गुजरात पटाखा फैक्ट्री विस्फोट में MP के 20 लोगों की मौत हो गई। 18 का अंतिम संस्कार गुरुवार को देवास के नेमावर घाट पर किया गया। हादसे में जो लोग जिंदा बचे हैं, उन्हें जिंदगीभर का दर्द मिला है। शवों के साथ गुजरात से वो चश्मदीद भी आए, जो यहां से फैक्ट्री में मजदूरी करने गए थे। किसी ने अपनों के चिथड़े उड़ते देखे तो किसी के परिजन का शरीर इस तरह झुलस चुका था कि शिनाख्त हाथ में बंधे कलावा से हो सकी। दैनिक भास्कर ने हरदा और खातेगांव के उन चश्मदीदों से बात की, जिनकी आंखों के सामने 1 अप्रैल को यह भयावह हादसा हुआ। उन परिजन से भी बात की, जो अपनों का शव लेकर गुजरात से लौटे, पढ़िए रिपोर्ट… पुलिसकर्मी ने फोन किया- बेटा अस्पताल में है
खातेगांव के यादव मोहल्ला में पंकज शाक्य का घर है। घर पर मां- पिता के साथ पंकज और उनके दो भाई रहते थे। पंकज की दो बेटियां और एक बेटा है। बेटा जन्म से ही दिव्यांग है। पंकज के पिता देवीलाल शाक्य कहते हैं- मुझे हादसे के बाद गुजरात पुलिस के एक जवान ने पंकज के नंबर से कॉल करके कहा कि पंकज हॉस्पिटल में है। आप लोग उसे लेने आ जाओ। हम गाड़ी करके गुजरात पहुंचे। पंकज बुरी तरह झुलस चुका था। उसका एक हाथ ठीक था, जिसमें ओम का निशान बना था और हाथ में कलावा बंधा था। उससे ही मैं अपने बेटे को पहचान पाया। देवीलाल ने बताया कि पंकज पहले हरदा के सेठ राजू अग्रवाल की गाड़ी चलाता था। वो उनके साथ ही रहता था। जब पिछले साल उनकी हरदा वाली पटाखा फैक्ट्री में ब्लास्ट हो गया, तब से पंकज बेरोजगार हो गया था। कोई भी छोटा-मोटा काम कर लेता था। कुछ महीनों पहले ही राजू सेठ ने पंकज को वापस बुलाकर कहा कि अब गुजरात में काम करना है। वहां अच्छे पैसे मिलेंगे। उसी के कहने पर वो मजदूरों को लेकर वहां गया। पत्नी बोली- कहकर गए थे कि 8 दिन में लौट आऊंगा
पंकज की पत्नी ललिता ने कहा- मुझसे कहा था कि मैं मजदूरों को गुजरात छोड़कर 8 दिन में लौट आऊंगा। पहले हरदा वाली पटाखा फैक्ट्री में काम करते थे। हरीश और अमन के साथ ही ये गुजरात में बंद पड़ी पटाखे की फैक्ट्री चालू करने जाते थे। ये लोग कौन थे, मैं नहीं जानती लेकिन इनके साथ हंडिया की लक्ष्मी भी थी। वो भी हरदा वाले राजू अग्रवाल के लिए ही काम करती थी। लक्ष्मी विधवा थी, दो बच्चों की जिम्मेदारी उठा रही थी
बार-बार लक्ष्मी का नाम बतौर मजदूरों के मेट के रूप में सामने आने पर हम उसके घर हंडिया पहुंचे। एक बंद मैदा मिल के कैंपस के अंदर बने दो कमरों में लक्ष्मी का भाई ललित और उसकी मां रहते हैं। ललित इसी मिल में गार्ड की नौकरी करता है। लक्ष्मी की मां आशा बाई ने बताया- लक्ष्मी और उसके पति, राजू अग्रवाल की फैक्ट्री में गार्ड का काम करते थे। दो साल पहले फैक्ट्री में ही कूलर से करंट लगने से लक्ष्मी के पति की मौत हो गई थी। ब्लास्ट के बाद जब फैक्ट्री बंद हुई तो लक्ष्मी बेरोजगार हो गई। उसकी 18 और 16 साल की दो बेटियां हैं। इनकी जिम्मेदारी अकेले उसी पर थी। इसीलिए वो अपनी दोनों लड़कियों को हमारे पास छोड़कर गुजरात पैसा कमाने गई थी। आप लोगों को पटाखे चाहिए तो किसी गरीब को मरना पड़ेगा
