालत बेहद खराब हो गई। उसे पेट दर्द और उल्टी होने लगी। इसके बाद तो परिजन घबरा गए और दोबारा डॉक्टर के पास गए। इस बार डॉक्टर ने पेशाब की जांच के लिए शीशी दी तो अदनान दो बूंद भी पेशाब नहीं कर पाया। इसके बाद परिजन अदनान को लेकर छिंदवाड़ा जिला अस्पताल से लेकर नागपुर के अस्पतालों में भटकते रहे। परिवार ने कर्ज लेकर उसके इलाज में 7 लाख रुपए खर्च कर दिए। एम्स में बेड पाने के लिए केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की सिफारिशी चिट्ठी भी लिखवा ली लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। चाचा बोले- रात दो बजे मुझसे फ्रूटी मांगता था
अदनान के चाचा तहसीन खान कहते हैं, ‘मैं पूरे 11 दिन भतीजे के साथ अस्पताल में रहा। रात दो बजे वो मुझसे कहता कि मुझे फ्रूटी पीनी है। मैं कहता कि सुबह दुकान खुलेगी तो पीएंगे। मैं उसे दो घूंट पानी पिला देता था। 7 सितंबर को जिस दिन उसने आखिरी सांस ली, मैं वहीं पर मौजूद था। मैं उसके जिस्म से जुड़े उस मॉनिटर को देख रहा था। उसकी सांसें उखड़ रही थीं और मॉनिटर तेजी से आवाज करने लगा था। मैं तत्काल ही डॉक्टरों के पास गया। डॉक्टरों ने मुझे बाहर भेज दिया और उसे सीपीआर (कार्डियो-पल्मोनरी रिससिटेशन) देने लगे, यानी उसके हार्ट ने काम करना बंद कर दिया था। मैं सबकुछ देख रहा था। अपने बच्चे को तड़पते देखा है मैंने। डॉक्टरों ने खूब कोशिश की, लेकिन थोड़ी देर बाद बाहर आए और बोले- अदनान नहीं रहा। आईसीयू में भर्ती रहा, लेकिन हालत नहीं सुधरी
परासिया के ही न्यूटन में रहने वाला 4 साल का उसेद नर्सरी में पढ़ता था। उसे 25 अगस्त को बुखार आया। परिजन उसे परासिया के ही डॉ. अमन सिद्दीकी के पास ले गए। डॉ. अमन एमबीबीएस डॉक्टर हैं और डॉ. प्रवीण सोनी के ही क्लिनिक में मरीजों को देखते हैं। डॉ. सिद्दीकी ने उसेद के लिए दवाएं लिखीं, उसमें खांसी के लिए कोल्ड्रिफ सिरप भी लिखा था। परिजन दवाएं लेकर घर आ गए। उसेद का बुखार तो उतर गया लेकिन चेहरे और पैरों पर सूजन आ गई। परिजन बताते हैं कि 6 सितंबर को उसकी पेशाब भी रुक गई। उसे पहले परासिया सिविल अस्पताल ले गए। वहां से जब कोई राहत नहीं मिली तो उसे छिंदवाड़ा जिला अस्पताल ले गए। वहां वो आईसीयू में भर्ती रहा, लेकिन उसके बाद भी उसकी हालत में सुधार नहीं आया। जिला अस्पताल के डॉक्टरों ने उसे नागपुर रेफर किया। पिता ने बेटे के इलाज के लिए ऑटो बेचा
नागपुर के मेट्रो अस्पताल में उसेद की सोनोग्राफी हुई। जिसमें पता चला कि उसकी दोनों किडनियां ही फेल हो चुकी हैं। उसका 3 बार डायलिसिस किया गया। इसी के साथ उसके ब्रेन की नसों में भी सूजन आ गई। डॉक्टर इलाज करते रहे, लेकिन 13 सितंबर को उसेद की उम्मीदों ने दम तोड़ दिया। वह परिजन को रोता-बिलखता इस दुनिया से रुखसत हो गया। पिता यासीन ने बेटे के इलाज के लिए लोन पर लिया अपना ऑटो बेच दिया। जब वे बेटे के साथ नागपुर में थे तो उनके घर में पानी भर गया। पूरा सामान खराब हो गया था। 3 साल की विधि मां से कहती रही- मुझे घर ले चलो
