देश में अब तक कुल 8 बार जातीय जनगणना हुई है। 1872 से 1931 के बीच 7 बार ब्रिटिशकाल में और एक बार 2011 में आजाद भारत में। हालांकि, 2011 की जातीय जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए। जातीय जनगणना की घोषणा के साथ ही सरकार ने इसके क्रियान्वयन की रूपरेखा बनानी भी शुरू कर दी है। वर्ष 2011 की जातीय जनगणना में जो गलती हुई थी, केंद्र सरकार इस बार उसे दोहराना नहीं चाहती। तब सरकार ने जातियों की पहले से कोई सूची नहीं बनाई थी, जिसने अपनी जो भी जाति बताई, उसे ही दर्ज करते गए। नतीजा ये हुआ कि 46 लाख से भी ज्यादा जातियां दर्ज हो गईं। इस बार सरकार 1931 में गिनी गई करीब 4 हजार जातियों/उपजातियों को आधार बनाकर पहले से ही सूची तैयार करेगी। SC/ST/OBC आयोग की मदद से सूची तैयार की जाएगी। फिर कर्मचारी यही सूची लेकर घर-घर जाएंगे और इसमें दर्ज जातियों में से ही जाति चुनेंगे। जनगणना के लिए महापंजीयक का बजट भी बढ़ेगा जनगणना महापंजीयक का बजट भी बढ़ाने की संभावना है, जो इस साल घटकर 574.80 करोड़ रु. रह गया था। बता दें 2011 की सामाजिक आर्थिक जातीय जनगणना पर 4,389 करोड़ रु. खर्च हुए थे। केंद्र ने 2019 में जनगणना के लिए 8,754 करोड़ रु. मंजूर किए थे। इसके अलावा 3,941 करोड़ रु. नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर अपडेट करने के लिए रखे गए। फिर 2020-21 के बजट में जनगणना, सर्वे और सांख्यिकी जुटाने के लिए 4,278 करोड़ रु. और डिजिटल सेंसस के लिए 3,768 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया। इस मद में मांग 2022-23 में घटकर 552 करोड़ रु. रह गई। जनगणना में देरी होती गई और बजट भी घटता गया। 2011 में ये तरीका था; सिंगल रूम और कच्ची दीवारों के घर वालों को वंचित वर्ग में रखा, 5 साल चली कवायद जातीय जनगणना से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… देश में आजादी के बाद पहली बार जातिगत जनगणना होगी:बिहार चुनाव से पहले केंद्र का फैसला; राहुल बोले- फैसले का समर्थन, डेडलाइन तय हो देश में आजादी के बाद पहली बार जाति जनगणना कराई जाएगी। केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को जाति जनगणना को मंजूरी दी। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि इसे मूल जनगणना के साथ ही कराया जाएगा। देश में इसी साल के आखिर में बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल जाति जनगणना कराने की मांग करते रहे हैं। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि जाति जनगणना की शुरुआत सितंबर में की जा सकती है। पढ़ें पूरी खबर…
देश में अब तक कुल 8 बार जातीय जनगणना हुई है। 1872 से 1931 के बीच 7 बार ब्रिटिशकाल में और एक बार 2011 में आजाद भारत में। हालांकि, 2011 की जातीय जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए। जातीय जनगणना की घोषणा के साथ ही सरकार ने इसके क्रियान्वयन की रूपरेखा बनानी भी शुरू कर दी है। वर्ष 2011 की जातीय जनगणना में जो गलती हुई थी, केंद्र सरकार इस बार उसे दोहराना नहीं चाहती। तब सरकार ने जातियों की पहले से कोई सूची नहीं बनाई थी, जिसने अपनी जो भी जाति बताई, उसे ही दर्ज करते गए। नतीजा ये हुआ कि 46 लाख से भी ज्यादा जातियां दर्ज हो गईं। इस बार सरकार 1931 में गिनी गई करीब 4 हजार जातियों/उपजातियों को आधार बनाकर पहले से ही सूची तैयार करेगी। SC/ST/OBC आयोग की मदद से सूची तैयार की जाएगी। फिर कर्मचारी यही सूची लेकर घर-घर जाएंगे और इसमें दर्ज जातियों में से ही जाति चुनेंगे। जनगणना के लिए महापंजीयक का बजट भी बढ़ेगा जनगणना महापंजीयक का बजट भी बढ़ाने की संभावना है, जो इस साल घटकर 574.80 करोड़ रु. रह गया था। बता दें 2011 की सामाजिक आर्थिक जातीय जनगणना पर 4,389 करोड़ रु. खर्च हुए थे। केंद्र ने 2019 में जनगणना के लिए 8,754 करोड़ रु. मंजूर किए थे। इसके अलावा 3,941 करोड़ रु. नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर अपडेट करने के लिए रखे गए। फिर 2020-21 के बजट में जनगणना, सर्वे और सांख्यिकी जुटाने के लिए 4,278 करोड़ रु. और डिजिटल सेंसस के लिए 3,768 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया। इस मद में मांग 2022-23 में घटकर 552 करोड़ रु. रह गई। जनगणना में देरी होती गई और बजट भी घटता गया। 2011 में ये तरीका था; सिंगल रूम और कच्ची दीवारों के घर वालों को वंचित वर्ग में रखा, 5 साल चली कवायद जातीय जनगणना से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… देश में आजादी के बाद पहली बार जातिगत जनगणना होगी:बिहार चुनाव से पहले केंद्र का फैसला; राहुल बोले- फैसले का समर्थन, डेडलाइन तय हो देश में आजादी के बाद पहली बार जाति जनगणना कराई जाएगी। केंद्रीय कैबिनेट ने बुधवार को जाति जनगणना को मंजूरी दी। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि इसे मूल जनगणना के साथ ही कराया जाएगा। देश में इसी साल के आखिर में बिहार विधानसभा के चुनाव होने हैं। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल जाति जनगणना कराने की मांग करते रहे हैं। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि जाति जनगणना की शुरुआत सितंबर में की जा सकती है। पढ़ें पूरी खबर…