सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इलेक्टोरल बॉण्ड (चुनावी बॉण्ड) से जुड़ी एक पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने पुराने फैसले में राजनीतिक दलों को बॉण्ड के जरिए मिले 16,518 करोड़ रुपए का चंदा जब्त करने की मांग खारिज कर दी थी। पुनर्विचार याचिका इस फैसले के रिव्यू के लिए लगाई गई थी। मामले की सुनवाई CJI संजीव खन्ना, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा ने की। पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने 15 फरवरी, 2024 को चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द कर दिया था। इसके बाद भारतीय स्टेट बैंक ने बॉण्ड की डीटेल्स चुनाव आयोग से साझा की थीं। भाजपा सबसे ज्यादा चंदा लेने वाली पार्टी
चुनाव आयोग ने 14 मार्च, 2024 को इलेक्टोरल बॉन्ड का डेटा अपनी वेबसाइट पर जारी किया था। इसमें भाजपा सबसे ज्यादा चंदा लेने वाली पार्टी थी। 12 अप्रैल 2019 से 11 जनवरी 2024 तक पार्टी को सबसे ज्यादा 6060 करोड़ रुपए मिले थे। लिस्ट में दूसरे नंबर पर तृणमूल कांग्रेस (1609 करोड़) और तीसरे पर कांग्रेस पार्टी (1421 करोड़) थी। जानिए क्या है चुनावी बॉण्ड योजना
चुनावी या इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम 2017 को उस वक्त के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पेश किया था। ये एक तरह का प्रॉमिसरी नोट होता है। इसे बैंक नोट भी कहते हैं। इसे कोई भी भारतीय नागरिक या कंपनी खरीद सकती है, और राजनीतिक पार्टियों फंड दे सकती थी। राजनीतिक फंडिंग को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने और के लिये साल 2018 में चुनावी बॉण्ड योजना शुरू की गई थी। सरकार ने इस योजना को ‘कैशलेस-डिजिटल अर्थव्यवस्था’ की ओर आगे बढ़ने में एक अहम ‘चुनावी सुधार’ बताया था। विवादों में क्यों आई चुनावी बॉन्ड स्कीम
2017 में अरुण जेटली ने इसे पेश करते वक्त दावा किया था कि इससे राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाली फंडिंग और चुनाव व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी। इससे ब्लैक मनी पर अंकुश लगेगा। वहीं, विरोध करने वालों का कहना था कि इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वाले की पहचान जाहिर नहीं की जाती है, इससे ये चुनावों में काले धन के इस्तेमाल का जरिया बन सकते हैं। याचिका दाखिल करने वाली संस्था ADR (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) ने दावा किया था कि इस प्रकार की चुनावी फंडिंग भ्रष्टाचार को बढ़ावा देगी। कुछ कंपनियां उन पार्टियों में अज्ञात तरीकों से फंडिंग करेंगी, जिन पार्टियों की सरकार से उन्हें फायदा होता है। 1 करोड़ रुपए तक का बॉन्ड खरीदे जा सकते थे
कोई भी भारतीय इसे खरीद सकता है। बॉन्ड खरीदने वाला 1 हजार से लेकर 1 करोड़ रुपए तक का बॉन्ड खरीद सकता था। खरीदने वाले को बैंक को अपनी पूरी KYC डिटेल में देनी होती थी। बॉन्ड खरीदने वाले की पहचान गुप्त रहती है। खरीदने वाला जिस पार्टी को ये बॉन्ड डोनेट करना चाहता है, उसे पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम 1% वोट मिला होना चाहिए। ये बॉन्ड जारी करने के बाद 15 दिन तक वैलिड रहते थे। इसलिए 15 दिन के अंदर इसे चुनाव आयोग से वैरिफाइड बैंक अकाउंट से कैश करवाना होता था। ——————————————— सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… सोशल मीडिया पर बच्चों के बैन की याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मामला हमारे दायरे से बाहर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर कानूनी प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा- यह नीतिगत मामला है। आप संसद से कानून बनाने के लिए कहें। यह हमारे दायरे से बाहर है। पूरी खबर पढ़ें…