लक्ष्मी की मां आशा बाई ने कहा- जो लोग पटाखा फैक्ट्री में मर गए, वो तो सब गरीब थे। बेचारे थोड़ा पैसा कमाने चले गए थे। कोई पाप नहीं किया था, लेकिन आप लोगों को भी तो पटाखे चाहिए। शादी हो या दिवाली… क्या बिना पटाखों के पहले नहीं होती थी। अब इसके लिए कोई गरीब तो मरेगा न? अब उनकी आपबीती, जो गुजरात से लौटे हैं… परिजन का अंतिम संस्कार भी नहीं देख सके
पटाखा फैक्ट्री में ब्लास्ट की जानकारी लगते ही हंडिया गांव के 25 लोग परिजन के शव लेने गुजरात पहुंचे थे। वे मंगलवार की रात को यहां से निकले और बुधवार की सुबह गुजरात पहुंचे। सभी ने मृतकों के शव देखे। गुजरात मजदूरी करने गए लोगों में से 3 लोग ही बचे हैं। इनमें 22 साल का राजेश, 14 साल का बिट्टू और 3 साल की नैना है। राजेश और बिट्टू सगे भाई हैं। हादसे में इनके बीच वाले भाई विष्णु (18) की मौत हो गई है। जो बचे हैं, वो अपने घर वापस आ गए हैं; लेकिन इन्हें लौटने में देरी हो गई और ये अपने परिजन का अंतिम संस्कार नहीं देख पाए, क्योंकि शव गुरुवार की सुबह ही हरदा पहुंच चुके थे। सुबह करीब साढ़े 8 बजे उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया, जबकि शवों को लेने गुजरात पहुंचे परिजन शाम 5 बजे अपने घर लौटे। बेटे का सिर नहीं मिला, DNA जांच के बाद मिलेगा शव
संतोष नायक ने बताया- यहां के 24 मजदूरों के साथ मेरा 10 साल का बेटा संजय नायक भी गुजरात काम करने गया था। हम लोगों को गुजरात में अपने सभी परिजन की डेडबॉडी मिल गई, लेकिन वहां संजय की डेडबॉडी नहीं थी। वहां मौजूद पुलिस के अफसरों ने मुझे बताया कि एक डेडबॉडी है जिसका सिर नहीं है, सिर्फ धड़ है। कुछ घंटे के बाद पुलिस वाले मुझे अस्पताल में डॉक्टर के पास ले गए। उन्होंने मेरा ब्लड निकाला। उन्होंने कहा कि जांच होने के बाद मालूम पड़ेगा कि वो डेडबॉडी किसकी है। मेरे पूछने पर उन्होंने कहा कि एक दो घंटे में पता लग जाएगा। दो हिस्सों में बंटी बॉडी, DNA टेस्ट से शिनाख्त
