सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को ऑनलाइन अश्लील कंटेंट की स्ट्रीमिंग पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने केंद्र सरकार और 9 OTT-सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि याचिका एक गंभीर चिंता पैदा करती है। केंद्र को इस पर कुछ कदम उठाने की जरूरत है। यह मामला कार्यपालिका या विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे भी हम पर आरोप हैं कि हम कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में दखल देते हैं। फिर भी हम नोटिस जारी कर रहे हैं। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि OTT और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट को लेकर कुछ रेगुलेशन पहले से मौजूद हैं। सरकार और नए नियम लागू करने पर विचार कर रही है। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन पेश हुए। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार से OTT और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अश्लील कंटेंट पर रोक लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऐसी सामग्री युवाओं और समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। कोर्ट रूम LIVE… एडवोकेट विष्णु जैन: सोशल मीडिया पर जो सामग्री बिना किसी प्रतिबंध के चल रही है, मैंने उसका उल्लेख किया है। यह बिना किसी जांच के हो रहा है। मैंने सेकेंड आदि के साथ पूरी सूची भी दी है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बिना किसी जांच के क्या दिखाया जा रहा है। SG तुषार मेहता: मैं इसे किसी भी तरह से प्रतिकूल रूप से नहीं ले रहा हूं। मेरी चिंता यह है कि बच्चे इस सब के संपर्क में हैं। कुछ नियमित कार्यक्रमों में भाषा आदि ऐसी होती है कि यह विकृत होती है और दो आदमी एक साथ बैठकर इसे देख भी नहीं सकते। उनके पास एकमात्र मानदंड यह है कि यह 18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए है। जस्टिस गवई: हां हमने देखा है कि बच्चों को कुछ समय के लिए व्यस्त रखने के लिए फोन आदि दिए जाते हैं। यह या तो विधायिका या कार्यपालिका के लिए है। वैसे भी हम विधायिका या कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करने के आरोपों का सामना कर रहे हैं। वैसे भी हम नोटिस जारी करेंगे। सुप्रीम कोर्ट: याचिका में ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर विभिन्न आपत्तिजनक, अश्लील और अभद्र सामग्री के प्रदर्शन के संबंध में एक महत्वपूर्ण चिंता जताई गई है। एसजी ने कहा कि याचिका को किसी भी प्रतिकूल तरीके से नहीं लिया जाना चाहिए। यह प्रस्तुत किया गया है कि कुछ सामग्री विकृत है। सुप्रीम कोर्ट: एसजी ने प्रस्तुत किया कि कुछ नियम अस्तित्व में हैं और कुछ और पर विचार किया जा रहा है। इसलिए हम प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हैं। शेष प्रतिवादियों को ईमेल और सेवा के सामान्य तरीके से नोटिस दिया जाए। कोर्ट ने 21 अप्रैल को भी कहा था- नियम बनाना केंद्र का काम
