असम के सत्रिया नृत्य को भारतीय शास्त्रीय नृत्यशैली का दर्जा मिले सितंबर में 5 पांच साल हो रहे हैं। प्रसिद्ध असमिया कलाकार डॉ. भूपेन हजारिका ने सत्रिया नृत्य को भारतीय शास्त्रीय नृत्यशैली का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। असम की सांस्कृतिक विरासत के लिए यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। लेखक और गीतकार सदानंद गोगोई ने हजारिका की संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति से लेकर सत्रिया नृत्य की मान्यता दिलाने तक की कहानी बताई। राष्ट्रपति नारायणन ने हजारिका से कहा था- आपको दिल्ली आना है साल 1994, तारीख 9 नवम्बर। श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र चहल–पहल से भरा था। छह वर्षों के असम आंदोलन के समझौते के बाद श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र पांजाबारी में निर्मित हुआ था। राज्य में प्रफुल्ल महंत के नेतृत्व वाली अगप सरकार थी। उस दिन कलाक्षेत्र का उद्घाटन करने के लिए भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के आर. नारायणन आए थे। असम के चिरप्राण डॉ. भूपेन हजारिका राज्य सरकार के आमंत्रण पर इस कार्यक्रम के विशेष अतिथि थे। डॉ. हजारिका ने उसी अनुष्ठान के अनुरूप एक गीत की रचना की और उसे संगीत देकर गाया। वह गीत मानो उनका ही मुख्य भाषण था। राष्ट्रपति केआर. नारायणन मंत्रमुग्ध होकर उस अद्वितीय स्वर को सुनते रहे और भूपेन दा के गीत में असम की विविध संस्कृति और महापुरुषों की रचनाधारा की झलक को देखा। कार्यक्रम के समाप्त होते ही राष्ट्रपति ने उन्हें प्रणाम किया और कहा – “Dr. Hazarika, you will come to Delhi.” डॉ. हजारिका को उस समय समझ नहीं आया कि उन्हें दिल्ली क्यों जाना होगा। (हालांकि वे अधिक देर तक सोचने वाले व्यक्ति भी नहीं थे।) जल्दी फोन दीजिए, राष्ट्रपति बात करेंगे कुछ ही दिनों बाद की बात है। डॉ. हजारिका दोपहर का भोजन करके अपने निजरापार स्थित घर में आराम कर रहे थे। तभी फोन की घंटी बजी। दूसरे कमरे में उनके भतीजे संदीप (टटो) ने रिसीवर उठाया। दूसरी ओर से आवाज आई, ‘डॉ. हजारिका को दीजिए, राष्ट्रपति बात करेंगे।’ टटो ने उत्तर दिया, ‘वे अभी भोजन के बाद आराम कर रहे हैं, थोड़ी देर में फोन कीजिएगा।’ सामने से उत्तर आया, ‘जल्दी फोन दीजिए, भारत के राष्ट्रपति बात करेंगे।’ टटो दौड़कर कमरे में आया और कहा – ‘बरदेउता (ताऊजी)! फोन उठाइए, भारत के राष्ट्रपति बात करेंगे।’ तुरंत ही उन्होंने फोन उठाया। दूसरी ओर से राष्ट्रपति नारायण ने (अंग्रेज़ी में) कहा. ‘डॉ. हजारिका मैंने संगीत नाटक अकादेमी के अध्यक्ष पद के लिए आपके नाम को मंजूरी दे दी है। जल्द ही आप कार्यभार ग्रहण कीजिए।’ टेलीफोन वार्ता धन्यवाद और शुभकामनाओं के साथ समाप्त हुई। कुछ दिनों बाद भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव ने इस लेखक (सदानंद गोगोई) के मोबाइल पर फोन कर कहा कि डॉ. हजारिका का फैक्स नंबर चाहिए। चूंकि उनके घर पर फैक्स मशीन नहीं थी, इसलिए मैंने अपना नंबर दे दिया। आधे घंटे के भीतर फैक्स पर नियुक्ति पत्र आ गया। संयुक्त सचिव ने फिर फोन कर कहा कि आज ही पदभार ग्रहण पत्र वापस भेजना होगा। मैंने डॉ. हजारिका से हस्ताक्षर कराकर अनुमति पत्र उसी नंबर पर फैक्स कर दिया। अध्यक्ष बनके उन्होंने काम संभालते ही सत्रिया, कड़ुवत्तम और झऊ नृत्य को शास्त्रीय नृत्यशैली के रूप में मान्यता दिलाने के कार्य में पूरी ऊर्जा लगा दी। डॉ. हजारिका की उम्र अधिक होने के कारण उन्हें एक सहयोगी मिलते था। उन्होंने मुझे ही अपना साथी बना लिया। इसीलिए संगीत नाटक अकादमी के खर्च पर उनकी अधिकतर बैठकों में मुझे भी अनौपचारिक रूप से साथ रहने का अवसर मिला था। मेरे लिए यह परम सौभाग्य की बात थी कि भूपेन दा की वजह से मैं भारत के महान शास्त्रीय संगीतकारों और कलाकारों से निकटता से मिल पाया। 1998 को, डॉ. हजारिका ने सत्रिया नृत्य शैली को राष्ट्रीय मान्यता दिलाने का प्रस्ताव रखा
सत्रिया नृत्य और संगीत शैली को भारतीय शास्त्रीय संगीत की मान्यता दिलाने का प्रयास सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. महेश्वर नेउग ने किया था, लेकिन किसी अज्ञात कारणवश यह पूरा नहीं हो पाया। परंतु डॉ. भूपेन हजारिका ने इस महान कार्य को अपने कार्यकाल में पूरा करने का उत्तरदायित्व लिया। कार्यभार संभालने के मात्र तीन दिन बाद, अर्थात् 11 दिसम्बर 1998 को, अकादमी की सामान्य सभा में डॉ. हजारिका ने सत्रिया नृत्य शैली को राष्ट्रीय मान्यता दिलाने का प्रस्ताव रखा। इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई, जिसका कार्य सत्रिया संस्कृति पर एक विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करना था। समिति के सदस्य थे- प्रदीप ज्योति महंत (अध्यक्ष), उस समय असम सरकार के सांस्कृतिक विभाग के आयुक्त सचिव हिमांशु शेखर दास, नृत्याचार्य जतिन गोस्वामी, नवकमल भूइयां और डॉ. जगन्नाथ महंत। इस शीर्ष समिति ने समय से पूर्व ही असम सरकार के सांस्कृतिक विभाग के माध्यम से प्रतिवेदन अकादमी को सौंपा। अध्यक्ष के रूप में डॉ. हजारिका ने इस शीर्ष समिति की रिपोर्ट की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया। विशेषज्ञ थे- प्रसिद्ध नृत्य समीक्षक डॉ. सुनील कोठारी, शास्त्रीय नृत्यांगना डॉ. सोनल मानसिंह, इंडियन वीमेन जर्नलिस्ट कॉर्प की उपाध्यक्ष एवं अकादमी सदस्या शांता सरबजीत सिंह, सचिव एवं कथक नर्तक जयंत कस्तुवर, असम के हेमांशु शेखर दास, नृत्याचार्य जतिन गोस्वामी और नाटककार-अभिनेता दुलाल रॉय। 18 से 21 जनवरी 2000 तक असम के विभिन्न नृत्य कलाकारों ने रवींद्र भवन में सत्रिया नृत्य की कार्यशाला आयोजित की गई। इसके साथ ही सत्रिया नृत्य पर राष्ट्रीय परिचर्चा भी हुई, जिसमें डॉ. केशवानंद देव गोस्वामी, डॉ. सुनील कोठारी, जतिन गोस्वामी, रसेश्वर शैखिया बोरबायन आदि विद्वानों ने भाग लिया। इस परिचर्चा में डॉ. भूपेन हजारिका भी उपस्थित थे। इसी प्रकार एक और कार्यशाला चांदमारि के तीर्थनाथ शर्मा भवन में आयोजित किया गया था। अकादमी की विशेषज्ञ समिति ने 27 जुलाई 2000 को दिल्ली में हुई बैठक में सत्रिया नृत्य को शास्त्रीय मान्यता देने की अनुशंसा की। अब अकादमी की कार्यकारिणी समिति की स्वीकृति आवश्यक