संतोष ने आगे बताया- मैं दो घंटे बाद फिर पुलिस अफसरों और डॉक्टर के पास गया। उन्होंने कहा कि बॉडी की हालत गंभीर है। दो हिस्सों में बंट गई है। उसका DNA टेस्ट होगा। पता लगाने में दो-तीन दिन भी लग सकते हैं। हम सब रात तक बेटे की बॉडी मिलने का इंतजार करते रहे। हम वहां पहुंचे ही थे कि उसके एक घंटे बाद ही सुबह 10 बजे प्रशासन के लोग हमारे बाकी मृत परिजन के शव लेकर MP के लिए रवाना हो गए थे। शव गुरुवार की सुबह यहां पहुंच गए। हम बुधवार की रात 10 बजे वहां से निकले और गुरुवार की शाम 5 बजे यहां पहुंचे। सभी शवों की हालत खराब हो चुकी थी। वो सड़ने लगे थे, इसलिए हमारे यहां पहुंचने से पहले ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। पत्नी को कंगन और तीन बेटों को गले के रुद्राक्ष से पहचाना
हादसे में हंडिया के भगवान सिंह नायक की पत्नी गुड्डी समेत उनके तीनों बेटों विजय, अजय और कृष्णा की मौत हो गई है। भगवान सिंह भी अपने परिजन को लेने गुजरात पहुंचे थे। उन्होंने कहा- मेरा तो सबकुछ खत्म हो गया। हम जब गुजरात पहुंचे तो सबसे पहले अपने परिजन को तलाशना शुरू किया। पुलिस ने हॉस्पिटल में सभी डेडबॉडी रखी थीं। सभी शवों की हालत इतनी खराब थी कि उनको देखा भी नहीं जा रहा था। ज्यादातर शवों की पहचान उनके मुंह से नहीं की जा सकती थी। सभी के चेहरे मिट चुके थे। अस्पताल में मैंने सबसे पहले अपने छोटे बेटे कृष्णा को पहचाना। सिर्फ वही था, जिसका चेहरा ठीक बचा था। बाकी दो बच्चों की पहचान मैंने उनके गले में बंधे रुद्राक्ष से की थी। पत्नी गुड्डी की पहचान कंगन से की थी। अधजले हाथ पर उसका नाम भी लिखा हुआ था। अच्छी सुविधाओं और पैसे का लालच देकर ले गए
भगवान सिंह ने कहा- मैं अपनी पत्नी और बच्चों को हाटपिपल्या की पटाखा फैक्ट्री में काम करने के लिए छोड़कर आया था। इसके बाद मैं अपने प्रेशर कुकर बनाने वाले धंधे पर निकल गया था। पत्नी और बच्चों ने वहां दो दिन काम किया। इसके बाद ये लोग गुजरात चले गए। मुझे तो इस बात की जानकारी ही नहीं थी। तीन दिन बाद जब मेरे मंझले बेटे विजय का वीडियो कॉल आया, तब उसने मुझे बताया कि वो सब गुजरात पहुंच गए हैं। मैंने उनसे कहा था कि बेटे तुम लोग इतनी दूर क्यों चले गए। इनको गुजरात ले जाने में पंकज और लक्ष्मी का हाथ था। हरदा फैक्ट्री के मालिक राजू अग्रवाल के कहने पर ही ये हमारे लोगों को गुजरात ले गए। इन्होंने अच्छी सुविधाओं और पैसे का लालच दिया था। पंकज और लक्ष्मी ने 30 हजार रुपए एडवांस दिए थे
एक DNA टेस्ट की रिपोर्ट आ गई है। ये डेडबॉडी हंडिया गांव के लक्ष्मी की है। 3 लोग जिंदा बचे हैं। इनमें हंडिया का 22 साल का राजेश, 14 साल का बिट्टू और संदलपुर गांव की 3 साल की नैना है। ये तीनों गुजरात से अपने परिजन के साथ शाम 5 बजे अपने घर पहुंचे। 14 साल का बिट्टू किसी से भी बात करने की स्थिति में नहीं है। वो बार-बार अपनी आंखें बंद कर दीवार से टिक जाता है। 22 साल के राजेश ने बताया- शनिवार के दिन हम गुजरात के लिए निकल गए थे। रविवार को वहां पहुंचे। हमें यहां से लक्ष्मी और पंकज ठेकेदार गुजरात लेकर गए थे। पहले उन्होंने 1000 पटाखे का 450 रुपए देने की बात कही। हम नहीं माने तो बढ़ाकर 500 रुपए कर दिए। हमें 30 हजार रुपए एडवांस भी दिया था। हम संडे के दिन वहां पहुंचे और मंडे से हमने काम शुरू कर दिया। लक्ष्मी केमिकल बनाती थी, हम सुतली बम