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 21 अप्रैल को इसी याचिका पर सुनवाई की थी। तब भी कोर्ट ने कहा था कि याचिका में उठाया गया मुद्दा एक नीतिगत मामला है और यह केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। इस संबंध में नियम बनाना केंद्र का काम है। जस्टिस गवई ने कहा था,’हम पर आरोप लगाया जा रहा है कि हम कार्यपालिका और विधायी कार्यों में हस्तक्षेप कर रहे हैं।’ सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के हाल ही में की गई टिप्पणियों के बाद आई है। दोनों ने कोर्ट पर न्यायिक अतिक्रमण का आरोप लगाया था। इसके बाद से सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को लेकर बहस चल रही है। धनखड़ ने 23 अप्रैल को कहा था कि संसद ही सबसे ऊपर है। उसके ऊपर कोई नहीं हो सकता। सांसद ही असली मालिक हैं, वही तय करते हैं कि संविधान कैसा होगा। उनके ऊपर कोई और सत्ता नहीं हो सकती। इससे पहले 17 अप्रैल को धनखड़ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का काम ऐसा है, जैसे वो सुप्रीम संसद हो। धनखड़ से पहले निशिकांत दुबे ने कहा था कि मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। ऐसे में CJI किसी राष्ट्रपति को निर्देश कैसे दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के बिलों को लेकर राष्ट्रपति के लिए भी एक महीने की टाइम लाइन तय कर दी थी। इस फैसले के बाद निशिकांत दुबे और जगदीप धनखड़ ने बयान दिए। याचिकाकर्ता का दावा- अश्लील कंटेंट से क्राइम बढ़ सकता है
पत्रकार और पूर्व सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने सुप्रीम कोर्ट में अश्लील कंटेंट पर रोक लगाने से जुड़ी याचिका लगाई है। उन्होंने राष्ट्रीय कंटेंट नियंत्रण प्राधिकरण (National Content Control Authority) के गठन का प्रस्ताव रखा है, ताकि ऐसी सामग्री को नियंत्रित किया जा सके। उनका तर्क है कि OTT और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बिना किसी फिल्टर के अश्लील कंटेंट परोस रहे हैं। यह युवाओं, बच्चों और यहां तक कि बड़ों के दिमाग को भी गंदा करती है। कई OTT प्लेटफॉर्म्स पर चाइल्ड पोर्नोग्राफी के एलिमेंट्स भी हैं। ऐसे कंटेंट से क्राइम रेट में बढ़ोतरी हो सकती है। ‘इंटरनेट की कम कीमत से अश्लील कंटेंट तक पहुंच आसान’
याचिकाकर्ता ने कहा कि इंटरनेट की पहुंच और सस्ते कीमत के कारण बिना किसी जांच के सभी उम्र के यूजर्स तक अश्लील कंटेंट पहुंचाना आसान हो गया है। बेरोकटोक अश्लील कंटेंट सार्वजनिक सुरक्षा में खतरा पैदा कर सकता है।’ ‘अगर इसपर पाबंदियां नहीं लगाई गई तो सामाजिक मूल्यों और लोगों के मेंटल हेल्थ पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। वक्त की यही मांग है कि सरकार अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाए और सामाजिक नैतिकता की रक्षा करे। उसे यह निश्चित करना चाहिए कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स विकृत मानसिकता को जन्म देने वाली जगह न बन जाए।’ याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की है कि वह सोशल मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म्स तक लोगों के पहुंच पर तब तक रोक लगाए, जब तक ऐसे प्लेटफॉर्म्स भारत में खुलेआम, खासकर बच्चों और नाबालिगों के लिए पोर्नोग्राफिक कंटेंट पर रोक लगाने के लिए कोई सिस्टम तैयार न कर ले। 2020 में OTT प्लेटफॉर्म्स ने सेल्फ रेगुलेशन कोड बनाया था
साल 2020 में नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो सहित 15 OTT प्लेटफॉर्म्स ने सेल्फ रेगुलेशन कोड बनाया था। इंटरनेट एंड मोबाइल असोसिएशन ऑप इंडिया (IAMAI) ने बताया था कि यह रेगुलेशन कोड अलग-अलग उम्र के लोगों के लिए कंटेंट के बांटने और दर्शकों के लिए उपयुक्त कंटेंट परोसने पर ध्यान केंद्रित करेगा। केंद्र सरकार लेकर आएगी डिजिटल इंडिया बिल