विधि परासिया के बेलगांव के रहने वाले महेश और नमिता डहेरिया की इकलौती बेटी थी। विधि को भी सर्दी-खांसी की शिकायत हुई। 1 सितंबर को उसे डॉ. प्रवीण सोनी को दिखाया। डॉ. सोनी ने वही जानलेवा कफ सिरप प्रिस्क्राइब की, जो वो सभी मरीजों को कर रहे थे। मां नमिता बताती हैं कि उसे दिन में चार बार ये दवा देने के लिए कहा था। मैंने डॉक्टर के मुताबिक ही उसे दवा का डोज दिया। विधि पर दवा का असर बेहद तेजी से हुआ। मां नमिता बताती हैं कि दवा देने के दूसरे-तीसरे दिन उसने पेशाब करना बंद कर दिया था। उसकी ऐसी हालत को देखते हुए हम लोग फिर डॉक्टर के पास गए तो उन्होंने उसे डॉ. नाहर के पास जाने को कहा। डॉ. नाहर ने कहा कि नागपुर लेकर जाओ। हमारा इतना बजट नहीं था कि उसे नागपुर ले जाते। उसे हम जिला अस्पताल ले गए। पिता बोले- मैंने बच्ची को बचाने की पूरी कोशिश की
विधि के पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। वे कहते हैं कि विधि को जिला अस्पताल ले गए तो वहां से उसे नागपुर मेडिकल कॉलेज रेफर किया। तब मैंने अपने भाइयों से पैसे लेकर नागपुर जाने का इंतजाम किया। लेकिन नागपुर पहुंचने तक उसकी हालत बहुत ही ज्यादा खराब हो चुकी थी। 5 सितंबर को उसने नागपुर मेडिकल कॉलेज में दम तोड़ दिया। उनसे पूछा कि विधि के इलाज में कितना पैसा खर्च हुआ? तो पति-पत्नी ने बहुत ही साफ मन से कहा कि हमारे पास ज्यादा पैसे नहीं थे। हम अपनी बच्ची को बचाने के लिए जितनी कोशिश कर सकते थे, उतनी कोशिश हमने की। हमारे रिश्तेदारों ने जितना पैसा हमें दिया था, उतना पैसा ही हम खर्च कर सके। दिव्यांश का सात बार डायलिसिस हुआ
परासिया से 18 किलोमीटर दूर दुड्डी गांव का रहने वाला दिव्यांश मां-पिता का इकलौता बेटा था। तीसरी क्लास में पढ़ता था। पिता प्रकाश कहते हैं कि 16 अगस्त को बुखार आया तो उसे 17 तारीख को डॉ. प्रवीण सोनी के यहां लेकर आए। उन्होंने सिरप-टैबलेट दी, लेकिन कोई आराम नहीं हुआ। 20 तारीख को फिर डॉ. सोनी को दिखाया। उन्होंने 20 अगस्त को फिर से कोल्ड्रिफ सिरप दी और इसका डोज बढ़ाने को बोला। हमने 21 और 22 अगस्त को को दिन तक उसे दवा पिलाई। इसके बाद रात 12 बजे से वह उल्टियां करने लगा। हम लोग 23 अगस्त को उसे सीधे छिंदवाड़ा लेकर गए। यहां विवांता अस्पताल में भर्ती कर दिया। रात भर इलाज चला। बॉटल लगी, इंजेक्शन लगे। 24 अगस्त की सुबह से उसने पेशाब करना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने हमे बताया कि उसकी किडनी में इन्फेक्शन हो सकता है। उन्होंने नागपुर रेफर कर दिया। वहां के कलर्स अस्पताल में उसे एडमिट किया। डॉक्टरों ने सोनोग्राफी की और बताया कि दोनों किडनी ने काम करना बंद कर दिया है। वह चार दिन तक होश में रहा। इस दौरान सात बार उसका डायलिसिस हुआ। मां ने बेटे के इलाज में सारे जेवर बेच दिए