सोमवार के दिन काम बढ़िया चला। लक्ष्मी केमिकल और बारूद बनाने का काम करती थी और हम डिब्बी भरकर उसमें सुतली लपेटने का काम करते थे। उस दिन हमने ठीक-ठाक संख्या में सुतली बम बनाए थे। वहां फैक्ट्री से थोड़ी दूरी पर ही हमारे रहने के लिए कमरे भी दिए गए थे। सोमवार का काम खत्म करने के बाद मंगलवार की सुबह से हम सभी 24 लोग फिर काम में जुट गए। काम करते-करते मुझे प्यास लगी तो मैं पानी पीने के लिए अपने कमरे की तरफ निकल गया। मेरे पीछे मेरा छोटा भाई बिट्टू भी आ गया। हम कमरे में एंटर करने ही वाले थे कि पीछे से भयानक विस्फोट की आवाज आई। हमने पीछे मुड़कर देखा तो सिर्फ धुआं था। धमाका इतना खतरनाक था कि हमारे रूम की छत नीचे गिर गई। हम वहां से भागे। मैंने अपने भाई को फैक्ट्री से दूर खड़ा किया, फिर फैक्ट्री की ओर भागा। अंदर मेरे रिश्तेदार और मेरा सगा भाई भी था। इसी बीच मुझे एक छोटी सी बच्ची घायल अवस्था में रोती हुई दिखाई दी। वो 3 साल की नैना थी। सब अंदर जलकर राख हो गए। पता नहीं वो बच्ची कैसे बच गई। शायद तेज धमाके के चलते वो फैक्ट्री से थोड़ी दूरी पर जाकर गिरी थी, इसलिए उसकी जान बच गई। उसे पीछे की तरफ गंभीर चोटें आई हैं, इसलिए मैं उसको और अपने भाई को लेकर अस्पताल चला गया था। आप मेरी हालत समझिए, मेरे दिल पर कितना बोझ है। मेरे जवान भाई के चिथड़े उड़ गए। वो हमसे दूर चला गया है। मैं इसके आगे कुछ नहीं बता पाऊंगा। मेरा दिमाग स्थिर नहीं है, कुछ बोलूंगा और मुंह से कुछ निकलेगा। इतना कहकर राजेश शांत हो गया। गुजरात ब्लास्ट मामले से जुड़ी ये खबरें भी पढे़ं… मां ने रोका, फिर भी पटाखा बनाने गया, मिली मौत एक साल पहले हरदा पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में जिंदा बचे शख्स राकेश की गुजरात पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में मौत हो गई। हरदा ब्लास्ट के बाद मां शांताबाई इतनी डरी हुई थी कि राकेश को गुजरात जाने से खूब रोका, लेकिन वह नहीं माना। चार दिन बाद राकेश, उसकी पत्नी डॉली और बेटी किरण की मौत की खबर आई। पढ़ें पूरी खबर… बेटे की तेरहवीं करनी थी, रुपए कमाने गए गुजरात: मां बोली-सब खत्म हो गया हरदा के हंडिया की गीताबाई का पूरा परिवार गुजरात फैक्ट्री ब्लास्ट में खत्म हो गया। दैनिक भास्कर ने गीता से बात की तो बोलीं- होली पर बेटे सत्यनारायण का निधन हो गया था। उसकी तेरहवीं के लिए रुपए नहीं थे। पोते समेत परिवार के 11 लोग काम करने गुजरात गए थे। पढ़ें पूरी खबर…