इधर, केंद्र सरकार मौजूदा IT एक्ट की जगह डिजिटल इंडिया बिल लाने की योजना बना रही है। इस नए कानून का उद्देश्य सोशल मीडिया पर अश्लीलता को रोकना है। यूट्यूबर्स और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स को विनियमित करना है। सरकार इस विधेयक पर 15 महीने से काम कर रही है और इसमें टेलीकम्युनिकेशन, आईटी और मीडिया जैसे विभिन्न क्षेत्रों के लिए विशिष्ट नियम शामिल होंगे। ऑनलाइन कंटेंट को लेकर सरकार की मौजूदा गाइडलाइन
भारत सरकार ने 2021 में The Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules बनाया था। इसे 6 अप्रैल, 2023 को अपडेट किया गया। 30 पेज की गाइडलाइंस में सोशल मीडिया, फिल्म और वेब सीरीज के लिए नियम बताए गए हैं। पेज नंबर-28 पर फिल्म, वेब सीरीज और एंटरटेनमेंट प्रोग्राम के लिए जनरल गाइडलाइंस है। इसमें टारगेट ऑडियंस के आधार पर कैटेगरी तय करना जरूरी है। ये चेतावनी देना भी जरूरी है कि आप क्या कंटेंट दिखा रहे हैं। गाइडलाइंस के मुताबिक, OTT और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ग्रीवांस ऑफिसर रखने होंगे। कंटेंट कानून के हिसाब से होना चाहिए। उसमें सेक्स न हो, एंटी नेशन न हो और बच्चों-महिलाओं को नुकसान पहुंचाने वाला न हो। इसकी निगरानी के लिए दो तरह के नियम हैं-
पहला: सेल्फ रेगुलेटरी होना चाहिए। मतलब कंटेंट को अपलोड करने वाला सरकार की गाइडलाइंस का ध्यान रखेगा। इसके लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, OTT, मोबाइल एप्स खुद इनका ध्यान रखेंगे। ये जांचेंगे कि कोई कंटेंट गलत तो नहीं है। चाइल्ड पोर्नोग्राफी नहीं होनी चाहिए। ये भी देखेंगे कि सेक्शुअल कंटेंट किस लेवल का है और भाषा किस तरह की है। दूसरा: अगर किसी को कंटेंट पर आपत्ति है, तो वो शिकायत कर सकता है। इसके लिए कंटेंट पब्लिश करने वाले प्लेटफॉर्म्स, वेबसाइट, एप पर शिकायत करने के लिए सिस्टम होगा। उस पर ग्रीवांस ऑफिसर का नाम, फोन नंबर और ईमेल आईडी होगी। कोई भी व्यक्ति उस पर शिकायत कर सकेगा। शिकायत अधिकारी 24 घंटे में शिकायत रजिस्टर करेगा। शिकायत करने वाले को एक्नॉलेजमेंट देना होगा। शिकायत की तारीख से 15 दिनों के अंदर उसका हल करना होगा। अगर कंटेंट हटाने की जरूरत होगी, तो उसे हटाना होगा। शिकायत न सुनी जाए, तो सूचना प्रसारण मंत्रालय की वेबसाइट पर भी शिकायत कर सकते हैं। ………………………………….. सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें कलकत्ता हाईकोर्ट बोला- नाबालिग के ब्रेस्ट छूना रेप की कोशिश नहीं, आरोपी को जमानत दी; सुप्रीम कोर्ट ने दी थी हिदायत कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि नशे में नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट छूने की कोशिश करना, प्रिवेंशन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंस (POCSO) एक्ट के तहत रेप की कोशिश नहीं है। इसे गंभीर यौन उत्पीड़न की कोशिश माना जा सकता है। कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला तब आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिन पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐसे एक कमेंट को असंवेदनशील बताया था। पूरी खबर पढ़ें… इलाहाबाद हाईकोर्ट बोला- ब्रेस्ट पकड़ना और लड़की को खींचना रेप नहीं, ये सिर्फ गंभीर यौन उत्पीड़न ‘पीड़िता के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसे पुलिया के नीचे खींचकर ले जाने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं मान सकते।’ यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने की थी। पूरी खबर पढ़ें…