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इलेक्टोरल बॉण्ड (चुनावी बॉण्ड) से जुड़ी एक पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने पुराने फैसले में राजनीतिक दलों को बॉण्ड के जरिए मिले 16,518 करोड़ रुपए का चंदा जब्त करने की मांग खारिज कर दी थी। पुनर्विचार याचिका इस फैसले के रिव्यू के लिए लगाई गई थी। मामले की सुनवाई CJI संजीव खन्ना, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा ने की। पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने 15 फरवरी, 2024 को चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द कर दिया था। इसके बाद भारतीय स्टेट बैंक ने बॉण्ड की डीटेल्स चुनाव आयोग से साझा की थीं। भाजपा सबसे ज्यादा चंदा लेने वाली पार्टी
चुनाव आयोग ने 14 मार्च, 2024 को इलेक्टोरल बॉन्ड का डेटा अपनी वेबसाइट पर जारी किया था। इसमें भाजपा सबसे ज्यादा चंदा लेने वाली पार्टी थी। 12 अप्रैल 2019 से 11 जनवरी 2024 तक पार्टी को सबसे ज्यादा 6060 करोड़ रुपए मिले थे। लिस्ट में दूसरे नंबर पर तृणमूल कांग्रेस (1609 करोड़) और तीसरे पर कांग्रेस पार्टी (1421 करोड़) थी। जानिए क्या है चुनावी बॉण्ड योजना
चुनावी या इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम 2017 को उस वक्त के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पेश किया था। ये एक तरह का प्रॉमिसरी नोट होता है। इसे बैंक नोट भी कहते हैं। इसे कोई भी भारतीय नागरिक या कंपनी खरीद सकती है, और राजनीतिक पार्टियों फंड दे सकती थी। राजनीतिक फंडिंग को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने और के लिये साल 2018 में चुनावी बॉण्ड योजना शुरू की गई थी। सरकार ने इस योजना को ‘कैशलेस-डिजिटल अर्थव्यवस्था’ की ओर आगे बढ़ने में एक अहम ‘चुनावी सुधार’ बताया था। विवादों में क्यों आई चुनावी बॉन्ड स्कीम
2017 में अरुण जेटली ने इसे पेश करते वक्त दावा किया था कि इससे राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाली फंडिंग और चुनाव व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी। इससे ब्लैक मनी पर अंकुश लगेगा। वहीं, विरोध करने वालों का कहना था कि इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वाले की पहचान जाहिर नहीं की जाती है, इससे ये चुनावों में काले धन के इस्तेमाल का जरिया बन सकते हैं। याचिका दाखिल करने वाली संस्था ADR (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) ने दावा किया था कि इस प्रकार की चुनावी फंडिंग भ्रष्टाचार को बढ़ावा देगी। कुछ कंपनियां उन पार्टियों में अज्ञात तरीकों से फंडिंग करेंगी, जिन पार्टियों की सरकार से उन्हें फायदा होता है। 1 करोड़ रुपए तक का बॉन्ड खरीदे जा सकते थे
कोई भी भारतीय इसे खरीद सकता है। बॉन्ड खरीदने वाला 1 हजार से लेकर 1 करोड़ रुपए तक का बॉन्ड खरीद सकता था। खरीदने वाले को बैंक को अपनी पूरी KYC डिटेल में देनी होती थी। बॉन्ड खरीदने वाले की पहचान गुप्त रहती है। खरीदने वाला जिस पार्टी को ये बॉन्ड डोनेट करना चाहता है, उसे पिछले लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कम से कम 1% वोट मिला होना चाहिए। ये बॉन्ड जारी करने के बाद 15 दिन तक वैलिड रहते थे। इसलिए 15 दिन के अंदर इसे चुनाव आयोग से वैरिफाइड बैंक अकाउंट से कैश करवाना होता था। ——————————————— सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें… सोशल मीडिया पर बच्चों के बैन की याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मामला हमारे दायरे से बाहर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर कानूनी प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा- यह नीतिगत मामला है। आप संसद से कानून बनाने के लिए कहें। यह हमारे दायरे से बाहर है। पूरी खबर पढ़ें…