दिव्यांश की मां लीमा ने कहा- इसके बाद वह बेहोश हुआ तो उसे वेंटिलेटर पर रखा। हमारा जब पूरा पैसा खर्च हो गया तो कलर्स अस्पताल वालों ने सरकारी मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया। वहां पहुंचने से पहले ही दिव्यांश की सांसें थम गईं। 1 सितंबर को उसकी मौत हो गई। हम उसे वापस लाए और 3 सितंबर को उसका अंतिम संस्कार कर दिया। लीमा अपने सूने कान दिखाते हुए कहती हैं कि बेटे के इलाज के लिए शादी में मिले पूरे जेवर बेच दिए। रिश्तेदारों के जेवर गिरवी रख दिए। बच्चा बच जाए इसलिए सारी कोशिश की, लेकिन हम उसे बचा नहीं पाए। इसके बाद वह रोने लगती हैं। कहती हैं कि मेरा बच्चा इस मौत की सिरप का सबसे पहला शिकार है। हम लोगों को न्यूज देखकर पता चला कि कोल्ड्रिफ सिरप से ही बच्चों की जान गई है। दिव्यांश का नाम छिंदवाड़ा प्रशासन की उस लिस्ट में शामिल नहीं था, जिसमें कफ सिरप से मरने वाले बच्चों को मुआवजा दिया जा रहा है। हेतांश को पेशाब हुई लेकिन वो कोमा में चला गया
उमरेठ में रहने वाले 4 साल के हेतांश के पिता अमित सोनी कहते हैं कि 29 अगस्त को उसे बुखार आया था। मैं उसे उसी दिन डॉ. प्रवीण सोनी के पास ले गया। उन्होंने दवाएं दीं। 30 अगस्त को उसे उल्टी होने लगी। उसी दिन मैं फिर डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने उसे पेशाब करने की सिरप भी दी। डॉक्टर ने पूछा कि पेशाब कैसी हो रही है? हमने इस तरफ ध्यान नहीं दिया था। जब हमने देखा कि उसने रात तक पेशाब नहीं की तो हम सीधे ही उसे नागपुर लेकर गए। हमें किसी ने बताया नहीं था और न ही रेफर किया था। वहां न्यू एरा चाइल्ड अस्पताल में उसे एडमिट कराया। वह 2 सितंबर से 18 सितंबर तक उसी अस्पताल में भर्ती रहा। 13-14 बार उसका डायलिसिस हुआ। इस दौरान वो ठीक होने लगा था। उसने फिर से पेशाब करना शुरू कर दिया था। 13 तारीख तक वो रिस्पॉन्स दे रहा था, लेकिन उसके बाद उसने रिस्पॉन्स देना बंद कर दिया। डॉक्टरों ने कहा कि उसके ब्रेन में सूजन है। इसके बाद वो कोमा में चला गया और फिर वापस नहीं लौटा। —————————– ये खबर भी पढ़ें… तमिलनाडु की कंपनी ने खरीदा था 100kg जहरीला केमिकल मध्यप्रदेश में कफ सिरप से छिंदवाड़ा, बैतूल, नागपुर और पांढुर्णा में अब तक 19 बच्चों की मौत हो चुकी है। इस बीच कोल्ड्रिफ सिरप की जांच में बड़ा खुलासा हुआ है। तमिलनाडु डायरेक्टर ऑफ ड्रग्स कंट्रोल की रिपोर्ट में सामने आया है कि यह सिरप नॉन फार्मास्यूटिकल ग्रेड केमिकल से तैयार किया गया था। पढ़ें पूरी खबर…