गुजरात पटाखा फैक्ट्री विस्फोट में MP के 20 लोगों की मौत हो गई। 18 का अंतिम संस्कार गुरुवार को देवास के नेमावर घाट पर किया गया। हादसे में जो लोग जिंदा बचे हैं, उन्हें जिंदगीभर का दर्द मिला है। शवों के साथ गुजरात से वो चश्मदीद भी आए, जो यहां से फैक्ट्री में मजदूरी करने गए थे। किसी ने अपनों के चिथड़े उड़ते देखे तो किसी के परिजन का शरीर इस तरह झुलस चुका था कि शिनाख्त हाथ में बंधे कलावा से हो सकी। दैनिक भास्कर ने हरदा और खातेगांव के उन चश्मदीदों से बात की, जिनकी आंखों के सामने 1 अप्रैल को यह भयावह हादसा हुआ। उन परिजन से भी बात की, जो अपनों का शव लेकर गुजरात से लौटे, पढ़िए रिपोर्ट… पुलिसकर्मी ने फोन किया- बेटा अस्पताल में है
खातेगांव के यादव मोहल्ला में पंकज शाक्य का घर है। घर पर मां- पिता के साथ पंकज और उनके दो भाई रहते थे। पंकज की दो बेटियां और एक बेटा है। बेटा जन्म से ही दिव्यांग है। पंकज के पिता देवीलाल शाक्य कहते हैं- मुझे हादसे के बाद गुजरात पुलिस के एक जवान ने पंकज के नंबर से कॉल करके कहा कि पंकज हॉस्पिटल में है। आप लोग उसे लेने आ जाओ। हम गाड़ी करके गुजरात पहुंचे। पंकज बुरी तरह झुलस चुका था। उसका एक हाथ ठीक था, जिसमें ओम का निशान बना था और हाथ में कलावा बंधा था। उससे ही मैं अपने बेटे को पहचान पाया। देवीलाल ने बताया कि पंकज पहले हरदा के सेठ राजू अग्रवाल की गाड़ी चलाता था। वो उनके साथ ही रहता था। जब पिछले साल उनकी हरदा वाली पटाखा फैक्ट्री में ब्लास्ट हो गया, तब से पंकज बेरोजगार हो गया था। कोई भी छोटा-मोटा काम कर लेता था। कुछ महीनों पहले ही राजू सेठ ने पंकज को वापस बुलाकर कहा कि अब गुजरात में काम करना है। वहां अच्छे पैसे मिलेंगे। उसी के कहने पर वो मजदूरों को लेकर वहां गया। पत्नी बोली- कहकर गए थे कि 8 दिन में लौट आऊंगा
पंकज की पत्नी ललिता ने कहा- मुझसे कहा था कि मैं मजदूरों को गुजरात छोड़कर 8 दिन में लौट आऊंगा। पहले हरदा वाली पटाखा फैक्ट्री में काम करते थे। हरीश और अमन के साथ ही ये गुजरात में बंद पड़ी पटाखे की फैक्ट्री चालू करने जाते थे। ये लोग कौन थे, मैं नहीं जानती लेकिन इनके साथ हंडिया की लक्ष्मी भी थी। वो भी हरदा वाले राजू अग्रवाल के लिए ही काम करती थी। लक्ष्मी विधवा थी, दो बच्चों की जिम्मेदारी उठा रही थी
बार-बार लक्ष्मी का नाम बतौर मजदूरों के मेट के रूप में सामने आने पर हम उसके घर हंडिया पहुंचे। एक बंद मैदा मिल के कैंपस के अंदर बने दो कमरों में लक्ष्मी का भाई ललित और उसकी मां रहते हैं। ललित इसी मिल में गार्ड की नौकरी करता है। लक्ष्मी की मां आशा बाई ने बताया- लक्ष्मी और उसके पति, राजू अग्रवाल की फैक्ट्री में गार्ड का काम करते थे। दो साल पहले फैक्ट्री में ही कूलर से करंट लगने से लक्ष्मी के पति की मौत हो गई थी। ब्लास्ट के बाद जब फैक्ट्री बंद हुई तो लक्ष्मी बेरोजगार हो गई। उसकी 18 और 16 साल की दो बेटियां हैं। इनकी जिम्मेदारी अकेले उसी पर थी। इसीलिए वो अपनी दोनों लड़कियों को हमारे पास छोड़कर गुजरात पैसा कमाने गई थी। आप लोगों को पटाखे चाहिए तो किसी गरीब को मरना पड़ेगा