थी। डॉ. हजारिका के नेतृत्व में स्वीकृति मिल गई। अंततः 14 नवम्बर 2000 को गुवाहाटी के होटल ब्रह्मपुत्र में आयोजित अकादमी की सामान्य सभा ने सत्रिया नृत्य को भारतीय शास्त्रीय नृत्यशैली के रूप में मान्यता प्रदान की। यह असम के सांस्कृतिक जगत का एक स्वर्णिम दिन था। आसान नहीं थी यह कोशिश, कुछ लोग विरोध में खड़े हो गए यह कोशिश आसान नहीं थी। अकादमी के कुछ सदस्यों ने सामान्य सभा में यह कहकर आपत्ति जताई कि सत्रिया को शास्त्रीय न माना जाए। किसी ने तो अदालत में यह मुकदमा भी दायर किया कि यह नृत्य सत्रिया नहीं शंकरी होना चाहिए। इस पर सामान्य सभा में डॉ. हजारिका ने हिमांशु शेखर दास को इन आपत्तियों का उत्तर देने को कहा, “हिमांशु, चूंगा चाइ, सूपा दिया हे।” (अर्थात बुद्धिमत्ता के साथ उत्तर देना) श्री दास ने ठोस तर्क प्रस्तुत किए। इसके बाद अध्यक्ष भूपेन हजारिका ने खड़े होकर अध्यक्षीय आदेश द्वारा सभी को एकमत किया और सत्रिया नृत्य को भारतीय शास्त्रीय नृत्यशैली का दर्जा देने वाला प्रस्ताव पारित करा लिया। पांच सौ वर्षों से अधिक समय से असम के सत्रों (असम के धार्मिक अनुष्ठान) में प्रचलित यह नृत्य अब अखिल भारतीय स्तर पर शास्त्रीय नृत्यशैली के रूप में मान्य प्राप्त हुआ। सत्रिया नृत्य की इस ऐतिहासिक उपलब्धि की घोषणा रवींद्र भवन में की गई थी, लेकिन अस्वस्थता के कारण डॉ. हजारिका वहा नहीं जा सके। अंततः यह घोषणा सचिव जयंत कस्तुवर ने की। असमिया समाज डॉ. भूपेन हजारिका के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहेगा।
असम के सत्रिया नृत्य को भारतीय शास्त्रीय नृत्यशैली का दर्जा मिले सितंबर में 5 पांच साल हो रहे हैं। प्रसिद्ध असमिया कलाकार डॉ. भूपेन हजारिका ने सत्रिया नृत्य को भारतीय शास्त्रीय नृत्यशैली का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। असम की सांस्कृतिक विरासत के लिए यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। लेखक और गीतकार सदानंद गोगोई ने हजारिका की संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति से लेकर सत्रिया नृत्य की मान्यता दिलाने तक की कहानी बताई। राष्ट्रपति नारायणन ने हजारिका से कहा था- आपको दिल्ली आना है साल 1994, तारीख 9 नवम्बर। श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र चहल–पहल से भरा था। छह वर्षों के असम आंदोलन के समझौते के बाद श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र पांजाबारी में निर्मित हुआ था। राज्य में प्रफुल्ल महंत के नेतृत्व वाली अगप सरकार थी। उस दिन कलाक्षेत्र का उद्घाटन करने के लिए भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के आर. नारायणन आए थे। असम के चिरप्राण डॉ. भूपेन हजारिका राज्य सरकार के आमंत्रण पर इस कार्यक्रम के विशेष अतिथि थे। डॉ. हजारिका ने उसी अनुष्ठान के अनुरूप एक गीत की रचना की और उसे संगीत देकर गाया। वह गीत मानो उनका ही मुख्य भाषण था। राष्ट्रपति केआर. नारायणन मंत्रमुग्ध होकर उस अद्वितीय स्वर को सुनते रहे और भूपेन दा के गीत में असम की विविध संस्कृति और महापुरुषों की रचनाधारा की झलक को देखा। कार्यक्रम