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को ऑनलाइन अश्लील कंटेंट की स्ट्रीमिंग पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने केंद्र सरकार और 9 OTT-सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा कि याचिका एक गंभीर चिंता पैदा करती है। केंद्र को इस पर कुछ कदम उठाने की जरूरत है। यह मामला कार्यपालिका या विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे भी हम पर आरोप हैं कि हम कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में दखल देते हैं। फिर भी हम नोटिस जारी कर रहे हैं। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि OTT और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कंटेंट को लेकर कुछ रेगुलेशन पहले से मौजूद हैं। सरकार और नए नियम लागू करने पर विचार कर रही है। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट विष्णु शंकर जैन पेश हुए। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार से OTT और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अश्लील कंटेंट पर रोक लगाने के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि ऐसी सामग्री युवाओं और समाज पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। कोर्ट रूम LIVE… एडवोकेट विष्णु जैन: सोशल मीडिया पर जो सामग्री बिना किसी प्रतिबंध के चल रही है, मैंने उसका उल्लेख किया है। यह बिना किसी जांच के हो रहा है। मैंने सेकेंड आदि के साथ पूरी सूची भी दी है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बिना किसी जांच के क्या दिखाया जा रहा है। SG तुषार मेहता: मैं इसे किसी भी तरह से प्रतिकूल रूप से नहीं ले रहा हूं। मेरी चिंता यह है कि बच्चे इस सब के संपर्क में हैं। कुछ नियमित कार्यक्रमों में भाषा आदि ऐसी होती है कि यह विकृत होती है और दो आदमी एक साथ बैठकर इसे देख भी नहीं सकते। उनके पास एकमात्र मानदंड यह है कि यह 18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए है। जस्टिस गवई: हां हमने देखा है कि बच्चों को कुछ समय के लिए व्यस्त रखने के लिए फोन आदि दिए जाते हैं। यह या तो विधायिका या कार्यपालिका के लिए है। वैसे भी हम विधायिका या कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण करने के आरोपों का सामना कर रहे हैं। वैसे भी हम नोटिस जारी करेंगे। सुप्रीम कोर्ट: याचिका में ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया पर विभिन्न आपत्तिजनक, अश्लील और अभद्र सामग्री के प्रदर्शन के संबंध में एक महत्वपूर्ण चिंता जताई गई है। एसजी ने कहा कि याचिका को किसी भी प्रतिकूल तरीके से नहीं लिया जाना चाहिए। यह प्रस्तुत किया गया है कि कुछ सामग्री विकृत है। सुप्रीम कोर्ट: एसजी ने प्रस्तुत किया कि कुछ नियम अस्तित्व में हैं और कुछ और पर विचार किया जा रहा है। इसलिए हम प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हैं। शेष प्रतिवादियों को ईमेल और सेवा के सामान्य तरीके से नोटिस दिया जाए। कोर्ट ने 21 अप्रैल को भी कहा था- नियम बनाना केंद्र का काम
सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 21 अप्रैल को इसी याचिका पर सुनवाई की थी। तब भी कोर्ट ने कहा था कि याचिका में उठाया गया मुद्दा एक नीतिगत मामला है और यह केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में है। इस संबंध में नियम बनाना केंद्र का काम है। जस्टिस गवई ने कहा था,’हम पर आरोप लगाया जा रहा है कि हम कार्यपालिका और विधायी कार्यों में हस्तक्षेप कर रहे हैं।’ सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के हाल ही में की गई टिप्पणियों के बाद आई है। दोनों ने कोर्ट पर न्यायिक अतिक्रमण का आरोप लगाया था। इसके बाद से सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को लेकर बहस चल रही है। धनखड़ ने 23 अप्रैल को कहा था कि संसद ही सबसे ऊपर है। उसके ऊपर कोई नहीं हो सकता। सांसद ही असली मालिक हैं, वही तय करते हैं कि संविधान कैसा होगा। उनके ऊपर कोई और सत्ता नहीं हो सकती। इससे पहले 17 अप्रैल को धनखड़ ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट का काम ऐसा है, जैसे वो सुप्रीम संसद हो। धनखड़ से पहले निशिकांत दुबे ने कहा था कि मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। ऐसे में CJI किसी राष्ट्रपति को निर्देश कैसे दे सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के बिलों को लेकर राष्ट्रपति के लिए भी एक महीने की टाइम लाइन तय कर दी थी। इस फैसले के बाद निशिकांत दुबे और जगदीप धनखड़ ने बयान दिए। याचिकाकर्ता का दावा- अश्लील कंटेंट से क्राइम बढ़ सकता है
पत्रकार और पूर्व सूचना आयुक्त उदय माहुरकर ने सुप्रीम कोर्ट में अश्लील कंटेंट पर रोक लगाने से जुड़ी याचिका लगाई है। उन्होंने राष्ट्रीय कंटेंट नियंत्रण प्राधिकरण (National Content Control Authority) के गठन का प्रस्ताव रखा है, ताकि ऐसी सामग्री को नियंत्रित किया जा सके। उनका तर्क है कि OTT और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बिना किसी फिल्टर के अश्लील कंटेंट परोस रहे हैं। यह युवाओं, बच्चों और यहां तक कि बड़ों के दिमाग को भी गंदा करती है। कई OTT प्लेटफॉर्म्स पर चाइल्ड पोर्नोग्राफी के एलिमेंट्स भी हैं। ऐसे कंटेंट से क्राइम रेट में बढ़ोतरी हो सकती है। ‘इंटरनेट की कम कीमत से अश्लील कंटेंट तक पहुंच आसान’
याचिकाकर्ता ने कहा कि इंटरनेट की पहुंच और सस्ते कीमत के कारण बिना किसी जांच के सभी उम्र के यूजर्स तक अश्लील कंटेंट पहुंचाना आसान हो गया है। बेरोकटोक अश्लील कंटेंट सार्वजनिक सुरक्षा में खतरा पैदा कर सकता है।’ ‘अगर इसपर पाबंदियां नहीं लगाई गई तो सामाजिक मूल्यों और लोगों के मेंटल हेल्थ पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। वक्त की यही मांग है कि सरकार अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाए और सामाजिक नैतिकता की रक्षा करे। उसे यह निश्चित करना चाहिए कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स विकृत मानसिकता को जन्म देने वाली जगह न बन जाए।’ याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार को निर्देश देने की मांग की है कि वह सोशल मीडिया और OTT प्लेटफॉर्म्स तक लोगों के पहुंच पर तब तक रोक लगाए, जब तक ऐसे प्लेटफॉर्म्स भारत में खुलेआम, खासकर बच्चों और नाबालिगों के लिए पोर्नोग्राफिक कंटेंट पर रोक लगाने के लिए कोई सिस्टम तैयार न कर ले। 2020 में OTT प्लेटफॉर्म्स ने सेल्फ रेगुलेशन कोड बनाया था
साल 2020 में नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो सहित 15 OTT प्लेटफॉर्म्स ने सेल्फ रेगुलेशन कोड बनाया था। इंटरनेट एंड मोबाइल असोसिएशन ऑप इंडिया (IAMAI) ने बताया था कि यह रेगुलेशन कोड अलग-अलग उम्र के लोगों के लिए कंटेंट के बांटने और दर्शकों के लिए उपयुक्त कंटेंट परोसने पर ध्यान केंद्रित करेगा। केंद्र सरकार लेकर आएगी डिजिटल इंडिया बिल
इधर, केंद्र सरकार मौजूदा IT एक्ट की जगह डिजिटल इंडिया बिल लाने की योजना बना रही है। इस नए कानून का उद्देश्य सोशल मीडिया पर अश्लीलता को रोकना है। यूट्यूबर्स और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स को विनियमित करना है। सरकार इस विधेयक पर 15 महीने से काम कर रही है और इसमें टेलीकम्युनिकेशन, आईटी और मीडिया जैसे विभिन्न क्षेत्रों के लिए विशिष्ट नियम शामिल होंगे। ऑनलाइन कंटेंट को लेकर सरकार की मौजूदा गाइडलाइन
भारत सरकार ने 2021 में The Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules बनाया था। इसे 6 अप्रैल, 2023 को अपडेट किया गया। 30 पेज की गाइडलाइंस में सोशल मीडिया, फिल्म और वेब सीरीज के लिए नियम बताए गए हैं। पेज नंबर-28 पर फिल्म, वेब सीरीज और एंटरटेनमेंट प्रोग्राम के लिए जनरल गाइडलाइंस है। इसमें टारगेट ऑडियंस के आधार पर कैटेगरी तय करना जरूरी है। ये चेतावनी देना भी जरूरी है कि आप क्या कंटेंट दिखा रहे हैं। गाइडलाइंस के मुताबिक, OTT और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ग्रीवांस ऑफिसर रखने होंगे। कंटेंट कानून के हिसाब से होना चाहिए। उसमें सेक्स न हो, एंटी नेशन न हो और बच्चों-महिलाओं को नुकसान पहुंचाने वाला न हो। इसकी निगरानी के लिए दो तरह के नियम हैं-
पहला: सेल्फ रेगुलेटरी होना चाहिए। मतलब कंटेंट को अपलोड करने वाला सरकार की गाइडलाइंस का ध्यान रखेगा। इसके लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, OTT, मोबाइल एप्स खुद इनका ध्यान रखेंगे। ये जांचेंगे कि कोई कंटेंट गलत तो नहीं है। चाइल्ड पोर्नोग्राफी नहीं होनी चाहिए। ये भी देखेंगे कि सेक्शुअल कंटेंट किस लेवल का है और भाषा किस तरह की है। दूसरा: अगर किसी को कंटेंट पर आपत्ति है, तो वो शिकायत कर सकता है। इसके लिए कंटेंट पब्लिश करने वाले प्लेटफॉर्म्स, वेबसाइट, एप पर शिकायत करने के लिए सिस्टम होगा। उस पर ग्रीवांस ऑफिसर का नाम, फोन नंबर और ईमेल आईडी होगी। कोई भी व्यक्ति उस पर शिकायत कर सकेगा। शिकायत अधिकारी 24 घंटे में शिकायत रजिस्टर करेगा। शिकायत करने वाले को एक्नॉलेजमेंट देना होगा। शिकायत की तारीख से 15 दिनों के अंदर उसका हल करना होगा। अगर कंटेंट हटाने की जरूरत होगी, तो उसे हटाना होगा। शिकायत न सुनी जाए, तो सूचना प्रसारण मंत्रालय की वेबसाइट पर भी शिकायत कर सकते हैं। ………………………………….. सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें कलकत्ता हाईकोर्ट बोला- नाबालिग के ब्रेस्ट छूना रेप की कोशिश नहीं, आरोपी को जमानत दी; सुप्रीम कोर्ट ने दी थी हिदायत कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि नशे में नाबालिग लड़की के ब्रेस्ट छूने की कोशिश करना, प्रिवेंशन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंस (POCSO) एक्ट के तहत रेप की कोशिश नहीं है। इसे गंभीर यौन उत्पीड़न की कोशिश माना जा सकता है। कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला तब आया है, जब सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिन पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐसे एक कमेंट को असंवेदनशील बताया था। पूरी खबर पढ़ें… इलाहाबाद हाईकोर्ट बोला- ब्रेस्ट पकड़ना और लड़की को खींचना रेप नहीं, ये सिर्फ गंभीर यौन उत्पीड़न ‘पीड़िता के स्तनों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसे पुलिया के नीचे खींचकर ले जाने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं मान सकते।’ यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने की थी। पूरी खबर पढ़ें…