लक्ष्मी की मां आशा बाई ने कहा- जो लोग पटाखा फैक्ट्री में मर गए, वो तो सब गरीब थे। बेचारे थोड़ा पैसा कमाने चले गए थे। कोई पाप नहीं किया था, लेकिन आप लोगों को भी तो पटाखे चाहिए। शादी हो या दिवाली… क्या बिना पटाखों के पहले नहीं होती थी। अब इसके लिए कोई गरीब तो मरेगा न? अब उनकी आपबीती, जो गुजरात से लौटे हैं… परिजन का अंतिम संस्कार भी नहीं देख सके
पटाखा फैक्ट्री में ब्लास्ट की जानकारी लगते ही हंडिया गांव के 25 लोग परिजन के शव लेने गुजरात पहुंचे थे। वे मंगलवार की रात को यहां से निकले और बुधवार की सुबह गुजरात पहुंचे। सभी ने मृतकों के शव देखे। गुजरात मजदूरी करने गए लोगों में से 3 लोग ही बचे हैं। इनमें 22 साल का राजेश, 14 साल का बिट्टू और 3 साल की नैना है। राजेश और बिट्टू सगे भाई हैं। हादसे में इनके बीच वाले भाई विष्णु (18) की मौत हो गई है। जो बचे हैं, वो अपने घर वापस आ गए हैं; लेकिन इन्हें लौटने में देरी हो गई और ये अपने परिजन का अंतिम संस्कार नहीं देख पाए, क्योंकि शव गुरुवार की सुबह ही हरदा पहुंच चुके थे। सुबह करीब साढ़े 8 बजे उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया, जबकि शवों को लेने गुजरात पहुंचे परिजन शाम 5 बजे अपने घर लौटे। बेटे का सिर नहीं मिला, DNA जांच के बाद मिलेगा शव
संतोष नायक ने बताया- यहां के 24 मजदूरों के साथ मेरा 10 साल का बेटा संजय नायक भी गुजरात काम करने गया था। हम लोगों को गुजरात में अपने सभी परिजन की डेडबॉडी मिल गई, लेकिन वहां संजय की डेडबॉडी नहीं थी। वहां मौजूद पुलिस के अफसरों ने मुझे बताया कि एक डेडबॉडी है जिसका सिर नहीं है, सिर्फ धड़ है। कुछ घंटे के बाद पुलिस वाले मुझे अस्पताल में डॉक्टर के पास ले गए। उन्होंने मेरा ब्लड निकाला। उन्होंने कहा कि जांच होने के बाद मालूम पड़ेगा कि वो डेडबॉडी किसकी है। मेरे पूछने पर उन्होंने कहा कि एक दो घंटे में पता लग जाएगा। दो हिस्सों में बंटी बॉडी, DNA टेस्ट से शिनाख्त
संतोष ने आगे बताया- मैं दो घंटे बाद फिर पुलिस अफसरों और डॉक्टर के पास गया। उन्होंने कहा कि बॉडी की हालत गंभीर है। दो हिस्सों में बंट गई है। उसका DNA टेस्ट होगा। पता लगाने में दो-तीन दिन भी लग सकते हैं। हम सब रात तक बेटे की बॉडी मिलने का इंतजार करते रहे। हम वहां पहुंचे ही थे कि उसके एक घंटे बाद ही सुबह 10 बजे प्रशासन के लोग हमारे बाकी मृत परिजन के शव लेकर MP के लिए रवाना हो गए थे। शव गुरुवार की सुबह यहां पहुंच गए। हम बुधवार की रात 10 बजे वहां से निकले और गुरुवार की शाम 5 बजे यहां पहुंचे। सभी शवों की हालत खराब हो चुकी थी। वो सड़ने लगे थे, इसलिए हमारे यहां पहुंचने से पहले ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया। पत्नी को कंगन और तीन बेटों को गले के रुद्राक्ष से पहचाना
हादसे में हंडिया के भगवान सिंह नायक की पत्नी गुड्डी समेत उनके तीनों बेटों विजय, अजय और कृष्णा की मौत हो गई है। भगवान सिंह भी अपने परिजन को लेने गुजरात पहुंचे थे। उन्होंने कहा- मेरा तो सबकुछ खत्म हो गया। हम जब गुजरात पहुंचे तो सबसे पहले अपने परिजन को तलाशना शुरू किया। पुलिस ने हॉस्पिटल में सभी डेडबॉडी रखी थीं। सभी शवों की हालत इतनी खराब थी कि उनको देखा भी नहीं जा रहा था। ज्यादातर शवों की पहचान उनके मुंह से नहीं की जा सकती थी। सभी के चेहरे मिट चुके थे। अस्पताल में मैंने सबसे पहले अपने छोटे बेटे कृष्णा को पहचाना। सिर्फ वही था, जिसका चेहरा ठीक बचा था। बाकी दो बच्चों की पहचान मैंने उनके गले में बंधे रुद्राक्ष से की थी। पत्नी गुड्डी की पहचान कंगन से की थी। अधजले हाथ पर उसका नाम भी लिखा हुआ था। अच्छी सुविधाओं और पैसे का लालच देकर ले गए
भगवान सिंह ने कहा- मैं अपनी पत्नी और बच्चों को हाटपिपल्या की पटाखा फैक्ट्री में काम करने के लिए छोड़कर आया था। इसके बाद मैं अपने प्रेशर कुकर बनाने वाले धंधे पर निकल गया था। पत्नी और बच्चों ने वहां दो दिन काम किया। इसके बाद ये लोग गुजरात चले गए। मुझे तो इस बात की जानकारी ही नहीं थी। तीन दिन बाद जब मेरे मंझले बेटे विजय का वीडियो कॉल आया, तब उसने मुझे बताया कि वो सब गुजरात पहुंच गए हैं। मैंने उनसे कहा था कि बेटे तुम लोग इतनी दूर क्यों चले गए। इनको गुजरात ले जाने में पंकज और लक्ष्मी का हाथ था। हरदा फैक्ट्री के मालिक राजू अग्रवाल के कहने पर ही ये हमारे लोगों को गुजरात ले गए। इन्होंने अच्छी सुविधाओं और पैसे का लालच दिया था। पंकज और लक्ष्मी ने 30 हजार रुपए एडवांस दिए थे
एक DNA टेस्ट की रिपोर्ट आ गई है। ये डेडबॉडी हंडिया गांव के लक्ष्मी की है। 3 लोग जिंदा बचे हैं। इनमें हंडिया का 22 साल का राजेश, 14 साल का बिट्टू और संदलपुर गांव की 3 साल की नैना है। ये तीनों गुजरात से अपने परिजन के साथ शाम 5 बजे अपने घर पहुंचे। 14 साल का बिट्टू किसी से भी बात करने की स्थिति में नहीं है। वो बार-बार अपनी आंखें बंद कर दीवार से टिक जाता है। 22 साल के राजेश ने बताया- शनिवार के दिन हम गुजरात के लिए निकल गए थे। रविवार को वहां पहुंचे। हमें यहां से लक्ष्मी और पंकज ठेकेदार गुजरात लेकर गए थे। पहले उन्होंने 1000 पटाखे का 450 रुपए देने की बात कही। हम नहीं माने तो बढ़ाकर 500 रुपए कर दिए। हमें 30 हजार रुपए एडवांस भी दिया था। हम संडे के दिन वहां पहुंचे और मंडे से हमने काम शुरू कर दिया। लक्ष्मी केमिकल बनाती थी, हम सुतली बम
सोमवार के दिन काम बढ़िया चला। लक्ष्मी केमिकल और बारूद बनाने का काम करती थी और हम डिब्बी भरकर उसमें सुतली लपेटने का काम करते थे। उस दिन हमने ठीक-ठाक संख्या में सुतली बम बनाए थे। वहां फैक्ट्री से थोड़ी दूरी पर ही हमारे रहने के लिए कमरे भी दिए गए थे। सोमवार का काम खत्म करने के बाद मंगलवार की सुबह से हम सभी 24 लोग फिर काम में जुट गए। काम करते-करते मुझे प्यास लगी तो मैं पानी पीने के लिए अपने कमरे की तरफ निकल गया। मेरे पीछे मेरा छोटा भाई बिट्टू भी आ गया। हम कमरे में एंटर करने ही वाले थे कि पीछे से भयानक विस्फोट की आवाज आई। हमने पीछे मुड़कर देखा तो सिर्फ धुआं था। धमाका इतना खतरनाक था कि हमारे रूम की छत नीचे गिर गई। हम वहां से भागे। मैंने अपने भाई को फैक्ट्री से दूर खड़ा किया, फिर फैक्ट्री की ओर भागा। अंदर मेरे रिश्तेदार और मेरा सगा भाई भी था। इसी बीच मुझे एक छोटी सी बच्ची घायल अवस्था में रोती हुई दिखाई दी। वो 3 साल की नैना थी। सब अंदर जलकर राख हो गए। पता नहीं वो बच्ची कैसे बच गई। शायद तेज धमाके के चलते वो फैक्ट्री से थोड़ी दूरी पर जाकर गिरी थी, इसलिए उसकी जान बच गई। उसे पीछे की तरफ गंभीर चोटें आई हैं, इसलिए मैं उसको और अपने भाई को लेकर अस्पताल चला गया था। आप मेरी हालत समझिए, मेरे दिल पर कितना बोझ है। मेरे जवान भाई के चिथड़े उड़ गए। वो हमसे दूर चला गया है। मैं इसके आगे कुछ नहीं बता पाऊंगा। मेरा दिमाग स्थिर नहीं है, कुछ बोलूंगा और मुंह से कुछ निकलेगा। इतना कहकर राजेश शांत हो गया। गुजरात ब्लास्ट मामले से जुड़ी ये खबरें भी पढे़ं… मां ने रोका, फिर भी पटाखा बनाने गया, मिली मौत एक साल पहले हरदा पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में जिंदा बचे शख्स राकेश की गुजरात पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में मौत हो गई। हरदा ब्लास्ट के बाद मां शांताबाई इतनी डरी हुई थी कि राकेश को गुजरात जाने से खूब रोका, लेकिन वह नहीं माना। चार दिन बाद राकेश, उसकी पत्नी डॉली और बेटी किरण की मौत की खबर आई। पढ़ें पूरी खबर… बेटे की तेरहवीं करनी थी, रुपए कमाने गए गुजरात: मां बोली-सब खत्म हो गया हरदा के हंडिया की गीताबाई का पूरा परिवार गुजरात फैक्ट्री ब्लास्ट में खत्म हो गया। दैनिक भास्कर ने गीता से बात की तो बोलीं- होली पर बेटे सत्यनारायण का निधन हो गया था। उसकी तेरहवीं के लिए रुपए नहीं थे। पोते समेत परिवार के 11 लोग काम करने गुजरात गए थे। पढ़ें पूरी खबर…