के समाप्त होते ही राष्ट्रपति ने उन्हें प्रणाम किया और कहा – “Dr. Hazarika, you will come to Delhi.” डॉ. हजारिका को उस समय समझ नहीं आया कि उन्हें दिल्ली क्यों जाना होगा। (हालांकि वे अधिक देर तक सोचने वाले व्यक्ति भी नहीं थे।) जल्दी फोन दीजिए, राष्ट्रपति बात करेंगे कुछ ही दिनों बाद की बात है। डॉ. हजारिका दोपहर का भोजन करके अपने निजरापार स्थित घर में आराम कर रहे थे। तभी फोन की घंटी बजी। दूसरे कमरे में उनके भतीजे संदीप (टटो) ने रिसीवर उठाया। दूसरी ओर से आवाज आई, ‘डॉ. हजारिका को दीजिए, राष्ट्रपति बात करेंगे।’ टटो ने उत्तर दिया, ‘वे अभी भोजन के बाद आराम कर रहे हैं, थोड़ी देर में फोन कीजिएगा।’ सामने से उत्तर आया, ‘जल्दी फोन दीजिए, भारत के राष्ट्रपति बात करेंगे।’ टटो दौड़कर कमरे में आया और कहा – ‘बरदेउता (ताऊजी)! फोन उठाइए, भारत के राष्ट्रपति बात करेंगे।’ तुरंत ही उन्होंने फोन उठाया। दूसरी ओर से राष्ट्रपति नारायण ने (अंग्रेज़ी में) कहा. ‘डॉ. हजारिका मैंने संगीत नाटक अकादेमी के अध्यक्ष पद के लिए आपके नाम को मंजूरी दे दी है। जल्द ही आप कार्यभार ग्रहण कीजिए।’ टेलीफोन वार्ता धन्यवाद और शुभकामनाओं के साथ समाप्त हुई। कुछ दिनों बाद भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव ने इस लेखक (सदानंद गोगोई) के मोबाइल पर फोन कर कहा कि डॉ. हजारिका का फैक्स नंबर चाहिए। चूंकि उनके घर पर फैक्स मशीन नहीं थी, इसलिए मैंने अपना नंबर दे दिया। आधे घंटे के भीतर फैक्स पर नियुक्ति पत्र आ गया। संयुक्त सचिव ने फिर फोन कर कहा कि आज ही पदभार ग्रहण पत्र वापस भेजना होगा। मैंने डॉ. हजारिका से हस्ताक्षर कराकर अनुमति पत्र उसी नंबर पर फैक्स कर दिया। अध्यक्ष बनके उन्होंने काम संभालते ही सत्रिया, कड़ुवत्तम और झऊ नृत्य को शास्त्रीय नृत्यशैली के रूप में मान्यता दिलाने के कार्य में पूरी ऊर्जा लगा दी। डॉ. हजारिका की उम्र अधिक होने के कारण उन्हें एक सहयोगी मिलते था। उन्होंने मुझे ही अपना साथी बना लिया। इसीलिए संगीत नाटक अकादमी के खर्च पर उनकी अधिकतर बैठकों में मुझे भी अनौपचारिक रूप से साथ रहने का अवसर मिला था। मेरे लिए यह परम सौभाग्य की बात थी कि भूपेन दा की वजह से मैं भारत के महान शास्त्रीय संगीतकारों और कलाकारों से निकटता से मिल पाया। 1998 को, डॉ. हजारिका ने सत्रिया नृत्य शैली को राष्ट्रीय मान्यता दिलाने का प्रस्ताव रखा
सत्रिया नृत्य और संगीत शैली को भारतीय शास्त्रीय संगीत की मान्यता दिलाने का प्रयास सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. महेश्वर नेउग ने किया था, लेकिन किसी अज्ञात कारणवश यह पूरा नहीं हो पाया। परंतु डॉ. भूपेन हजारिका ने इस महान कार्य को अपने कार्यकाल में पूरा करने का उत्तरदायित्व लिया। कार्यभार संभालने के मात्र तीन दिन बाद, अर्थात् 11 दिसम्बर 1998 को, अकादमी की सामान्य सभा में डॉ. हजारिका ने सत्रिया नृत्य शैली को राष्ट्रीय मान्यता दिलाने का प्रस्ताव रखा। इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की गई, जिसका कार्य सत्रिया संस्कृति पर एक विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत करना था। समिति के सदस्य थे- प्रदीप ज्योति महंत (अध्यक्ष), उस समय असम सरकार के सांस्कृतिक विभाग के आयुक्त सचिव हिमांशु शेखर दास, नृत्याचार्य जतिन गोस्वामी, नवकमल भूइयां और डॉ. जगन्नाथ महंत। इस शीर्ष समिति ने समय से पूर्व ही असम सरकार के सांस्कृतिक विभाग के माध्यम से प्रतिवेदन अकादमी को सौंपा। अध्यक्ष के रूप में डॉ. हजारिका ने इस शीर्ष समिति की रिपोर्ट की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया। विशेषज्ञ थे- प्रसिद्ध नृत्य समीक्षक डॉ. सुनील कोठारी, शास्त्रीय नृत्यांगना डॉ. सोनल मानसिंह, इंडियन वीमेन जर्नलिस्ट कॉर्प की उपाध्यक्ष एवं अकादमी सदस्या शांता सरबजीत सिंह, सचिव एवं कथक नर्तक जयंत कस्तुवर, असम के हेमांशु शेखर दास, नृत्याचार्य जतिन गोस्वामी और नाटककार-अभिनेता दुलाल रॉय। 18 से 21 जनवरी 2000 तक असम के विभिन्न नृत्य कलाकारों ने रवींद्र भवन में सत्रिया नृत्य की कार्यशाला आयोजित की गई। इसके साथ ही सत्रिया नृत्य पर राष्ट्रीय परिचर्चा भी हुई, जिसमें डॉ. केशवानंद देव गोस्वामी, डॉ. सुनील कोठारी, जतिन गोस्वामी, रसेश्वर शैखिया बोरबायन आदि विद्वानों ने भाग लिया। इस परिचर्चा में डॉ. भूपेन हजारिका भी उपस्थित थे। इसी प्रकार एक और कार्यशाला चांदमारि के तीर्थनाथ शर्मा भवन में आयोजित किया गया था। अकादमी की विशेषज्ञ समिति ने 27 जुलाई 2000 को दिल्ली में हुई बैठक में सत्रिया नृत्य को शास्त्रीय मान्यता देने की अनुशंसा की। अब अकादमी की कार्यकारिणी समिति की स्वीकृति आवश्यक थी। डॉ. हजारिका के नेतृत्व में स्वीकृति मिल गई। अंततः 14 नवम्बर 2000 को गुवाहाटी के होटल ब्रह्मपुत्र में आयोजित अकादमी की सामान्य सभा ने सत्रिया नृत्य को भारतीय शास्त्रीय नृत्यशैली के रूप में मान्यता प्रदान की। यह असम के सांस्कृतिक जगत का एक स्वर्णिम दिन था। आसान नहीं थी यह कोशिश, कुछ लोग विरोध में खड़े हो गए यह कोशिश आसान नहीं थी। अकादमी के कुछ सदस्यों ने सामान्य सभा में यह कहकर आपत्ति जताई कि सत्रिया को शास्त्रीय न माना जाए। किसी ने तो अदालत में यह मुकदमा भी दायर किया कि यह नृत्य सत्रिया नहीं शंकरी होना चाहिए। इस पर सामान्य सभा में डॉ. हजारिका ने हिमांशु शेखर दास को इन आपत्तियों का उत्तर देने को कहा, “हिमांशु, चूंगा चाइ, सूपा दिया हे।” (अर्थात बुद्धिमत्ता के साथ उत्तर देना) श्री दास ने ठोस तर्क प्रस्तुत किए। इसके बाद अध्यक्ष भूपेन हजारिका ने खड़े होकर अध्यक्षीय आदेश द्वारा सभी को एकमत किया और सत्रिया नृत्य को भारतीय शास्त्रीय नृत्यशैली का दर्जा देने वाला प्रस्ताव पारित करा लिया। पांच सौ वर्षों से अधिक समय से असम के सत्रों (असम के धार्मिक अनुष्ठान) में प्रचलित यह नृत्य अब अखिल भारतीय स्तर पर शास्त्रीय नृत्यशैली के रूप में मान्य प्राप्त हुआ। सत्रिया नृत्य की इस ऐतिहासिक उपलब्धि की घोषणा रवींद्र भवन में की गई थी, लेकिन अस्वस्थता के कारण डॉ. हजारिका वहा नहीं जा सके। अंततः यह घोषणा सचिव जयंत कस्तुवर ने की। असमिया समाज डॉ. भूपेन हजारिका के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहेगा।